श्रीलंका के खाद्य संकट ने दिखाए जैविक खेती के खतरे

09/21/2021 5:26:28 AM

भारत जैविक खेती (ऑर्गैनिक फार्मिंग) की ओर बढ़ रहा है। नरेंद्र मोदी ने बिना किसी खरीदे हुए रासायनिक इनपुट के ‘शून्य बजट खेती’ (जीरो बजट फार्मिंग) की प्रशंसा की है। सिक्किम 100 प्रतिशत जैविक खेती वाला एकमात्र राज्य होने का दावा करता है। आंध्र प्रदेश, ओडिशा तथा अन्य गैर-भाजपा शासित राज्य भी जैविक खेती को उत्साहपूर्वक प्रोत्साहित कर रहे हैं। 

इन सभी राज्यों को रुक कर श्रीलंका के कृषि संकट से सीख लेनी चाहिए, जिसके राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे ने अपने देश को पहला पूर्ण जैविक देश बनाने की आशा में, अप्रैल में रासायनिक कृषि इनपुट के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया। इसका परिणाम खाद्य कीमतों में वृद्धि, खाद्य पदार्थों की गंभीर कमी और चाय व रबड़ जैसी निर्यात फसलों के उत्पादन में गिरावट की आशंकाओं के रूप में सामने आया। 

यह इंदिरा गांधी द्वारा उनके गरीबी हटाओ काल (1970 के दशक की शुरूआत) में व्यापारियों पर की गई कार्रवाई और अनाज के पूरे थोक व्यापार के अधिग्रहण की याद दिलाता है। हालांकि यह बुरी तरह विफल रहा और इसे वापस लेना पड़ा था। महंगाई को कानून व्यवस्था की समस्या मानकर व्यापारियों को जेल में डालकर सुलझाना निराशाजनक है। भारत में खाद्य महंगाई पर तब ही लगाम कस सकी, जब हरित क्रांति के जरिए उत्पादन में वृद्धि हुई और इसके लिए बड़े पैमाने पर रासायनिक इनपुट का इस्तेमाल किया गया। 

श्रीलंका के टी-एक्सपर्ट (चाय विशेषज्ञ) हरमन गुनारत्ने ने देश में संभावित विनाश को लेकर चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि अगर हम पूरी तरह जैविक खेती पर निर्भर हो गए तो चाय की 50 फीसदी फसल खो देंगे लेकिन दाम 50 फीसदी ज्यादा नहीं मिलेंगे। उन्होंने अनुमान जताया है कि लागत कम करने के बाद भी ऑर्गैनिक चाय के उत्पादन की लागत 10 गुना ज्यादा पड़ती है। हो सकता है कि टैक्नोलॉजी एक दिन जैविक खेती की ऐसी नई तकनीकें उपलब्ध कराए जो उपज को नुक्सान न पहुंचाएं या कीमतें न बढ़ाएं लेकिन अभी श्रीलंका ने दिखा दिया है कि कृषि को जैविक बनाने के लिए किसी भी जबरन उपाय का अनुसरण करना कितनी बड़ी मुसीबत खड़ी कर सकता है। 

भारत इस वक्त बिहार व अन्य राज्यों के किसानों द्वारा उर्वरक की कमी को लेकर आंदोलन का सामना कर रहा है, वहीं दूसरी ओर पिछले एक साल से तीन नए कृषि कानूनों को वापस लेने के लिए तो किसान आंदोलनरत हैं ही। ऐसे में अगर भाजपा जैविक फसलों को बढ़ावा देने के लिए कोई कठोर कदम उठाती है तो यह उसकी मूर्खता होगी। राज्यों के मुख्यमंत्री जैविक खेती के लिए प्रोत्साहन के साथ प्रयोग कर सकते हैं लेकिन कोई भी इस भ्रम में न रहे कि उपज नहीं गिरेगी और कीमतें नहीं बढ़ेंगी। पूरी दुनिया के साथ-साथ भारत में भी ऐसे लोगों की संख्या बढ़ रही है, जो जैविक उत्पाद खरीदने के लिए मोटी धनराशि चुकाने को तैयार हैं। हां, किसानों का एक छोटा तबका इस मांग को पूरा कर सकता है लेकिन गरीबों के लिए बड़े पैमाने पर खाद्य उत्पादन के लिए उच्च उपज व कम कीमतों की जरूरत होती है और इसके लिए कैमिकल इनपुट जरूरी है। 

जैविक कृषि की पुरजोर वकालत करने वाले सुभाष पालेकर का प्रस्ताव है कि खेती में रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक की जगह गोबर की खाद और गौमूत्र को दूसरी जैविक सामग्री के साथ मिक्स करके इस्तेमाल किया जाए। लेकिन भारत की नैशनल एकैडमी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसिज ने पालेकर की तकनीक को अप्रमाणित करार देते हुए खारिज किया है। एकैडमी का कहना है कि इससे किसानों या उपभोक्ताओं को कोई लाभ नहीं है। हरित क्रांति वैरायटीज मिट्टी से जितना संभव हो सके पोषक तत्व सोख कर उच्च उपज देती हैं। हरित क्रांति से पहले परंपरागत लो यील्ड (कम उपज) वाली वैरायटीज मिट्टी को बेहद जल्दी जर्जर बना देती थीं। इसलिए एक फसल कटने के बाद खेत को फिर से उपजाऊ बनने देने के लिए कुछ वक्त तक खाली छोडऩा पड़ता था। नतीजा कम अनाज उत्पादन, भुखमरी से कई मौतों के रूप में सामने आता था। इसके बाद हरित क्रांति आई। तब से अब तक आबादी तिगुनी हो चुकी है लेकिन कैमिकल इनपुट्स से उच्च उपज वैरायटीज ने अकाल की स्थिति पैदा नहीं होने दी। 

अब इसे गोबर की खाद से बदला नहीं जा सकता। गाय के गोबर में केवल 2 फीसदी नाइट्रोजन होती है, जबकि यूरिया में 46 फीसदी। सभी फसलों के न्यूट्रिएंट्स का एक बेहद ही छोटा हिस्सा पशुओं को खिलाने में इस्तेमाल होता है। उसमें से भी बेहद मामूली हिस्सा उनके गोबर में जाता है। ऐसे में गोबर की खाद कैसे पर्याप्त परिणाम दे सकती है? दाल और सोयाबीन जैसी कुछ फसलें अपनी नाइट्रोजन को जमीन में फिक्स करने में सक्षम हैं और उन्हें बिना कैमिकल उगाया जा सकता है। कुछ फसलों को ग्रीन खाद से उगाया जा सकता है लेकिन उनका उत्पादन बढ़ाने का मतलब है रकबा बढ़ाना, यानी फूड और फाइबर दोनों की कमी। मैं बेहद लंबे वक्त से ऐसी जैविक रूप से संशोधित चावल, गेहूं, कपास और अन्य प्रमुख फसलों के आने की उम्मीद कर रहा था, जो खुद ही जमीन में नाइट्रोजन को फिक्स कर सकें, जैसे कि दालें कर लेती हैं लेकिन ऐसा हुआ नहीं। ऐसे में हमें मानना होगा कि बड़े पैमाने पर कृषि उत्पादन के लिए खेती से खराब होने वाली मिट्टी में फिर से जान फूंकने के लिए उर्वरक जरूरी हैं।-एस.एस.ए. अय्यर (अर्थशास्त्री)


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Content Writer

Pardeep

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