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भारत-चीन के बीच युद्ध में कोई भी एक ‘स्पष्ट विजेता’ नहीं होगा

2020-06-14T02:57:47.62

पिछले सप्ताह हमने भारत के भूगोल के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त की। लद्दाख में गलवान घाटी, पैंगोंग  त्सो (झील) और गोगरा जैसे अपरिचित नाम हमारे रहने वाले कमरों में प्रवेश कर चुके हैं। 

यह घुसपैठ है
भारत-चीन संबंधों में मौजूदा घटनाक्रम की उत्पत्ति का पता 5 मई, 2020 और पूर्ववर्ती दिनों में पैंगोंग त्सो में हुई झड़पों से लगाया जा सकता है। हालांकि सरकार ने कभी स्वीकार नहीं किया कि चीनी सैनिक भारतीय क्षेत्र में हैं। निम्रलिखित तथ्य निश्चित करते हैं : 

*भारतीय क्षेत्र में बड़ी संख्या में चीनी सैनिकों की लद्दाख के गलवान हॉट स्प्रिंग्स, पैंगोंग त्सो, गोगरा और सिक्किम में नक्कू ला में गतिविधियां देखी गईं। 
 *अतीत में लद्दाख में गलवान और सिक्किम में नक्कू ला विवादित या संवेदनशील क्षेत्र की किसी भी सूची में नहीं थे। चीन ने विवाद के क्षेत्रों का विकास किया है।
*चीन ने अपनी तरफ से बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य शुरू कर दिया। भारत भी अपनी तरफ निर्माण कार्य कर रहा है। 
*पहली बार दोनों पक्षों में सैन्य जनरलों द्वारा वार्ता का नेतृत्व किया गया। यह बातचीत विदेश सेवा या विशेष प्रतिनिधियों के राजनयिकों द्वारा की गई। 

कोई पूर्ण युद्ध नहीं 
यह विश्वास करना मुश्किल है कि इस समय चीन या भारत सीमा विवाद को लेकर तनाव बढ़ाना चाहते हैं। यह विवाद उस दिन उत्पन्न हुआ जब मैकमोहन रेखा खींची गई। 1962 के पूर्ण युद्ध में विस्फोट हो गया। यह सच है कि दोनों देशों के सैनिकों के बीच समय-समय पर झड़पें होती रही हैं लेकिन तब नहीं जब दोनों देशों ने गैर सैन्य चुनौतियों का सामना किया। दोनों देश अभी भी कोविड-19 संकट से जूझ रहे हैं। भारत तथा चीन दोनों को 2020-21 में आर्थिक मंदी का डर सता रहा है। दोनों देश शांतिपूर्ण, स्थिर और संतुलित संबंधों को सुनिश्चित कर विश्व स्तर पर प्राप्त होने वाले सभी लाभों को खतरे में डालना नहीं चाहेंगे। 

इसके अलावा चीन को यह विश्वास हो सकता है कि वह 1962 की तुलना में 2020 में सैन्य रूप से अधिक मजबूत है। चीन जानता है कि भारत 1962 की तुलना में 2020 में सैन्य रूप से ज्यादा मजबूत है। 1962 के विपरीत 2020 में दोनों देशों के बीच युद्ध में कोई भी एक स्पष्ट विजेता नहीं होगा। चीन के विशेषज्ञों की राय है कि हालिया कार्रवाइयों के लिए जो भी प्रेरणा हो वह भारत के साथ पूर्ण युद्ध शुरू न करें। 

6 जून को वार्ता हुई, अंत में दोनों पक्षों ने अलग-अलग विचार रखे जिसमें प्रमुख सामान्य शब्द थे कि ‘मतभेद तथा विवाद’ नहीं बनने चाहिएं। मतभेद तो हैं और यह मतभेद 5 मई से पहले भी थे। हाल के हफ्तों या महीनों में भारतीय क्षेत्र में चीनी सैनिकों ने घुसपैठ के ट्रिगर पर पैर रखा। उन क्षेत्रों के मतभेदों का विस्तार करने के लिए क्या हुआ जिसके बारे में कोई मतभेद नहीं थे। यह क्षेत्र गलवान और नक्कू ला जैसे थे। 

