‘1857 के स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में एक पृष्ठ ऐसा भी’

2020-11-27T04:35:28.37

1857 के आजादी संग्राम ने अंग्रेजी सल्तनत की चूलें हिला दी थीं। अंग्रेजों को हाथों-पैरों की पड़ गई थी। इस स्वाधीनता की आग को ठंडा करने के लिए 1858 में महारानी विक्टोरिया का एक घोषणा पत्र हिंदोस्तानियों को खुश रखने के लिए जारी करना पड़ा था परन्तु अंग्रेजों की विकृतियां आज भी हिंदोस्तानियों के दिलों को दहला देती हैं।

1857 के संग्राम का इतिहास पढ़  कर लगता ही नहीं कि अंग्रेज एक सभ्य कौम थी। हिंदुस्तान के लोग यह भी जान लें कि अंग्रेजी कौम ने इस स्वाधीनता संग्राम में सिर्फ दिल्ली की तीन दिन की लड़ाई में दस लाख मासूम  लोगों का कत्ल कर दिया था। दिल्ली के मुगल सम्राट बहादुर शाह ‘जफर’ के पुत्रों, पौत्रों को तोपों से उड़ा दिया था। 

बूढ़े मुगल सम्राट को रंगून (तब बर्मा की राजधानी) में दफनाने को भी जगह नहीं दी थी। दिल्ली के इस रक्तपात में हिंदू-मुस्लिम का इकट्ठा खून बहा था। हम तो सिर्फ एक औरत महारानी झांसी की शौर्य गाथा गाते हैं। लाखों आजादी के परवाने लक्ष्मी बाई झांसी की तरह कत्ल कर दिए गए। मुझे तो तीन-चार साल पहले अमृतसर जिले के कस्बे अजनाला का कुआं देखकर अंग्रेजी कौम की बर्बरता पर हैरानी हुई कि कैसे इस कुएं में 250 बागी हिंदोस्तानी फौजियों को अमृतसर के  तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर ने कत्ल करवा, उनकी लाशों को इस कुएं में डलवा दिया। 

1857 का स्वाधीनता संग्राम वीरों की गाथाओं से भरा पड़ा है परन्तु वीर-गाथाओं में एक शर्मसार करने वाला भी पन्ना है। यदि वह पन्ना आज मैं पाठकों के सामने रखूं तो पाठक दांतों तले उंगली दबा लेंगे। लिखने तो मैं वीर सेनानियों का इतिहास चला था पर नजर 1857 में एक कायर सिपाही पर रुक गई। अंग्रेजों की सेना में मुख्यत: सिपाही अपने स्वामी के प्रति निष्ठावान थे। इसका एक प्रमाण है सूबेदार सीता राम का आत्मवृतांत (आत्मकथा) का। वह अंग्रेजों की बंगाल आर्मी का 40 साल का साधारण सिपाही था। उसे तरक्की देकर सूबेदार बना दिया। वह सूबेदार बनना ही नहीं चाहता था। अंग्रेजों के प्रति उसकी स्वामीभक्ति अटल थी।

1857 के इस संग्राम में स्वतंत्रता सेनानी हिंदुस्तानी सिपाहियों ने सीताराम को पकड़ लिया। उससे कहा गया कि वह अंग्रेजों का साथ छोड़ दे। उसका मन बदलने की बहुत कोशिशें स्वतंत्रता सेनानियों ने कीं परन्तु सीताराम अपनी अंग्रेजों के प्रति स्वामीभक्ति छोड़ने को तैयार नहीं हुआ। उसे भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों ने जेल में रखा परन्तु ज्यों ही जेल से छूटा अंग्रेजों की फौज के सिपाही के नाते, स्वतंत्रता संग्रामियों पर टूट पड़ा। विद्रोही सिपाहियों से लड़ता रहा। अपने अंग्रेज अधिकारी के कहने पर उसने अपने कार्यकाल की यादें लिख कर प्रकाशित भी कीं। 1873 में उसका अंग्रेजी में अनुवाद ‘फ्रॉम सिपॉय टू सूबेदार’ (सूबेदार सीताराम) हुआ। 

