शरणार्थियों के ‘बोझ’ से दबती दुनिया

7/17/2019 2:13:56 AM

एक बार फिर शरणार्थी समस्या दुनिया भर में चर्चा, चिंता और सबक के तौर पर खड़ी है। अभी हाल में ही दुनिया में मानव मन को झकझोरने वाली एक शरणार्थी तस्वीर सामने आई है जिसमें एक बाप-बेटी मैक्सिको के रास्ते से अमरीका में प्रवेश करने की कोशिश करते समय नदी की तेज धार में बह गए और उनकी जिंदगी काल में समा गई।

इससे पहले भी सीरिया के एक मृत बच्चे अयलान कुर्दी की तस्वीर सामने आई थी जो अपने अभिभावकों के साथ बेहतर जिंदगी की खोज में यूरोप में जाने को प्रयासरत था, समुद्र के तेज ज्वार में उस बालक ने जिंदगी खो दी थी। उस समय दुनिया भर में शरणार्थी समस्या को लेकर चिंता व्यक्त की गई थी और शरणाॢथयों की समस्याओं के मानवीकरण करने पर बल दिया गया था। अमरीका और यूरोप से यह अपील की गई थी कि किसी न किसी कारण अपना घर और अपना देश छोडऩे वाले शरणाॢथयों को शरण दी जानी चाहिए। उन्हें अपने जीवन को संवारने और व्यवस्थित करने के लिए अवसर दिया जाना चाहिए। 

अमरीका और यूरोप की उदारता 
अमरीका और यूरोप शरणाॢथयों के प्रति पहले से काफी उदार रहे हैं। शरणार्थियों को मानवीय आधार पर शरण देने, भविष्य को सुंदर बनाने के लिए उन्हें अवसर देने में अमरीका और यूरोप काफी आगे रहे हैं। कभी अमरीका और यूरोप में शरण लेने वाले शरणार्थी आज बेहतर जिंदगी व्यतीत कर रहे हैं और वे गोरे समाज को टक्कर देने की स्थिति में हैं। अमरीका और यूरोप का मानव इतिहास सर्वश्रेष्ठ है जो शरणार्थियों के लिए लाभकारी रहा है। सीरिया के लाखों शरणार्थियों को जर्मनी ने शरण दे रखी है। 

हालांकि यह भी सही है कि शरणार्थियों के प्रति अमरीका और यूरोप का विचार अब धीरे-धीरे बदल रहा है। शरणार्थियों के खतरे को भी पहचाना जाना जा रहा है, महसूस किया जा रहा है। इसमें अमरीका और यूरोप का एकतरफा दोष देखने का अर्थ सिर्फ  और सिर्फ एकाकी सोच होगी और शरणार्थियों द्वारा प्रत्यारोपित खतरों और हिंसक मानसिकताओं, मजहबी सोच आदि को नजरअंदाज करना होगा। हर सिक्के के दो पहलू होते हैं इसलिए शरणार्थी समस्या के भी दो पहलू हैं। एक पहलू तो बहुत ही जहरीला, खतरनाक और मजहबीकरण वाला है। शरण देने वाले देशों के लिए शरणार्थी भस्मासुर तक बन गए हैं। शरणार्थी शरण देने वाले देशों के लिए भस्मासुर न बनें, इसके लिए गारंटी कौन दे सकता है? शरणार्थी बोझ उठाने का अर्थ अब एक खतरनाक हिंसक प्रवृत्ति को भी आमंत्रित करने के साथ ही साथ अपनी अर्थव्यवस्था को भी संकट में डालना माना जा रहा है। 

दुनिया में सात करोड़ शरणार्थी
दुनिया में कोई एक-दो लाख शरणार्थी नहीं हैं। शरणार्थियों की संख्या बहुत ही अधिक है। इनकी संख्या जान कर आप ङ्क्षचतित हो जाएंगे। ङ्क्षचतित होना भी स्वाभाविक है। आखिर क्यों? इसलिए कि दुनिया में अभी शरणाॢथयों की संख्या सात करोड़ से अधिक है। ये सात करोड़ मनुष्य किस हाल में होंगे, इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। इनकी स्थिति बहुत दयनीय और नारकीय है। ये कहीं झुग्गियों में रहते हैं, तो कहीं टैंटों में रहते हैं। इन पर हमेशा मौसम की मार पड़ती है। रोजगारहीन, साधनहीन होते हैं। इन्हें सिर्फ और सिर्फ  शरण देने वाले देशों पर निर्भर रहना पड़ता है। कुछ अंतर्राष्ट्रीय सामाजिक संगठनों की दया इन पर जरूर बरसती है। 

