2024 के चुनावों से पहले यह है बड़ा दिलचस्प समय

2021-06-14T05:12:46.337

इस सरकार के तीसरे वर्ष में प्रवेश कर चुके हैं और आने वाले महीनों में चर्चा का विषय 2024 का चुनाव होगा। इस संदर्भ में उत्तर प्रदेश के आसपास हाल ही की राजनीतिक गतिविधियों को हम देख सकते हैं। भारत में सरकार क्या करती है वह पूरी तरह से राजनीतिक पार्टियों पर विशेषकर मध्यम वर्ग जिसने एक बार सरकार को वोट किया था, पर निर्भर करता है। 

जनता राज्य के साथ शामिल नहीं होती मगर हमारे देश में एक ऐसा हिस्सा है जो इसके साथ संबंध रखता है और अकेला नहीं रहता। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार सिविल सोसाइटी का मतलब सामुदायिक समूह, गैर-सरकारी संगठन (एन.जी.ओ.), श्रम यूनियनें, घरेलू समूह चैरीटेबल संगठन, धर्म आधारित संगठन, पेशेवर संस्थाएं तथा संस्थान होता है। 

भारत में आमतौर पर सिविल सोसाइटी शब्द का हम इस्तेमाल विशेष तौर पर एन.जी.ओ. तथा उनकी गतिविधियों के लिए करते हैं क्योंकि पेशेवर संस्थाएं सरकार के साथ भिडऩे से बड़ा डरती हैं। यहां पर कुछ अपवाद हैं मगर वह बेहद कम हैं। यह एन.जी.ओ., कार्यकत्र्ता तथा घरेलू समूह हैं जो भारत के लोगों तथा उनके हितों का राजनीति के ढांचे के बाहर उनका प्रतिनिधित्व करते हैं। 

भारत में जब हम घरेलू समूहों की बात करते हैं तो इससे उसका मतलब आदिवासियों से है। विकास का माडल जिसे भारत ने अपनाया है वह आदिवासी भूमि से लिया गया है। उसे बाकी के भारत के लिए इस्तेमाल में लाया गया है। आप और मैं अपने घरों से सरकार द्वारा विस्थापित नहीं होते। यह आदिवासी हैं जिन्हें अपने पूर्वजों के स्थान को छोडऩा चाहिए जो हजारों सालों से रहे हैं क्योंकि हमें डैमों का निर्माण करना है और हमें धरती के नीचे से कोयला प्राप्त करना है। 

एक सदी से आदिवासी लोगों ने भारत सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया है। विरसा मुंडा, जिनके बुत पर अमित शाह ने एक बार माल्यार्पण किया (मगर उन्होंने गलती से किसी दूसरे बुत पर माल्यार्पण कर दिया) ने अंग्रेजों को छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम को जारी करने के लिए बाध्य किया जिसके तहत आदिवासी भूमि को गैर-आदिवासियों को स्थानांतरित करने के लिए प्रतिबंधित किया गया। 

भाजपा मुंडा को माल्यार्पण करना चाहती थी मगर इसने छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम को शून्य करने के लिए 2016 में एक कानून पारित किया। इसमें आदिवासियों की प्रतिक्रिया के कारण भाजपा इस कानून से पीछे हट गई और अगले ही विधानसभा चुनावों में हार गई। यही कारण है कि 2020 में शाह मुंडा के बुत की बजाय किसी और पर माल्यार्पण कर रहे थे।

भारत सरकार के प्रति आदिवासियों के प्रतिशोध को नहीं समझा गया और न ही इसे मीडिया में पूरी तरह से कवर किया गया। इस महीने कम से कम दो स्थान देखे गए हैं जहां पर आदिवासियों ने प्रदर्शन किया है। गुजरात में 11 आदिवासियों को स्टेच्यू ऑफ यूनिटी के निकट प्रस्तावित ज्यादा पार्किंग के खिलाफ प्रदर्शन करने के लिए गिर तार किया गया। उनका कहना था कि सरदार सरोवर नर्मदा निगम द्वारा ली गई भूमि जोकि परियोजना के विकास के लिए थी, उनसे संबंध रखती है और इसे गैर-कानूनी ढंग से छीना गया है। 

भावनाओं की अभिव्यक्ति को इस कदर समझा जा सकता है कि प्रदर्शनकारियों में शामिल महिलाओं ने सार्वजनिक तौर पर अपने कपड़े उतार दिए। उनमें से 20 के खिलाफ धारा 143 (गैर-कानूनी ढंग से एकत्रित होना) और 294 (सार्वजनिक स्थल के निकट अश्लील गीत गाना या शब्द बोलना) के तहत एफ.आई.आर. दर्ज की गई। 

छत्तीसगढ़, जहां पर सत्ता में कांग्रेस की सरकार है, में हजारों की सं या में आदिवासियों ने बिना उनकी अनुमति के  उनकी भूमि पर बनाए गए सी.आर.पी.एफ. कैंप के खिलाफ प्रदर्शन किया। सरकार ने उन पर गोली चला दी जिसके कारण 3 की मौत हो गई मगर आदिवासी बस्तर में अभी भी खुले में प्रदर्शन कर रहे हैं और अपने अधिकारों की मांगों पर जोर देते हुए कह रहे हैं कि कैंप को वहां से हटाया जाए। 

दिल्ली के बाहर सीमाओं पर प्रदर्शन में हजारों की सं या में किसान प्रदर्शन पर हैं जो पिछली नव बर से वहां पर एकत्रित हुए हैं और उन्होंने पूरी सर्दी खुले में गुजारी है और अब गर्मी में तेज धूप के नीचे प्रदर्शन पर बैठे हैं। जिन कानूनों के खिलाफ किसान प्रदर्शन कर रहे हैं उन्हें राज्यसभा में बिना एक विभाजन वोट के पारित कर दिया गया। सुप्रीमकोर्ट द्वारा कानूनों को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया और मोदी सरकार ने भी खुद ही 18 माह के लिए उन्हें स्थगित करने का प्रस्ताव दिया।

कानूनों के खिलाफ जोरदार प्रतिक्रियाएं दिखाई दे रही हैं।  मोदी सरकार खुद ही उनमें रुचि खो बैठी है और उनको लागू करने के बारे में नहीं बोलती। सरकार प्रदर्शन को जारी रखने की अनुमति दिए हुए है क्योंकि किसान पीछे मुडऩे को तैयार नहीं। 

इसी तरह संसद द्वारा सी.ए.ए. कानून पारित कर दिया गया मगर इसे लागू नहीं किया गया। इसका एक कारण इसके खिलाफ भारत में प्रदर्शन होना है और दूसरा कारण वैश्विक तौर पर इसके खिलाफ हुई कड़ी आलोचना है।

गुजरात में सिविल सोसाइटी की प्रतिक्रिया का नतीजा यह हुआ कि दलितों और आदिवासियों के खिलाफ प्रताडऩा को लेकर फास्ट ट्रैक अदालतों का गठन हुआ। सिविल सोसाइटी आंदोलन का नेतृत्व पूर्व पत्रकार जिगनेश मेवानी द्वारा किया गया जो गुजरात विधानसभा में निर्वाचित हुए। 2014 से लेकर सिविल सोसाइटी में बहुत ज्यादा गतिविधियां हुईं। ऐसे कानून जोकि अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों की अवहेलना के खिलाफ हैं उन्हें निरस्त करने का दबाव है। 2024 के लिए यह बेहद दिलचस्प समय है।-आकार पटेल


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Content Writer

Pardeep

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