इस पुस्तक को पढ़ कर सीताराम और उनके जैसे अनगिनत सिपाहियों की मानसिकता का पता चलता है। युद्ध की इस विभीषिका में सीताराम अपनी पलटन से भटक गया। अपनी पलटन से भटक जाने पर भी सीताराम स्वतंत्रता सेनानियों से लड़ता रहा। उसे लालच भी दिया कि वह हिंदुस्तानी स्वतंत्रता सेनानियों से मिल जाए। कई दलीलें उसे समझाने के लिए दी गईं परन्तु प्रत्येक दलील पर यही कहता वह नमक हरामी नहीं कर  सकता। अंग्रेज सरकार ने उसे नौकरी दी है जिससे उसका परिवार पलता है। नमक हरामी मेरे जहन में नहीं। हर बार यही कहता। स्वतंत्रता-सेनानियों ने उसे मारने की धमकी भी दी परन्तु फिर भी उसने 1857 के स्वतंत्रता सेनानियों का साथ नहीं दिया। सीताराम की अंग्रेजों के प्रति निष्ठा अटल थी। 

हुआ यूं कि सीताराम की अंग्रेजी पलटन ने कुछ स्वतंत्रता सेनानियों को पकड़ लिया। उनमें उसका अपना बेटा भी था। इन सभी स्वतंत्रता सेनानियों को सरकार ने गोली से उड़ाने का हुक्म दिया। उसने अपने अंग्रेज अधिकारी से प्रार्थना की कि उसे अपने बेटे को गोली मारने को मत कहना। इस अमानवीय काम को करने की उसे छूट मिल गई। लेकिन फिर भी सीताराम के लड़के को गोली से उडऩे दिया गया। पलटन के मेजर साहिब ने सीताराम  को अपने बेटे का अंतिम संस्कार करने की अनुमति भी दे दी। 

दूसरे विद्रोही सिपाहियों के अंतिम संस्कार पर पाबंदी लगा दी। इन विद्रोही सिपाहियों को दहन के स्थान पर दफन का हुक्म दिया गया। सीताराम की मानसिकता देखिए कि अपने बेटे के दहन के हुक्म से वह खुश हो गया। मेजर के इस उपकार के बोझ तले वह इतना झुक गया कि उसने ईश्वर से प्रार्थना की कि मेजर साहिब को यथाशीघ्र जनरल का ओहदा मिल जाए। अपने बेटे की मृत्यु से दुखी तो था परन्तु अपने बेटे के स्वतंत्रता सेनानी होने की उसे शर्म आने लगी। उसका बेटा इतना दुर्भाग्यशाली क्यों निकला? उसने नमकहरामी क्यों की? अन्नदाता के खिलाफ मेरा बेटा क्यों उठ खड़ा हुआ? 

सीताराम की यह मानसिकता गुलामी की पराकाष्ठा थी। यह थी सीताराम की अंग्रेजों के प्रति अंधश्रद्धा, आत्म गौरव की कमी। ऐसी अनेक मानसिकताओं ने हिंदुस्तान को हजारों साल गुलाम बनाए रखा। 1857 की यह जंगे-आजादी फेल क्यों हुई? क्योंकि भारत के बहुत से लोग, छोटी-मोटी रियासतों के राजे-महाराजे सीताराम जैसी मानसिकता के गुलाम थे। यह मानसिकता गहराई तक समा चुकी थी। कोई नृप हो इससे हमें क्या हानि? कोई राज हो, हमें इससे क्या  लेना-देना? 

ऐसा भी नहीं कि 1857 के इस सैनिक विद्रोह से पहले साधारण जनता सीताराम जैसी मानसिकता पाल कर बैठे थे। अंग्रेजों के प्रति विद्रोह की प्रवृत्ति यदा-कदा फूटती ही रहती थी। इससे पहले 1757 में प्लासी की लड़ाई को स्वतंत्रता का पहला विद्रोह कह सकेंगे। याद रहे झांसी से काल्पी, काल्पी से ग्वालियर, ग्वालियर से बुंदेलखंड तक किसान, बढ़ई, लोहार, तरखान, नाई, चीर या गांववासी पैसे देने पर भी अंग्रेजों का काम नहीं करते थे। यहां तक कि अंग्रेजों को पानी-पिलाने से भी जन साधारण इंकार कर देता था।

अंग्रेजों से छू जाने पर व्यक्ति को जात-बिरादरी से बाहर कर दिया जाता था। जन मानस को अंग्रेजों के खिलाफ भड़काने का काम साधु, संन्यासी, फकीर किया करते। हमारी फूट के कारण भारत पर आक्रमण होतेे रहे। एकता के अभाव में लूटते गए। कभी सीताराम बने, कभी जय चंद और कभी मीर-जाफर। यही हमारी नियति रही। क्या हम अपने अतीत से कुछ सीख लेंगे?-मा. मोहन लाल(पूर्व परिवहन मंत्री, पंजाब)


Pardeep

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