संसद का आगामी मानसून सत्र ‘ऐतिहासिक’ होगा

09/01/2020 2:47:38 AM

संसद का आने वाला मानसून सत्र ऐतिहासिक हो सकता है क्योंकि 1952 से लेकर संसद अपनी परम्परा से कभी भी नहीं हटा। संसद का यह मानसून सत्र 14 सितम्बर से 1 अक्तूबर तक चलेगा, जो कई चीजें पहली बार देखेगा। कोविड महामारी के कारण 23 मार्च को बजट सत्र में कटौती की थी। इसके बावजूद महामारी अभी भी निरंतर बढ़ रही है। इसलिए संसद को  संवैधानिक शर्तों को पूरा करने के लिए मिल-बैठना अपेक्षित हो गया था। 

पहली बार दोनों सदन विभिन्न समयों पर मिलेंगे और इसकी अवधि  चार घंटों की होगी। सांसदों को सामाजिक दूरी की पालना करनी होगी तथा सदन, चैम्बर और यहां तक कि लॉबी में दूरी बना कर बैठना होगा। उनका कोविड के लिए टैस्ट होगा। जहां तक संभव होगा मानसून का यह सत्र पेपरलैस सत्र होगा। इस सत्र में मात्र 18 बैठकें होंगी। सदस्यों को अपने निर्वाचन क्षेत्रों को वापस लौटने की अनुमति नहीं होगी। राज्यसभा के चेयरमैन एम. वेंकैया नायडू तथा लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला कई बैठकों के बाद इस निर्णय पर पहुंचे हैं। 

इन पाबंदियों के बावजूद इन दोनों के लिए यह बहुत बड़ी चुनौती होगी। कई बैठकों के बाद उन्होंने परम्परा से जुड़े रहने का निर्णय लिया तथा दोहरे सत्र की मुश्किलों से पार पाने की कोशिश की है। यहां तक कि नायडू तथा बिड़ला ने संसद की इस कार्रवाई को सुरक्षित बनाने के लिए ड्रैस रिहर्सल तक की। मंत्री वर्ग तथा विपक्ष द्वारा मिल रहे संकेतों से स्पष्ट है कि यह सत्र एक गर्मागर्मी वाला हो सकता है। इस सत्र के दौरान ऐसा भी प्रस्ताव है कि प्रश्रकाल को कम किया जाए क्योंकि प्रत्येक दिन चार घंटों के लिए सत्र जारी रहेगा। सदस्यों के लिए आसन के निकट या बहिष्कार करना मुश्किल होगा। इस सत्र में 11 अध्यादेश, 20 बिल होंगे। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर कोविड हालातों से निपटने के विषय पर हमला करने के लिए विपक्ष अपने हथियार तेज कर रहा है। केंद्र तथा राज्य सरकारों को अनेकों उपायों को अपनाने के बावजूद भी महामारी निरंतर बढ़ रही है। इस विषय पर भी बहस होना जरूरी है। दूसरी बात अर्थव्यवस्था की है जोकि लॉकडाऊन के चलते प्रभावित हुई है। अनेकों ने अपनी नौकरियां गंवा दीं और लाखों की तादाद में प्रवासी श्रमिकों को अभी भी वापस लौटना है। विशेषज्ञों का कहना है कि साधारण हालात होने के लिए दो वर्षों का समय लग सकता है। तीसरा भारत तथा चीन में गलवान घाटी को लेकर गतिरोध चल रहा है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी चीन को लेकर पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं। इस मसले पर कांग्रेस की योजना प्रधानमंत्री से स्पष्टीकरण मांगने की है। 

चौथी बात यह है कि कश्मीर मुद्दा भी चल रहा है। यहां तक कि एक साल के बाद भी घाटी में साधारण स्थिति का लौटना बाकी है। लॉकडाऊन के चलते विकास कार्यों को धक्का पहुंचा है। उपराज्यपाल मनोज सिन्हा राजनीतिक बातचीत को बढ़ाने के लिए आगे आए हैं। इसके साथ-साथ उन्हें विधानसभा चुनावों तथा परिसीमन की बात को भी आगे बढ़ाना है। घाटी में विभिन्न स्थानीय तथा राष्ट्रीय पार्टियों की ओर से यथास्थिति बनाने की मांग भी चल रही है। 

कांग्रेस नेता शशि थरूर के नेतृत्व वाली आई.टी. पर स्टैंङ्क्षडग कमेटी फेसबुक के मुख्य कार्यकारी को बुलाना चाहती है। जबकि भाजपा इसका विरोध कर रही है। इसके अलावा 32 सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की बिक्री तथा रेलवे व हवाई अड्डों को निजी पाॢटयों को सौंपने का मुद्दा भी चर्चा का विषय है। सुशांत राजपूत आत्महत्या केस जोकि कोर्ट के समक्ष लंबित है, ने भी बहुत ज्यादा विवादों को उपजाया है। भाजपा भी ऐेसे हमलों को झेलने के लिए कमर कसे हुए है तथा विपक्ष पर हमले करने के लिए तैयार है। सत्र के दौरान वह विपक्ष को किसी भी तरह अपने ऊपर हावी नहीं होने देगी। 

महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या कमजोर विपक्ष ने संयुक्त फ्लोर रणनीति की कोई योजना बना रखी है। अभी तक कोई भी बैठक आयोजित नहीं की है। कांग्रेस 23 कांग्रेसी नेताओं द्वारा सोनिया गांधी को पिछले महीने पार्टी में सुधारों की जरूरत को लेकर लिखे गए पत्र के बाद अंदरूनी कलह से जूझ रही है। इस पर जवाब देते हुए सोनिया ने कुछ नए सदस्यों को शामिल कर तथा कुछ को निकाल कर संसदीय टीम का पुनर्गठन किया है। पिछले सत्र से पूर्व सोनिया ने 22 दलों की बैठक बुलाई थी। जब तक विपक्ष बिखरा हुआ रहेगा, मोदी सरकार को इसका फायदा मिलता रहेगा। 

कुछ वर्षों से संसद ने शोरो-गुल वाले दृश्य तथा वाकआऊट देखा है। महामारी की संवेदनशीलता के मद्देनजर जिससे कि लोग मर रहे हैं, मंत्री वर्ग तथा विपक्ष दोनों पर ही संसद की शांत कार्रवाई की जिम्मेदारी बनती है। जबकि सरकार को भी विपक्ष की बात सुननी होगी तथा विपक्ष को एक रचनात्मक भूमिका अदा करनी होगी। इन सब बातों को लेकर करने से कहना बेहद आसान है। सभी दलों के सदस्यों के लिए एक मौका है कि वह इस बात को दर्शाए कि वह सही तरीके में लोगों के प्रतिनिधि हैं तथा आगे बढऩे के लिए वह अपने सभी मतभेदों को हटा कर देश को आगे बढ़ाएंगे। यह एक बहुत महंगा सवाल है कि क्या वह ऐसा कर सकेंगे?-कल्याणी शंकर


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Content Writer

Pardeep

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