पुलिस द्वारा टॉम एंड जेरी का खेल, सुधार पर कोई ध्यान नहीं

punjabkesari.in Wednesday, May 11, 2022 - 04:50 AM (IST)

हम बचपन में टॉम एंड जेरी कार्टून का आनंद लिया करते थे। आज यह खेल दिल्ली, हरियाणा और पंजाब की पुलिस द्वारा खेला जा रहा है और तीनों राज्यों की पुलिस द्वारा सत्तारूढ़ भाजपा और आम आदमी पार्टी (आप) के टकराव की शह पर खेला जा रहा है। पिछले 2 दिनों से चल रहा यह खेल दिल्ली के एक भाजपा नेता को उसके आवास से ‘आप’ शासित पंजाब पुलिस द्वारा अपहरण किए जाने या गिरफ्तार किए जाने से शुरू हुआ। उसके बाद दिल्ली पुलिस ने इस आधार पर अपहरण का मामला दर्ज किया कि उन्हें पंजाब पुलिस द्वारा सूचित नहीं किया गया। 

इस मामले में भाजपा शासित हरियाणा की पुलिस ने तेजी से कार्रवाई करते हुए उक्त नेता को पंजाब ले जा रहे पुलिस के काफिले को कुरुक्षेत्र में रोका। हरियाणा पुलिस को सूचना मिली कि उक्त नेता को जबरन उठाया गया है। अंत में दिल्ली पुलिस उक्त नेता को छुड़ा कर वापस दिल्ली लाई। उसके बाद यह नाटक न्यायपालिका में पहुंचा। पंजाब की एक स्थानीय अदालत ने एक गिरफ्तारी वारंट जारी किया और पंजाब तथा हरियाणा उच्च न्यायालय ने मध्य रात्रि में उक्त नेता की गिरफ्तारी पर रोक लगाई। 

यह बताता है कि किस तरह सारे राजनीतिक दल इस गंदे खेल में शामिल हैं। इस गतिरोध में यह बात भी सामने आई कि किस तरह राजनीतिक बढ़त प्राप्त करने की राजनीति के चलते प्रक्रिया को नजरंदाज किया गया। प्रशासन ने कानून की सम्यक प्रक्रिया की उपेक्षा की और एक गलत प्रवृत्ति का उदाहरण स्थापित किया कि विधि प्रवर्तन तंत्र प्रक्रिया की उपेक्षा करे और अपने विरोधियों को निशाना बनाने के लिए अपने राजनीतिक माई-बाप के परोक्षी के रूप में कार्य करे। 

भाजपा युवा नेता द्वारा ‘आप’ के दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल को धमकी देने के मामले के गुणागुण में गए बिना यह मामला बताता है कि राजनीतिक दलों द्वारा उन राज्यों में पुलिस का किस तरह से खुल्लमखुल्ला दुरुपयोग किया जा रहा है, जहां पर वे शासन कर रहे हैं। किस तरह वे अंतर्राज्यीय पुलिस कार्रवाई को शासित करने वाले स्थापित मानदंडों और कानून के शासन की उपेक्षा कर रहे हैं और आज यह प्रवृत्ति सभी राज्यों में देखने को मिल रही है। वर्दी वाले तर्क और जवाबदेही से परे काम कर रहे हैं। उनके द्वारा समझौते किए जा रहे हैं क्योंकि उन्हें कम महत्वपूर्ण पदों पर स्थानांतरित करने, पदावनति करने और निलंबित करने की धमकी दी जाती है। 

अब तक अंतर-राज्य गिरफ्तारियां दंड प्रक्रिया संहिता से मार्ग-निर्देशित होती थीं, जिसके अंतर्गत जिस राज्य में गिरफ्तारी की जाती है, उस राज्य की स्थानीय पुलिस के साथ सहयोग अनिवार्य है और जिस राज्य में अपराध किया गया है उस राज्य की पुलिस को स्थानीय पुलिस को पूर्व सूचना देनी अनिवार्य है। किंतु यह घटना बताती है कि किस तरह पुलिस राजनीतिक निष्ठा के अनुसार कार्य करती है और किस तरह कटु राजनीति ने एक नियमित प्रक्रिया को अंतर्राज्यीय विवाद में बदल दिया और राज्यों के लिए एक गलत पूर्वोदाहरण स्थापित किया है कि विपक्ष शासित राज्य या केन्द्र द्वारा किस तरह गिरफ्तारी को रोका जाए। 

