पाकिस्तान में खून के आंसू रोने के लिए मजबूर सिख भाईचारा

10/19/2021 5:04:55 AM

पाकिस्तान में मानवाधिकारों का उल्लंघन तथा धार्मिक अल्पसंख्यकों के विरुद्ध व्यापक भेदभाव निरंतर जारी है। अल्पसंख्यकों में से विशेषकर सिख भाईचारे के प्रति पाकिस्तान का दोगला रवैया समझ से परे है। देखा जाए तो एक ओर पाकिस्तान की सरकार सिखों के लिए गुरुद्वारा-इमारतें निर्मित करके तथा अन्य सुविधाएं प्रदान करके उनके प्रति सद्भावना तथा हिफाजत का प्रदर्शन करती है तथा दूसरी ओर अपने निवासी सिख व्यापारियों, सिख नेताओं तथा महत्वपूर्ण हस्तियों को कट्टरपंथियों द्वारा निशाना बनाकर दिन-दिहाड़े बेरहमी से कत्ल करवाती है। अंदरखाते सिख अवाम को स्थिर करने का पाकिस्तान का यह प्रयास अत्यंत निंदनीय है। 

पाकिस्तान में सिखों के कातिलों का संबंध आतंकी नैटवर्क के साथ होना समस्त सिख भाईचारे के लिए गंभीर खतरे तथा चिंता का विषय बना हुआ है। अपनी बगल में छुपा कर रखे इन तत्वों का इस्तेमाल हुकूमत द्वारा अल्पसंख्यकों को खदेडऩे के लिए लम्बे समय से रखी गई योजनाओं तथा गंदे उद्देश्यों को हासिल करने के लिए किया जाता है। हाल ही में अल्पसंख्यक सिख भाईचारे को लक्षित हत्या का निशाना बनाकर हमला करने के कई मामलों ने समस्त सिख कौम को गहराई से सोचने के लिए मजबूर किया है। 

कुछ दिन पहले हसन अब्दाल के निवासी एक प्रसिद्ध 35 वर्षीय सिख हकीम सतनाम सिंह का खैबर पख्तूख्वा के शहर पेशावर स्थित उनके ही दवाखाने में मरीजों का उपचार करते समय अज्ञात लोगों द्वारा गोलियां मार कर कत्ल कर दिया गया था। इस कत्ल की जिम्मेदारी इस्लामिक स्टेट-खोरासान ने ली है जिसका संबंध इस्लामिक स्टेट अफगानिस्तान के साथ बताया जाता है। जाहिर है कि दोषी आज तक पकड़े नहीं गए या फिर यह कहें कि सरकार अपने अजीज कत्लखोरों के प्रति अपना मुंह बंद रखने के अलावा आंखें भी बंद किए बैठी है। परिणामस्वरूप पाकिस्तान में सिख भाईचारे को अपनी जान के लाले पड़े हुए हैं। अपने भविष्य की अनिश्चितता को लेकर चिंतित हिन्दू-सिख अपना घर-बार त्याग कर दूसरे शहरों की ओर दौडऩे या कट्टरपंथियों के रहमो-करम पर रहने को मजबूर हो गए हैं। 

पाकिस्तान में किसी सिख को कत्ल करने का यह पहला मामला नहीं है, इससे पहले दर्जनों सिखों को कट्टरपंथियों द्वारा बेरहमी से मार दिया गया। 2009 में दिल दहला देने वाले समाचार थे कि तालिबान ने जजिया टैक्स की अदायगी न करने के कारण 11 सिख परिवारों के सिर कलम कर दिए थे। इसी तरह पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ के राष्ट्रीय असैम्बली सदस्य सोरेन सिंह (2016 में) तथा सिख भाईचारे के एक नेता चरणजीत सिंह (2018 में) को आतंकवादियों को पेशावर में मार दिया गया था। 2020 में मलेशिया में रहने वाले तथा नया जीवन शुरू करने की आशा कर रहे एक नौजवान सिख रविंद्र सिंह की पाकिस्तान में अपने विवाह की खरीदारी करते समय अज्ञात हमलावरों ने गोली मार कर हत्या कर दी। ङ्क्षहसा की इन घटनाओं तथा धमकियों के कारण पाकिस्तान में सिखों की आबादी लगातार कम हो रही है। संयुक्त राष्ट्र के पैनल ने 2019 में अपनी 47 पन्नों की रिपोर्ट में ‘पाकिस्तान धार्मिक अधीन हमला’  शीर्षक के अंतर्गत अल्पसंख्यकों की स्वतंत्रता को खतरे में बताया। 

विडम्बना यह है कि अल्पसंख्यकों को थोड़ी-बहुत सुविधाओं का चोगा डाल कर उसकी कीमत उनकी जान लेकर वसूली जा रही है। हितैषीपन तथा सुरक्षा देने का ढोंग करने वाली पाकिस्तान सरकार अपनी नाकाबिलियत तथा गलत नीतियों के कारण दुनिया भर में बेनकाब हो रही है। अभी अल्पसंख्यकों के साथ पहचान, कारोबार, साक्षरता, धर्म परिवर्तन को लेकर होने वाले भेदभाव अलग हैं, जिनका कोई हिसाब-किताब नहीं।  निर्दोषों को जान से खत्म करने की पाकिस्तान की यह हिमाकत आने वाले समय में सिखों-हिन्दुओं के अस्तित्व को पाकिस्तान के इतिहास के पन्नों से मनफी कर देगी। बेशक इस तथाकथित प्राप्ति को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाकर पाकिस्तानी हुकूमत अपने कसीदे पढ़कर झूठा गर्व महसूस करेगी लेकिन वास्तविकता तो उन पन्नों की धूल में कहीं दफन होकर आहें भरेगी, जिसकी आवाज सुनने वाला दूर-दूर तक कोई नहीं होगा।-प्रो. सरचांद सिंह खियाला 


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