सुशांत-रिया का मामला-कानून के ‘गले की हड्डी’ बन गया

2020-08-11T03:24:34.44

सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या या फिर हत्या का मामला सनसनीखेज होकर इतना बड़ा बना दिया गया है कि उसके आगे अब कोरोना संकट भी छोटा दिखने लगा है। इस मामले में बिहार और महाराष्ट्र सरकार के बीच तलवारें खिंचने के बाद केंद्र की सी.बी.आई. और ई.डी. भी मैदान में कूद पड़ीं। बिहार की जिला अदालत, बॉम्बे हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में भी इसी मामले पर अलग-अलग तरीके से सुनवाई चल रही है। आज सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट का जो भी फैसला आए, लेकिन इस मामले की उलझनें कम होती नहीं दिख रहीं। 

बिहार और महाराष्ट्र के बीच क्षेत्राधिकार की जंग : संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत कानून-व्यवस्था और पुलिस के मामले राज्य सरकारों के अधीन रहते हैं। केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए विशेष कानून के तहत सी.बी.आई. को भी पुलिस जांच के सभी अधिकार मिले हुए हैं। परंपरा के अनुसार राज्य सरकार की अनुशंसा या फिर अदालत के आदेश के बाद ही राज्यों की पुलिस से जुड़े मामलों को सी.बी.आई. के हवाले किया जा सकता है। लेकिन इस मामले में विचित्र स्थिति बन गई है। 

आत्महत्या या उससे जुड़े हुए अपराध महाराष्ट्र में हुए हैं जहां पर मुंबई पुलिस या महाराष्ट्र की राज्य सरकार का क्षेत्राधिकार है। लेकिन मुंबई पुलिस इस मामले में एफ.आई.आर. दर्ज करने की बजाय सी.आर.पी.सी. की धारा 174 के तहत पिछले कई दिनों से जांच कर रही है। ऐसी जांच जल्दी ही खत्म करके उसकी रिपोर्ट स्थानीय एस.डी.एम. या मैजिस्ट्रेट को सौंप दी जाती है। इसके उलट मुंबई पुलिस 40 लोगों से पूछताछ के बावजूद किसी नतीजे पर नहीं पहुंची है। सुशांत के पिता की शिकायत और देशव्यापी हो-हल्ले के बावजूद मुंबई पुलिस द्वारा एफ.आई.आर. दर्ज नहीं करने से महाराष्ट्र पुलिस और सरकार दोनों ही संदेह के दायरे में आ जाते हैं। मुंबई पुलिस की जांच में अनेक खामियां हैं। 

इसके बावजूद, कानून के अनुसार मुम्बई में हुए अपराध के लिए बिहार पुलिस को एफ.आई.आर. दर्ज करके जांच करने का कोई अधिकार नहीं है। कानून को यदि कायदे से लागू किया जाए तो सुशांत के पिता की शिकायत के बाद जीरो एफ.आई.आर. दर्ज करके उसे कार्रवाई के लिए मुंबई पुलिस के पास भेजा जाना चाहिए था। इसकी बजाय आनन-फानन में मामले को सी.बी.आई. के हवाले करने से बिहार सरकार की सियासी मंशा कटघरे में आ जाती है। बिहार पुलिस के अधिकारियों ने मुंबई में समानांतर जांच शुरू कर दी और बी.एम.सी. ने आई.पी.एस. अधिकारी को क्वारंटाइन में भेज दिया, उससे यह मामला राजनीति के मैदान का फुटबॉल बन गया लगता है। दोनों राज्यों के पुलिस अधिकारियों को यह समझना चाहिए कि इन चिरकुट झगड़ों से पुलिस की साख में गिरावट आती है, जो समाज, देश और संविधान सभी के लिए शुभ नहीं है। 

सी.बी.आई. जांच हर मर्ज की दवा नहीं : सुशांत सिंह से पहले उसकी मैनेजर दिशा सालियान की रहस्यमयी परिस्थितियों में मृत्यु को आत्महत्या बता कर मामले को रफा-दफा कर दिया गया था। सुशांत सिंह के बाद टी.वी. कलाकार समीर शर्मा, भोजपुरी अभिनेत्री अनुपमा पाठक समेत कई अन्य फिल्मी कलाकारों ने आत्महत्या की है। कालेधन, अपराध और सियासत से फिल्मी सितारों का नापाक रिश्ता हाजी मस्तान के दिनों से उजागर रहा है। फिल्म इंडस्ट्री से ज्यादा वंशवाद तो राजनीति और न्यायपालिका में है, जो सरकारी पैसे के दम पर चल रहे हैं। बेहतर है कि बॉलीवुड और अपराध के नापाक रिश्ते की सी.बी.आई. और ई.डी. द्वारा जांच हो, जिससे समाज और देश का ज्यादा भला होगा। 

