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समय आ गया है कि हमारी जनता अपनी ‘सोच’ बदले

2020-03-17T03:48:07.493

कोरोना वायरस के प्रकोप के बीच उत्तर प्रदेश की राजनीति में तूफान आया हुआ है और यह तूफान पिछले वर्ष दिसम्बर में लखनऊ में नागरिकता संशोधन कानून विरोधी प्रदर्शन के दौरान सार्वजनिक सम्पत्ति को नुक्सान पहुंचाने वाले 57 कथित दंगाइयों के पोस्टर और होर्डिंग लगाने के अभूतपूर्व कदम के बारे में है। इस दौरान व्यापक हिंसा हुई थी और पुलिस द्वारा कार्रवाई की गई। इस हिंसा में 18 मौतें हुई थीं। यह बताता है कि आपकी स्वतंत्रता वहां समाप्त होती है जहां मेरी नाक शुरू होती है। 

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने स्वत: कार्रवाई करते हुए दो महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं कि ऐसे बैनर और होॄडग लगाने का कोई कानूनी आधार नहीं है क्योंकि यह संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत निजता के मूल अधिकार का उल्लंघन करता है और न्यायालय ने आदेश दिया कि ये होॄडग और पोस्टर निकाले जाएं। उसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने उच्चतम न्यायालय में अपील की और उच्चतम न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार के दंगाइयों के नाम को सार्वजनिक करने के कदम को एक कठोर कदम बताया। विशेषकर तब जबकि इन दंगाइयों की देयता का निर्धारण न्यायालय द्वारा किया जाना है और इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय पर स्थगनादेश देने से इंकार कर दिया। साथ ही यह भी कहा कि राज्य सरकार के निर्णय का कोई कानूनी आधार नहीं है। 

कोई भी लोकतंत्र कानून की उचित प्रक्रिया के बिना लोगों को दंडित करने की अनुमति नहीं दे सकता
न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार से बार-बार पूछा कि उसे लोगों के नाम सार्वजनिक कर उन्हें बदनाम करने की शक्ति किस कानून से मिली है और कहा कि कोई व्यक्ति ऐसा कार्य कर सकता है जो कानून द्वारा निषिद्ध नहीं है किन्तु राज्य केवल कानून के अनुसार ही कार्रवाई कर सकता है। यह राज्य तंत्र की शक्ति से व्यक्ति को संरक्षण देने का कानून के शासन का महत्वपूर्ण पहलू है और कोई भी लोकतंत्र कानून की उचित प्रक्रिया के बिना लोगों को दंडित करने की अनुमति नहीं दे सकता है, किन्तु न्यायालय ने इस मामले को बड़ी पीठ को भेज दिया। 

उत्तर प्रदेश सरकार ने अपने बचाव में तर्क दिया कि इन नागरिकों ने अपनी निजता का अधिकार तब खो दिया जब उन्होंने सार्वजनिक रूप से यह कार्य किया और ये पोस्टर और बैनर भविष्य में एक प्रतिरोधक के रूप में कार्य करेंगे तथा कहा कि न्यायालय को ऐसे मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए क्योंकि आरोपियों ने सार्वजनिक और निजी सम्पत्ति को नष्ट किया है। उन्हें इसकी क्षतिपूर्ति करनी होगी अन्यथा उनकी सम्पत्ति जब्त की जाएगी। 

बिना मुकद्दमे के किसी गलती को करने वाले व्यक्ति को दंडित नहीं किया जा सकता
एक सामाजिक कार्यकत्र्ता का कहना है कि गंभीर अपराधों के आरोपियों के साथ भी ऐसा बर्ताव नहीं किया जाता है जैसा कि तोडफ़ोड़ करने के आरोपियों के साथ किया जा रहा है और यहां सरकार की मंशा लगता है बदला लेने की है। कोई भी राज्य प्रशासन प्रभावी प्रतिरोधक के नैतिक पहलुओं के कारण ऐेसे कदम नहीं उठा सकता है। किसी व्यक्ति के नाम को सार्वजनिक कर उसे बदनाम करना हास्यास्पद है क्योंकि बिना मुकद्दमे के किसी गलती को करने वाले व्यक्ति को दंडित नहीं किया जा सकता है। राज्य की कानून और व्यवस्था बनाने की शक्ति कितनी भी बड़ी क्यों न हो उसे मूल अधिकारों के हनन की अनुमति नहीं दी जा सकती। 

दंगाई अपनी निजता के उल्लंघन का सहारा ले सकते हैं
एक संकीर्ण राजनीतिक दृष्टिकोण से देखें तो दंगाई अपनी निजता के उल्लंघन का सहारा ले सकते हैं और कह सकते हैं कि यह उनकी सुरक्षा के लिए खतरा है और इसमें बदले की भावना है क्योंकि उन्हें राष्ट्रदोही के रूप में अपमानित किया जा रहा है और इस तरह योगी सरकार विरोध प्रदर्शन और विमत के प्रति असहिष्णु है, जबकि अन्य राज्यों ने नागरिकता संशोधन कानून के विरोध प्रदर्शन के प्रति सकारात्मक रुख अपनाया है। दूसरी ओर इस पोस्टर  विवाद में समाजवादी पार्टी भी कूद गई है जिसने भाजपा के बलात्कार के आरोपी विधायक सेंगर और पूर्व केन्द्रीय मंत्री चिन्मयानंद के पोस्टर लगा दिए हैं। किन्तु इससे दो महत्वपूर्ण मुद्दे उठते हैं। सार्वजनिक और व्यक्तिगत जीवन को विभाजित करने वाली रेखा कौन-सी है? क्या कोई व्यक्ति यदि निजी जीवन में अनैतिक है तो क्या सार्वजनिक जीवन में नैतिक हो सकता है? क्या निजी जीवन का लोगों से कोई सरोकार है? नैतिकता और सत्यनिष्ठा के मापन का पैमाना क्या है? 