कानूनी दृष्टि से देखें तो गिरफ्तार करने की शक्ति प्रथम सूचना रिपोर्ट से प्राप्त होती है। यदि यह एक संज्ञेय गैर-जमानती अपराध है तो उस व्यक्ति को बिना वारंट के गिरफ्तार किया जा सकता है। अनुच्छेद 22 (2) में प्रावधान है प्रत्येक व्यक्ति जिसे गिरफ्तार किया गया हो या हिरासत में लिया गया हो उसे गिरफ्तारी के 24 घंटों के अंदर निकटतम मैजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाएगा और ऐसे किसी व्यक्ति को मैजिस्ट्रेट की अनुमति के बिना उक्त अवधि से अधिक समय तक हिरासत में नहीं रखा जा सकता। 

उक्त 24 घंटे की अवधि पुलिस को स्थानीय मजिस्ट्रेट, जिसके क्षेत्राधिकार में गिरफ्तारी की गई है, उससे ट्रांजिट रिमांड लेने से बचाती है क्योंकि ट्रांजिट रिमांड की सुनवाई के समय मैजिस्ट्रेट गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को जमानत लेने और उसे दूसरे राज्य को स्थानांतरित करने के दावे के विरुद्ध लड़ सकता है। इसका दूसरा पहलू यह है कि किसी नए राज्य में 24 घंटे के भीतर भी किसी गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को पेश करने से उसे वकील की सेवा लेने और जमानत प्राप्त करने में कठिनाई हो सकती है। इसलिए इस बात का निर्धारण कि क्या गिरफ्तारी वैध है या नहीं मैजिस्ट्रेट द्वारा की जाती है न कि पुलिस द्वारा। 

वर्ष 2008 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने रायपुर में एक व्यक्ति की गिरफ्तारी के लिए ट्रांजिट रिमांड प्राप्त न करने के सी.बी.आई. के निर्णय को वैध ठहराया क्योंकि सी.बी.आई. को आशा थी कि याचिकाकत्र्ता को दिल्ली की अदालत में पेश करने के लिए 24 घंटे से अधिक अवधि नहीं लगेगी। साथ ही वर्ष 2021 में बेंगलुरु से दिशा रवि और पिछले महीने जिग्नेश मेवाणी की गिरफ्तारी भी बिना ट्रांजिट रिमांड के की गई। हरियाणा पुलिस द्वारा पंजाब पुलिस के काफिले को रोकना भी कानून का उल्लंघन है क्योंकि कानून में कहा गया है कि लोक सेवक को अपने आधिकारिक कत्र्तव्यों के निर्वहन के लिए रोका या निरुद्ध नहीं किया जा सकता। 

कानूनी विशेषज्ञों को आशंका है कि भाजपा नेता के इस मामले से विपक्ष शासित राज्यों द्वारा गिरफ्तारी को रोकने के लिए राज्यों द्वारा एक नया स्वरूप स्थापित किया जा सकता है। सी.बी.आई. और प्रवर्तन निदेशालय विपक्ष शासित राज्यों से संबंधित मामले दिल्ली में दर्ज करते रहते हैं न कि संबंधित राज्यों में और इसका कारण यह होता है, ताकि गिरफ्तारी में किसी तरह का जोखिम न हो। शायद उक्त भाजपा नेता के विरुद्ध हमला करने और तोड़-फोड़ करने के अनेक मामले दर्ज हैं। यदि दिल्ली पुलिस उसके विरुद्ध मामला दर्ज नहीं करेगी तो पंजाब पुलिस अपने राजनीतिक आकाओं के कहने पर ऐसा कर सकती है या ममता की बंगाल की पुलिस या ठाकरे की महाराष्ट्र की पुलिस ऐसा करती है और यह टॉम एंड जेरी का खेल जारी रहेगा जो एक गंभीर चिंता का विषय है। यह हमारे लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। 

आवश्यक है कि राजनीतिक दल और सरकारें अपने मतभेदों के बावजूद चिरलंबित पुलिस सुधारों पर कार्य करें जिनमें अंतर-राज्य पुलिस कार्रवाई के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश निर्धारित किए जाएं और इन मानदंडों का उल्लंघन करने के लिए दंड का प्रावधान हो। राजनीतिक बढ़त का यह खेल समाप्त होना चाहिए क्योंकि इस खेल में केवल लोकतंत्र को नुक्सान होगा।-पूनम आई. कौशिश
 


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