बिहार में पिछले 7 वर्षों से सी.बी.आई. द्वारा नवरुणा कांड की जांच की जा रही है और इस बीच सी.बी.आई. के 6 डायरैक्टर बदल गए। इस मामले में जांच अवधि बढ़ाने के लिए सी.बी.आई. ने सुप्रीम कोर्ट से 10 बार मोहलत मांगी है, लेकिन लापता लड़की का अभी तक कोई सुराग नहीं मिला। सिवान के पत्रकार राजदेव रंजन की हत्या के दूसरे मामले में भी सी.बी.आई. पिछले 5 सालों से कोई सुराग नहीं लगा पाई है। 

बिहार में कई सौ करोड़ के सृजन घोटाले में मुख्य अभियुक्तों का अभी तक कोई पता नहीं चला। महाराष्ट्र में पालघर मामले की सी.बी.आई. से जांच की मांग का मामला भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। इस पृष्ठभूमि में सुशांत मामले की सी.बी.आई. जांच से हैरतअंगेज रिजल्ट की उम्मीद कैसे की जा सकती है? इस बात को भी समझने की जरूरत है कि राज्यों से जुड़े ऐसे मामलों में सियासतदानों द्वारा सी.बी.आई. जांच पर ज्यादा जोर दिए जाने से, आम जनता का पुलिस पर भरोसा और भी कम हो जाता है। 

रिया चक्रवर्ती और दिशा सालियान का मीडिया ट्रायल: इस पूरे मामले में सोशल मीडिया के माध्यम से जिस तरह से रिया चक्रवर्ती और दिशा सालियान के चरित्र पर उंगली उठाई जा रही है उससे एक खतरनाक नजीर बनती है। दिशा के पिता ने तो अफवाहों से तंग आकर मुंबई पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है। सी.बी.आई. जांच और अदालत के फैसले के पहले ही रिया या दिशा का मीडिया ट्रायल और चरित्र हनन करना कानूनन गलत है, जिस पर भी सुप्रीम कोर्ट को सख्त आदेश पारित करना चाहिए। 

रिया चक्रवर्ती ने सुप्रीम कोर्ट में दिए अपने हलफनामे में खुद को सुशांत सिंह राजपूत का लिव-इन पार्टनर बताया है। भारतीय कानून में लिव-इन रिलेशनशिप को अभी तक औपचारिक मान्यता नहीं मिली है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के अनेक फैसलों के तहत लिव-इन में रहने वाली महिला पार्टनर और उसके बच्चों को अनेक अधिकार हासिल हो जाते हैं। बॉलीवुड में कल्कि समेत अनेक हीरोइनें लिव-इन रिलेशनशिप में मां भी बनी हैं। इन परिस्थितियों में सुशांत सिंह राजपूत के पैसों पर उसके पिता या बहन से ज्यादा रिया का कानूनी हक बनता है। ऐसे व्यक्तिगत मामलों में पी.एम.एल.ए. कानून के तहत ई.डी. की जांच का कोई औचित्य नहीं बनता। 

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी जटिलता बनी रहेगी: व्यक्तिगत आत्महत्या और अपराध के मामलों में पी.आई.एल. के दुरुपयोग से न्यायिक व्यवस्था भी विवादों के दायरे में आ गई है। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ने सी.बी.आई. जांच के लिए दायर पी.आई.एल. को डिसमिस कर दिया था, पर इस मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट में समानांतर सुनवाई हो रही है। 

बिहार के एक वकील ने सी.जे.एम. की अदालत में सलमान खान, करण जौहर, एकता कपूर, संजय लीला भंसाली समेत 8 लोगों के खिलाफ आपराधिक मुकद्दमा दर्ज कराया है। बिहार सरकार की अनुशंसा पर केंद्र सरकार द्वारा सी.बी.आई. जांच पर यदि सुप्रीम कोर्ट की मोहर लग भी गई तो भी आने वाले समय में मुंबई पुलिस इस मामले की समानांतर जांच जारी रखकर गतिरोध बनाए रख सकती है। 

इस मामले में भी यदि महाराष्ट्र सरकार सी.बी.आई. की टीम को पूरा सहयोग प्रदान नहीं करे तो फिर मामले में दूध का दूध और पानी का पानी कैसे होगा? सुशांत का मामला बिहार और महाराष्ट्र की सियासत से जुड़ा है या फिर इस जांच से बॉलीवुड की गंदगी साफ होगी? सुप्रीम कोर्ट की मोहर के बाद, सी.बी.आई. की शुरूआती जांच से इन सवालों का जवाब सामने आ जाएगा।-विराग गुप्ता(सुप्रीम कोर्ट के वकील)


Pardeep

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