राजेश खन्ना : जमीं खां गई आसमां कैसे-कैसे

7/18/2019 2:42:13 AM

18 जुलाई, 2012 का वह दिन जब एक फिल्मी हीरो राजेश खन्ना का देहावसान हुआ। फिल्मी दुनिया का वह सितारा, जिसने उस दौर के सभी फिल्मी नायकों को हाशिए पर धकेल दिया। तनिक 1969 से 1974 का फिल्मी दौर सिने प्रेमी अपने जहन में लाएं। फिल्म ‘आनंद’ का गीत थोड़ा गुनगुनाइए, ‘जिन्दगी कैसी है पहेली, कभी यह हंसाए कभी यह रुलाए’ या फिर उन्हीं की फिल्म ‘अंदाज’ का गीत हृदय पटल पर लाएं, ‘जिन्दगी इक सफर है सुहाना, यहां कल क्या हो किसने जाना।’

टीना मुनीम और राजेश खन्ना पर फिल्माए हल्के-फुल्के परन्तु रोमांटिक गीत को दोहरा लेते हैं, ‘शायद मेरी शादी का ख्याल दिल में आया है, इसीलिए मम्मी ने मेरी तुम्हें चाय पे बुलाया है।’ फिल्म ‘आन मिलो सजना’ का एक और हल्का-फुल्का गीत सुना कर आगे की बात करेंगे, ‘फिर कब मिलोगी? जब तुम कहोगे। कल मिलो या परसों, परसों नहीं नरसों। देर कर दी बड़ी, जरा देखो तो घड़ी? उफ-ओ मेरी तो घड़ी बंद है। तेरी यह अदा मुझे पसंद है।’ चलंत भाषा और  तुकांत छंद में फिल्माया राजेश खन्ना का यह गीत युवा दिलों को मस्त कर देता है। 

फिल्म ‘आनंद’ में दिल की कसक से निकला डायलॉग ‘बाबू मोशाय’ फिल्म के नायक का दर्द दर्शकों के दिलों में उंडेल देता है। उनका एक और दर्द शर्मीला टैगोर की आंखों के टपकते आंसुओं को सहलाते सिने दर्शकों के दिलों में उतर जाता है, ‘पुष्पा आई हेट द टीयर्ज।’ ताज्जुब यह कि आज फिल्मी दुनिया का महानायक अमिताभ बच्चन राजेश खन्ना के साथ सह-नायक हुआ करता था। अमिताभ बच्चन स्वयं कहते हैं कि उन्होंने राजेश खन्ना से बहुत कुछ सीखा। सिने दर्शकों को दुख तब और ज्यादा होता है जब यही राजेश खन्ना अमिताभ बच्चन की ‘एंग्री यंग मैन’ की भूमिकाओं से मात खा गए। अमिताभ की फिल्म ‘जंजीर’ आते-आते राजेश खन्ना फिल्मी दुनिया में निस्तेज हो चुके थे। 

1969 से 1971 के तीन वर्षों में 15 सुपर हिट फिल्में दर्शकों को देने वाले इस सर्वश्रेष्ठ एक्टर का फिल्मी अवसान इतनी जल्दी क्यों हुआ? तीन-तीन बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्म फेयर अवार्ड जीतने वाले राजेश खन्ना से दर्शकों ने मुंह क्यों फेर लिया? फिल्म फेयर अवार्डों में 14 बार नामित होने वाले राजेश खन्ना की अभिनय शैली का सैंकड़ों एक्टरों ने अनुसरण किया। बालों का तब एक अलग स्टाइल राजेश खन्ना ने युवाओं को दिया। युवा लड़कियों की लिपस्टिक के निशान राजेश खन्ना की कार पर उकेरे हुए मिलते थे। 

राजेश खन्ना की आंख झपकाने, गर्दन टेढ़ी करने की अदा पर उस समय में युवा फिदा हुआ करते थे। उनके द्वारा पहने कुर्ते और पैंट युवाओं में फैशन हुआ करते थे। बिंदास अभिनेत्री मुमताज हो या राजेश खन्ना के सामने आशा पारेख, फिल्में मस्ती छोड़ जाती थीं। अपने समय की हर अभिनेत्री राजेश खन्ना के साथ फिट और उन्मुक्त लगती थी। यूं तो राजेश खन्ना फिल्म ‘आराधना’ के आने से पहले फिल्म ‘राज’, ‘आखिरी खत’ और ‘बहारों के सपने’ द्वारा अभिनय क्षेत्र में अपने आपको मुम्बई सिने जगत में एस्टैब्लिश कर चुके थे, पर निर्माता-निर्देशक शक्ति सामंत की फिल्म ‘आराधना’ (1969) ने राजेश खन्ना को सुपर स्टार बना दिया। फिर तो उनका सिक्का फिल्मों में चलने लगा। उन्होंने कुल 163 फिल्में कीं जिनमें से 101 में वह अकेले हीरो थे। 