अंतर्राष्ट्रीय सामाजिक संगठन से जो मदद मिलती है, वह मदद भी शरणाॢथयों की समस्याओं को दूर नहीं करती, उन्हें किसी तरह जिंदा रखने का काम करती है। दानदाताओं की कमी से भी अंतर्राष्ट्रीय  सामाजिक संगठनों को जूझना पड़ता है। संयुक्त राष्ट्र संघ की शरणार्थी नीति जरूर लाभकारी है, पर संयुक्त राष्ट्र संघ भी शरणार्थियों की बढ़ती संख्या का बोझ उठाने में सफल नहीं हो पा रहा है। दुनिया में शरणार्थी समस्या रोकने के लिए अभी तक कोई पुख्ता नीति नहीं बन रही है। शरणार्थी होने के लिए लोग क्यों विवश होते हैं, इस पर भी सोच और नजरिया कई वादों से ग्रसित है। 

शरणार्थी बनने की प्रक्रिया पर भी विचार करना जरूरी है। शरणार्थी बनते क्यों हैं लोग? कौन बनाता है शरणार्थी? शरणार्थी बनाने के प्रति कोई दुराग्रह,  कोई कूटनीति भी होती है क्या? दुनिया में शरणाॢथयों के प्रति सिर्फ  मानवीय भाव है, ऐसा नहीं है। उनके प्रति कई भाव हैं जो शरणार्थियों की समस्याओं को बढ़ाने और उन्हें तिरस्कार का सामना करने के लिए बाध्य करते हैं। अराजकता के कारण लोग शरणार्थी बनने के लिए बाध्य होते हैं, पर शरणार्थी बनाने का काम भी दुनिया में धड़ल्ले के साथ जारी है। 

यह कहना गलत नहीं होगा कि दुनिया भर में यह बात बड़ी गहरी बनी हुई है कि अब शरणार्थी बनाने का काम किया जा रहा है, शरणार्थी बनाने के उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ बेहतर जिंदगी की खोज नहीं होती है, बल्कि अन्य रक्तरंजित और मजहबी उद्देश्य भी होते हैं, किसी सभ्यता और संस्कृति को नष्ट करने का उद्देश्य भी होता है, किसी रक्तरंजित संस्कृति के विस्तार का उद्देश्य भी होता है। जनसंख्या जेहाद के माध्यम से अपनी संस्कृति को सर्वश्रेष्ठ बनाना भी एक उद्देश्य होता है। यह सोच कोई सतही भी नहीं है, यह सोच कोई झूठी भी नहीं है, यह सोच पूरी तरह चाकचौबंद है। 

शरण देने वालों का अंजाम
हाल के वर्षों में जब आप शरणार्थी समस्या का विश्लेषण करेंगे तो पाएंगे कि शरणार्थियों के खिलाफ  ऐसी सोच किसी न किसी रूप में सही है। किसी न किसी रूप में शरणार्थी रक्तरंजित और खतरनाक समस्याओं के प्रति जिम्मेदार भी हैं। पिछले दस सालों में अमरीका और यूरोप में आतंकवाद की घटनाओं को जब आप देखेंगे तो पाएंगे कि कभी न कभी शरणार्थी के तौर पर शरण लेने वाले लोग उसके लिए जिम्मेदार रहे हैं। कहने का अर्थ यह हुआ कि शरणार्थी भस्मासुर भी बन जाते हैं। जिस देश ने शरण दी उसी देश में शरणार्थी अपराध, आतंकवाद और घृणा की रक्तरंजित और खतरनाक व्यवस्था के जिम्मेदार बन गए। 