दूसरी ओर प्रधानमंत्री मोदी अक्सर इस बात पर बल देते हैं कि प्रत्येक नागरिक को मूल अधिकार प्राप्त हैं किन्तु साथ ही उसे कुछ मूल कत्र्तव्य भी दिए गए हैं जिनका पालन करना उसका राष्ट्रीय कत्र्तव्य है। गांधी जी की बात को दोहराते हुए ‘‘हम अपनी जिम्मेदारियों को पूरा किए बिना अपने अधिकारों की रक्षा नहीं कर सकते हैं। हम तभी अपने सभी अधिकारों की अपेक्षा कर सकते हैं जब हम अपने सभी कत्र्तव्यों को ठीक से पूरा करते हैं।’’ 

आज तक निजता का मुद्दा केवल हमारे नेतागणों से जुड़ा रहा किन्तु आज उत्तर प्रदेश के इन पोस्टरों और होॄडगों ने राजनीतिक सोच में बदलाव ला दिया है। जहां पर सरकार ने नागरिकों के निजता के अधिकार को उसके मूल कत्र्तव्यों से जोड़ दिया है ताकि वे अपने अधिकारों के बहाने सार्वजनिक क्षेत्र में विभिन्न कृत्य न करें। इसके अलावा यदि कोई नेता सार्वजनिक जीवन में प्रवेश करता है तो उसे अपनी निजता की कीमत चुकानी पड़ती है। उसे जनता के प्रति जवाबदेह बनना पड़ता है और यही बात उन नागरिकों पर भी लागू होती है जो सार्वजनिक जीवन में आ जाते हैं। दिल्ली के शाहीन बाग में चला धरना-प्रदर्शन इस बात का उदाहरण है जहां पर नागरिकों ने अपने साथी नागरिकों के प्रति अपने कत्र्तव्यों को त्याग दिया है जिसके चलते लोगों को भारी परेशानी हो रही है। 

कोई व्यक्ति उत्पात मचा कर सार्वजनिक सम्पत्ति बर्बाद नहीं कर सकता
इसी तरह नागरिकता संशोधन कानून और एन.पी.आर. के मुद्दे पर विभिन्न राज्यों में हिंसा भी इसका उदाहरण है। अत: इस तर्क में दम है कि जब राज्य कहता है कि नागरिकों का भी राज्य के प्रति कत्र्तव्य है। कोई व्यक्ति उत्पात मचा कर सार्वजनिक सम्पत्ति बर्बाद नहीं कर सकता है क्योंकि सार्वजनिक सम्पत्ति आखिर जनता की होती है। शायद इसी वजह से संविधान निर्माताओं ने निजता के प्रावधान को संविधान में नहीं जोड़ा, जबकि कई अन्य देशों में ऐसा प्रावधान है। 

आज के सोशल मीडिया के जमाने में एक नई तरह की बदनाम करने की संस्कृति पैदा हो गई है
ब्रिटेन में निजता का अधिकार नहीं है इसलिए निजता के भंग होने पर न्यायालय को कार्रवाई करने का अधिकार भी नहीं है। अमरीका में प्रैस को इस आधार पर सार्वजनिक व्यक्तियों के बारे में किसी भी सच्ची खबर को छापने की अनुमति है कि सभी मानव क्रियाकलाप व्यक्ति के सच्चे चरित्र को उजागर करते हैं। इसके अलावा आज के सोशल मीडिया के जमाने में एक नई तरह की बदनाम करने की संस्कृति पैदा हो गई है। फेसबुक, इंस्टाग्राम और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर ऐसी बातें सार्वजनिक की जाती हैं। ट्विटर पर तत्काल किसी व्यक्ति का उपहास उड़ाया जा सकता है। 

कुल मिलाकर हमारे देश को भीड़ की शक्ति और कत्र्तव्यों व जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाना होगा। दंगाइयों को दंडित किया जाना चाहिए। समय आ गया है कि हमारी जनता अपनी सोच बदले और इस बात पर विचार करे कि मूल अधिकारों के साथ-साथ राज्य के प्रति हमारे मूल कत्र्तव्य भी हैं। हमें इस ओर ध्यान देना होगा अन्यथा हमारे राष्ट्र की नींव कमजोर होगी। उत्तर प्रदेश सरकार ने हिंसा के लिए दंगाइयों को जिम्मेदार ठहराने का मार्ग दिखा दिया है। यह एक शांतिपूर्ण स्वतंत्र भारत की दिशा में पहला कदम है जहां पर लोकतंत्र सर्वोच्च है और इस बारे में प्रश्न नहीं उठाए जा सकते हैं।-पूनम आई. कौशिश
 


Pardeep

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