थोड़ा क्रमवार उनकी श्रेष्ठ फिल्मों को देख लेते हैं। 1969 में ‘आराधना’, ‘सफर’ और ‘कटी पतंग’, 1971 में ‘आनंद’, ‘हाथी मेरे साथी’, ‘नमक हलाल’ और ‘दाग’, 1974 में ‘आपकी कसम’, ‘कुदरत’, 1983 में ‘थोड़ी सी बेवफाई’। इन पांच-छ: वर्षों में राजेश खन्ना एक के बाद एक हिट और सुपरहिट फिल्में दर्शकों को देकर इतिहास रचते गए। उनके अभिनय के अलग-अलग अंदाज देख दर्शक दांतों तले उंगलियां दबा लेते थे। 

पर ऐसा क्या हुआ कि राजेश खन्ना स्क्रीन से एकदम आऊट हो गए? पहला कारण तो यह है कि राजेश खन्ना बढ़ती आयु और बदलते समय से समझौता न कर सके। अनुशासन तो उन्हें पसंद ही नहीं था। फिल्मों की सफलताओं का स्टारडम राजेश खन्ना पर हावी हो गया था। सुरा-सुंदरी उनका शौक बन गया। दिलफैंक तो राजेश खन्ना पहले से ही थे। उनके रोमांस के किस्से मीडिया की कहानियां बनने लगे। कभी फैशन डिजाइनर और अभिनेत्री अंजू महेंद्रू, कभी कमसिन अभिनेत्री टीना मुनीम के साथ उनकी हवाई यात्राएं रोज पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगीं। राजकपूर की फिल्म ‘बॉबी’ की कम उम्र नायिका डिम्पल कपाडिय़ा से राजेश खन्ना ने शादी कर ली। दो-दो बेटियां टिं्वकल खन्ना और रिंकी खन्ना की पैदाइश के बाद ही दोनों में संबंध विच्छेद हो गया। 

विवाह के बाद भी उनके बंगले ‘आशीर्वाद’ में किसी दूसरी महिला का पाया जाना दर्शकों को अखरने लगा। कुछ इन्हीं हालात में उन्हें शारीरिक कष्टों ने भी घेर लिया। 1991 से 1996 की अवधि में वह नई दिल्ली से कांग्रेस पार्टी के सांसद रहे। हराया भी उन्होंने अपने फिल्मी मित्र शत्रुघ्न सिन्हा को। मरणोपरांत राजेश खन्ना को भारत सरकार ने ‘पद्म विभूषण’ अलंकार प्रदान कर सम्मानित किया परन्तु इन सबके बावजूद मैं कहूंगा कि राजेश खन्ना समय की नब्ज न पहचान सके। क्या उन्हें पता नहीं था कि सिनेमाई ‘मैनरिज्म’ चंद दिनों का खेल है। क्या उन्हें इतना भी सफलता के शिखर पर ज्ञान नहीं रहा कि समय बड़ा निर्दयी होता है? क्या उन्हें इतना भी ज्ञान नहीं रहा कि चार दिन की चांदनी और फिर अंधेरी रात? याद रहे यह दुनिया रैन बसेरा है, न तेरा है न मेरा है। आज जो चमकता हुआ दिखाई दे रहा है कल मिट जाएगा। यह जमीं खा गई आसमां कैसे-कैसे? राजेश खन्ना के इस तरह चले जाने का सिने दर्शकों को तो दुख है ही परन्तु सिने उद्योग को उनके चले जाने से जो क्षति हुई है, उसकी भरपाई नहीं हो सकती। 

चाहे उनकी बेटी ट्विंकल खन्ना रचनाकार है, उनका दामाद अक्षय कुमार एक चमकता सितारा सिने उद्योग में उनके नाम को बनाए हुए है परन्तु राजेश खन्ना जैसा सर्वश्रेष्ठ अभिनेता यूं ही चला जाए, इसका अफसोस तो है। 18 जुलाई राजेश खन्ना की पुण्यतिथि है। सिने दर्शक उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं। मेरी उम्र के सिने दर्शक आज की फिल्मों से बेजार हैं। बिना सिर-पैर की फिल्में समाज को क्या दिशा देंगी? आज की फिल्मों का कानफाड़ू संगीत राजेश खन्ना की आत्मा को दुखी तो करता होगा? सिनेमा का सृजन करने वाले अपने सामाजिक उत्तरदायित्व को याद रखें। एक राजेश खन्ना सिने उद्योग फिर पैदा करे। तब जानेंगे कि राजेश खन्ना आज भी जिंदा है।-मा. मोहन लाल(पूर्व परिवहन मंत्री, पंजाब)