रूस एक सैन्य राष्ट्र नहीं, यह एक भ्रम है

punjabkesari.in Wednesday, May 04, 2022 - 06:09 AM (IST)

जब रूसी टैंक जापोरोज्स्काया बिजली संयंत्र में परमाणु केंद्र पर बम बरसा रहे थे, तो सभी गोले नहीं फटे क्योंकि वे बहुत पुराने और जर्जर थे। यह कहानी, जो मुझे प्लांट के मालिक एवं कंपनी प्रमुख पियोत्र कोटिन द्वारा बताई गई, यूक्रेन पर व्लादिमीर पुतिन के युद्ध का एक लक्षण है। 

वर्तमान रूसी सेना जोसेफ स्टालिन की लाल सेना की प्रतिकृति है, जिसे खदानों को शरीरों के साथ भरने के लिए डिजाइन किया गया है। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, जब अमरीकी जनरल अपने सैनिकों के साथ युद्ध के मैदानों पर पैराट्रूपर्स उतार रहे थे और अपनी कठिनाइयों को सांझा कर रहे थे, सोवियत जनरल मोर्चे से बहुत दूर रहे और अभेद्य सुरक्षा के खिलाफ जबरन भर्ती किए गए सैनिकों की एक के बाद एक टुकडिय़ां भेजीं। इसलिए हैरानी नहीं कि उनके उत्तराधिकारियों ने अपनी कमान के तहत सैनिकों से चेर्नोबिल की अत्यधिक रेडियोधर्मी मिट्टी में खाइयां खोदने के लिए कहा। 

अक्षम और भ्रष्ट रूसी सेना ने इस युद्ध में गलती की। सैनिकों ने गलत सड़कों को चुना। दुश्मन के संपर्क में आने से पहले ही टूटे हुए टैंकों का कूड़ा अच्छी तरह से सड़कों पर बिखरा, कीचड़ में डूबा, ईंधन खत्म हो गया और सबसे बढ़कर, खो गए। 21वीं सदी में, आकाश में उपग्रहों के साथ, रूसी सेना पुराने सोवियत पेपर चार्ट का उपयोग उन शहरों में कर रही थी, जिनका नाम बदल दिया गया था और सड़कें अब अस्तित्व में नहीं थीं। 

रूसी सैनिक ग्लोबल पोजिशिनिंग सिस्टम (जी.पी.एस.) या उसके रूसी समकक्ष ग्लोनास का उपयोग क्यों नहीं कर रहे थे। ऐसा लगता है, अन्य बातों के अलावा, रूसी सेना अपने ही प्रचार का शिकार हो गई। युद्ध से पहले, पुतिन नए हथियार प्राप्त करने को लेकर उत्साहित थे। सबसे महत्वपूर्ण इलैक्ट्रॉनिक काऊंटरमैजर्स या ई.सी.एम. थे। उन्हें एक गेम-चेंजर माना जाता था, जिनका उपयोग जी.पी.एस. को ब्लैक आऊट करने, संचार को बाधित करने और ड्रोन पर कब्जा करने या उन्हें जमीन में गिराने के लिए किया जा सकता था। 

यूक्रेन में प्रवेश करते ही ई.सी.एम. इकाईयां वास्तव में सभी रूसी स्तंभों के साथ मार्च कर रही थीं, लेकिन उन्होंने योजना के अनुसार काम नहीं किया। तुर्की के ड्रोन को आसमान से गिराने के बजाय, ई.सी.एम. इकाइयों ने रूसी सेना सहित सभी संचारों को ब्लैक आऊट कर दिया। यूक्रेनी सैंटर फॉर डिफैंस स्ट्रैटेजीज के एक सैन्य विशेषज्ञ विक्टर केवलुक कहते हैं-यह ई.सी.एम. की समस्या है। यह या तो काम नहीं कर रहा, या जब यह काम कर रहा है तो यह दुश्मन की तुलना में अपने पक्ष को बहुत अधिक बर्बाद कर रहा है। रूसी सेना ने विदेशी भूमि पर खुद को अंधा कर लिया, जबकि यूक्रेनियन अंधेरे में अपना रास्ता जानते थे। इसलिए रूसियों ने नई तकनीक पर भरोसा करने की बजाय एक पुरानी रणनीति का रुख किया, सामूहिक आतंक। रूसी सैनिकों ने यूक्रेनी महिलाओं के साथ बलात्कार किया और यूक्रेनी पुरुषों को मार डाला। मारियुपोल को मलबा बनाया जा रहा है। 

सामूहिक आतंक बड़े पैमाने पर झूठ बोलने का प्रत्यक्ष परिणाम था, क्योंकि वास्तविक सैन्य लक्ष्य की तुलना में भागने वाले नागरिकों के एक समूह पर गोला-बारूद खर्च करना आसान है। यहां तक कि लूटपाट भी सुनियोजित थी। ओपन-सोर्स-आधारित कॉन्फ्लिक्ट इंटैलीजैंस टीम के संस्थापक रुस्लान लेविएव ने एक साक्षात्कार में दावा किया कि सैनिक लूट से लदी चोरी की कारों को रूस लाकर अस्थाई बाजारों में बेचते हैं, और वे आय का एक हिस्सा अपने अधिकारियों को देते हैं। यह वाकई अद्भुत है। एक आधुनिक सेना लूट नहीं करती। 

पुतिन ने कैसे सोचा कि वह इस युद्ध को जीत सकते हैं? इसका उत्तर राष्ट्र को लेकर भ्रम है। रूस को एक सैन्य राष्ट्र समझने की गलती करना आसान है। यह नहीं है। यह सच है कि रूसी राज्य सिलोविकी द्वारा चलाया जाता है (मोटे तौर पर ‘एन्फोर्सर्स’ के तौर पर अनुवादित), लेकिन वे ताकतवर संघीय सुरक्षा सेवा से हैं, जिसे एफ.एस.बी. के नाम से जाना जाता है, सेना नहीं। 

पुतिन, जो स्वयं के.जी.बी. के पूर्व अधिकारी हैं, लंबे समय से संभावित सैन्य तख्तापलट को लेकर अत्यधिक संदिग्ध रहे हैं। रूसी सेना को कम से कम आंशिक रूप से जानबूझकर  अक्षम बनाया गया है। एफ.एस.बी. और उनके राजनीतिक सहयोगियों ने पुतिन को वही बताया जो वह सुनना चाहते थे, अर्थात यूक्रेन में रूस के प्रति सहानुभूति रखने वालों का एक व्यापक नैटवर्क था, जो उस देश को एक थाली में परोस कर उन्हें सौंप देगा। इस स्तर की अक्षमता और भ्रम वाला राज्य 19वीं शताब्दी में जीवित नहीं रहा होगा। आज चीजें अलग हैं। सीधी लड़ाई के मुकाबले प्रतिबंधों को ज्यादा पसंद किया जाता है। हालांकि आॢथक प्रतिबंध एक दुष्ट शासन को अलग-थलग कर सकते हैं, उसे कुचल नहीं सकते।-यूलिया लैटिनिना


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