कुछ बातें स्पष्ट हैं। वुहान (2018) तथा महाबलीपुरम (2019) में प्रधानमंत्री मोदी तथा चीनी राष्ट्रपति शी जिंनपिंग ने गर्मजोशी वाले निजी रिश्तों को आपस में शेयर नहीं किया। शी एकमात्र ऐसे नेता हैं जिन्हें मोदी गले से नहीं लगाते। पिछले 6 वर्षों में कई बार एक-दूसरे से मिलने के बावजूद मोदी और शी ने अपनी बातचीत में कोई उल्लेखनीय सफलता हासिल नहीं की। भारत व्यापार और निवेश में लाभ की तलाश में है। चीन से लेन-देन बना हुआ है और बदले में कुछ भी नहीं निकलता। 

भारत अपने आंगन को सुरक्षित रखना चाहता है। चीन भारत के आंगन को नहीं पहचानता। चीन आर.सी.ई.पी. के साथ आगे बढ़ता है। वह नेपाल के साथ राजनीतिक तथा कूटनीतिक रिश्ते बढ़ाता है और श्रीलंका की तरफ आर्थिक फायदा देखता है। भारत इन चालों का मुकाबला करने के लिए नुक्सान में है। भारत ने मालदीव का भरोसा वापस पा लिया लेकिन चीन ने अभी तक हार नहीं मानी है। भारत ने दक्षिण चीन सागर में चीन के अन्य दावों को खारिज कर दिया है और अंतर्राष्ट्रीय जल में नेविगेशन की स्वतंत्रता का दावा किया है। चीन ने भारत की अनदेखी की है क्योंकि उसने अमरीका से अन्य चुनौती देने वालों को भी नजरअंदाज कर रखा है। 

देपसांग या डोकलाम 
वर्तमान विवाद के शांतिपूर्ण समाधान के रूप में क्या माना जा सकता है? भारत 5 मई की यथास्थिति की बहाली चाहता है। यदि ऐसा होता है तो यह एक ओर देवसांग (2013) का क्षण हो सकता है। मैंने जानबूझ कर डोकलाम (2017) पर देपसांग को चुना है। रक्षा प्रतिष्ठान को इसका कारण पता है। चीन की आधिकारिक स्थिति यह है कि वह स्थिर और नियंत्रण में है, जो मेरे विचार में यथास्थिति के विपरीत है। 

यदि यथास्थिति बनाई रखी जाए तो चीन खुश होगा। गलवान में ड्रैगन तथा हाथी एक-दूसरे को घूर रहे हैं। वार्ता के बाद भारत ने सैनिकों के आपसी विघटन का संकेत दिया लेकिन सेवानिवृत्त सैन्य जनरलों को अभी तक किसी तरह के विवाद का सामना करना है। 

शी जिनपिंग और मोदी एक साझी विशेषता को साझा करते हैं। दोनों ही निर्विरोध नेता बनना चाहेंगे। अब तक दोनों ने घरेलू आलोचना को नजरअंदाज किया है लेकिन दोनों नेताओं की उनके देशों के अंदर आलोचना बढ़ी है। मोदी चार साल के लिए सुरक्षित हैं और शी तब तक सुरक्षित हैं जब तक पीपुल्स लिब्रेशन पार्टी और पोलित ब्यूरो उनका समर्थन करते हैं। दोनों नेता अलग-अलग नियमों से खेल रहे हैं। भारत में किसी भी खस्ता हालत में सरकार को पूर्ण समर्थन देने की परम्परा रही है।-पी.चिदंबरम


Pardeep

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