जर्मनी ने सीरिया के लाखों शरणार्थियों को शरण देने का काम किया पर जर्मनी जैसे शरण देने वाले देशों का हाल क्या हुआ, यह जानकर आप चिंतित हो जाएंगे और शरणार्थी को सिर्फ मानवीय आधार की बात नहीं करेंगे, बल्कि शरणार्थियों को भस्मासुर के तौर पर भी देखेंगे। जर्मनी में पहुंचते ही सीरिया के शरणार्थियों ने अपराधों की खतरनाक मानसिकताओं से, शांति से रहने वालों को डरा कर रख दिया था। खास कर महिलाओं के प्रति बलात्कार और छेडख़ानी की घटनाएं बढ़ गई थीं। अमरीका और यूरोप की महिलाएं उदारवाद की वाहक हैं। बंद समाज में आने वाले शरणार्थी अमरीका-यूरोप की उदार महिलाओं को देख कर वासना और उत्तेजना के वाहक बन बैठे। ऐसी घटनाओं को नजरअंदाज करना भी गैर-जरूरी है। 

दुनिया में तीन तरह की सत्ता व्यवस्था से शरणार्थी समस्या घातक बनती है। पहली मुस्लिम सत्ता व्यवस्था, दूसरी कम्युनिस्ट तानाशाही वाली सत्ता व्यवस्था और तीसरी विफल देशों वाली सत्ता व्यवस्था है। अधिकतर मुस्लिम देशों में आतंकवाद और हिंसा जारी है। मुस्लिम देशों में इस्लाम के फिरकों के बीच लड़ाई जारी है। हमारा इस्लाम अच्छा है, तुम्हारा इस्लाम खराब है, की मानसिकताओं के घेरे में आतंकवाद और गृहयुद्ध जारी है। सीरिया में शिया शासन है पर सुन्नी शिया शासन के खिलाफ हिंसकराह पर हैं। 

अफगानिस्तान, लेबनान, ईराक, सूडान, पाकिस्तान जैसे मुस्लिम देशों की कहानी कौन नहीं जानता है। दुनिया के 90 प्रतिशत शरणार्थी मुस्लिम गिरोह से आते हैं। अभी-अभी कम्युनिस्ट तानाशाही वाले देश वेनेजुएला के लाखों लोग पड़ोसी देशों में शरणार्थी बनने के लिए बाध्य हुए हैं। वेनेजुएला में आज मंदी का दौर है। वहां की अर्थव्यवस्था चरमरा गई है। भूख और बेकारी से पलायन जारी है। इस पलायन का बोझ वेनेजुएला के पड़ोसी देश उठाने के लिए मजबूर हैं। इसी तरह दुनिया के कई ऐसे देश हैं जो असफल हैं जिनके यहां अराजक राजनीतिक स्थिति के कारण भुखमरी उत्पन्न होती है। इन असफल देशों में मैक्सिको, वेनेजुएला और अफ्रीकी देश आदि आते हैं। भारत जैसा देश भी रोहिंग्या जैसी समस्या से जूझ रहा है। रोहिंग्या पहले म्यांमार और फिर भारत की शांति के लिए खतरा बने हुए हैं। रोहिंग्या आतंकवाद ने म्यांमार को झकझोर कर रख दिया था, प्रति हिंसा जब हुई तो रोहिंग्या मुसलमान भारत में अवैध घुसपैठ कर समस्या बन बैठे। 

अमरीका और यूरोप ने शरणार्थियों के प्रति अब कड़ा रुख अपनाया है। खासकर अमरीका अब शरणार्थियों के बोझ को उठाने के लिए तैयार नहीं है। उसने शरणार्थी नीति कड़ी कर दी है। मैक्सिको सीमा पर दीवार खड़ी करने की ओर आगे कदम बढ़ाए हैं। हजारों शरणार्थियों को पकड़ कर जेलों में डाला गया है। यूरोपीय देशों पर भी भारी दबाव है। खासकर राष्ट्रवादी समूह अपनी सरकार पर दबाव बनाए हुए हैं, ऐसी स्थिति में शरणार्थी समस्या तो बढ़ेगी। शरणार्थी भस्मासुर नहीं होंगे, इसकी गारंटी भी तो कोई देने वाला नहीं है?-विष्णु गुप्त