धर्म ही ‘इंसान को इंसान’ से जोड़ता है

2021-04-17T04:14:02.857

धर्म क्या है, इस बारे में अनेक मत हो सकते हैं लेकिन मनुष्यता को लेकर कोई शंका या विवाद नहीं हो सकता। इसी के साथ सत्य यह भी है कि धर्म ही वह कड़ी है जो इंसान को इंसान से जोड़ती है, उनके बीच भाईचारे की भावना पैदा करती है और जब भी कोई संकट आता है तो धर्म लगती बात ही मुसीबत से पीछा छुड़ाने के काम आती है। 

धर्म और हमारी पहचान : हम किसी भी धर्म के मानने वाले हों जो अक्सर जन्मजात होता है और किसी विशेष परिस्थिति में ही उसे बदल कर अपनी पसंद का कोई दूसरा धर्म मानने लगते हैं, वह कभी अपनी श्रेष्ठता का दावा नहीं करता क्योंकि सब धर्म ज्यादातर एक जैसी ही बातें कहते हैं और सिर्फ इंसान और इंसानियत की वकालत करते हैं। 

जो लोग धर्म से अपनी पहचान स्थापित करते हैं और उस पर गर्व करते हैं, बहुत शान से गुणगान करते हैं लेकिन जैसे ही किसी दूसरे धर्म से अपने धर्म को श्रेष्ठ बताने लगते हैं तो यहीं से धार्मिक कट्टरता की शुरूआत हो जाती है। कुछ इस हद तक चले जाते हैं कि अन्य किसी धर्म के मानने वालों को इंसान तक नहीं मानते और यहीं से कलह, शत्रुता, वैमनस्य और लड़ाई-झगड़े शुरू हो जाते हैं। जहां तक धर्म की वास्तविकता है तो यह हमारे पुरुषार्थ और कर्म पर निर्भर है कि हम उसे मिलजुल कर रहने का साधन बनाते हैं या अलग थलग रहकर अपनी डफली अपना राग अलापने का साधन मानते हैं। हमारी तहजीब, चरित्र और व्यवहार को  जब तक धर्म का लबादा नहीं आेढ़ाया जाता तब तक कोई विवाद नहीं होता और जैसे ही उसे अपने धर्म से जोडऩे की कवायद होती है तो मतभेद से लेकर मनभेद तक की शुरूआत हो जाती है। 

धर्म बनाम पुरुषार्थ : हमारे मन में क्या है, हम जो निर्णय लेते हैं और उसके अनुसार जो कुछ करते हैं उसमें धर्म का तड़का लगते ही सब कुछ बदलने लगता है । नजरिया मानवता का न होकर धार्मिकता का हो जाता है। हम तुरंत हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई,जैन, पारसी, यहूदी या किसी अन्य धर्म के हो जाते हैं और इंसानियत की बोली छोड़कर कट्टरता की बोली बोलने लगते हैं जो अक्सर हैवानियत पर जाकर दम लेती है। अक्सर पुरुषार्थ के संदर्भ में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की बात कही जाती है। इसे विस्तार से कहें तो धर्म का अर्थ अपने यानी स्वधर्म का पालन करना है। अर्थ का मतलब अपनी आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा का बंदोबस्त करना है। 

काम से तात्पर्य यह कि मौज-मस्ती, विलासिता और आनंद अर्थात खुश रहने के साधनों को जुटाना है। अब बचा मोक्ष तो उसकी चिंता क्या करनी, वह तो किसी न किसी रूप में मिल ही जाएगा। मृत्यु होने पर अपने ब्रह्म में लीन हो जाना, खुदा के पास पहुंच जाना, गुरु महाराज के चरणों में स्थान पा लेना या किसी भी धर्म की मान्यता के अनुसार उसके प्रवत्र्तक के पास शरण ले लेने के अतिरिक्त कोई और चारा कहां बचता है?

समाज में एक गलती और होती है और वह यह कि  धर्म को अपनी व्यक्तिगत मान्यता के दायरे से बाहर निकाल कर उसे अपने काम से जोड़ लेते हैं और फिर यहां से एक ऐसी सोच शुरू होने लगती है जिसका अंत धार्मिक कट्टरपन के रूप में ही निकलता है। इसका असर व्यवसाय, रोजगार, शिक्षा से लेकर हमारे पहनावे तक पर पड़ता है। हम अपने धर्म के अनुसार दिखने की गलतफहमी में जीने लगते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि एक तरह का ठप्पा हम अपनी पर्सनैलिटी पर लगा लेते हैं। 

यह सिलसिला यहीं नहीं रुकता, हम अपने प्रदेश की वेशभूषा, खानपान, आचार व्यवहार और किसी एक विशेषता को अपनी पहचान बना लेते हैं। वैसे देखा जाए तो इसमें कोई हर्ज नहीं लेकिन जब हम अपनी परंपराआें, रीति-रिवाजों और त्यौहारों तक को अपनी पहचान मानने से बढ़कर अन्य सभी प्रादेशिक संस्कारों को हीन और गया गुजरा, पुराने जमाने का और आधुनिकता से कोई मेल न खाने वाला मानने लगते हैं तो फिर आपस में टकराव होने में कोई देर नहीं लगती। यह टकराव और अधिक उग्र तब हो जाता है जब हम अपनी भाषा, साहित्य, संगीत और कला को दूसरों से श्रेष्ठ मानने लगते है। 

धर्म केवल अपने कत्र्तव्य का पालन करने, नैतिक मूल्यों को स्वीकार करने और अपने कर्म के प्रति निष्ठा से अधिक और कुछ नहीं है। इसीलिए महात्मा गांधी ने अङ्क्षहसा को परमोधर्म कहा और उसे ही अपनाने पर जोर दिया। धर्म के प्रतीक के रूप में ईश्वर, अल्लाह, वाहे गुरु, ईसा मसीह सब हमारे अंदर हैं, हम उन्हें बाहर क्यों खोजने लगते हैं जबकि वे सर्वत्र व्याप्त हैं।-पूरन चंद सरीन
 


Content Writer

Pardeep

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