कोरोना संकट और दूरदॢशता को लेकर उठते सवाल

2021-04-23T01:06:52.843

जिसे कोविड-19 कहा  गया , वो 2021 में भी कोहराम मचा रहा है औऱ हमें ऐसा लग रहा है कि उससे निपटने की जिम्मेदारी लेने वाले  अब भी ‘ट्रायल-एरर’ की मुद्रा में हैं। कोविड के बदलते रूप ने हमें आईना दिखाया है जो हमें चिढ़ा रहा है। कोविड के कारण  मार्च 2021 तक जो भयावह हालात सिर्फ महाराष्ट्र में थे, वैसे अगले दिन में पूरे देश में हो जाएंगे, बड़े-बड़े रणनीतिकार भी नहीं सोच पाए या सोचने की शक्ति ही नहीं पैदा कर पाए।

जिस बड़ी संख्या में कोविड पीड़ित आ रहे हैं, उसे संभालने में हमारा स्वास्थ्य तंत्र नाकाम दिख रहा है।  मरीजों को अस्पतालों में बैड नहीं मिल रहे। इलाज नहीं मिल रहा। दवा नहीं मिल रही। बिना ऑक्सीजन मरीज तड़प-तड़प कर दम तोड़ रहे हैं।

बीमार लोग अस्पतालों के बाहर पड़े हैं, गलियारों में पड़े बारी का इंतजार कर रहे हैं। सैंकड़ों स्वास्थ्यकर्मी और चिकित्सक भी बीमारी की चपेट में आ अपने घरों में बंद होने को मजबूर हैं। जिंदगी का सबसे खराब दिन तो वह रहा जब किसी एक परिचित ने फोन कर मृतक कोविड पीड़ित को श्मशान गृह में जलाने के लिए पैरवी कराने का आग्रह किया।

पिछले साल जब कोविड-19 ने दस्तक दी थी तो देश में लॉकडाऊन की घोषणा के बाद सरकार ने रोकथाम के उपायों और जरूरी उपकरणों पर ध्यान दिया था। अस्पतालों में सम्भव व्यापक सुधार  हुए। स्वास्थ्यकर्मियों के लिए पी.पी.ई. किट और मास्क की जरूरत को न सिर्फ पूरा किया, बल्कि अन्य देशों को भी मदद दी गई। विदेशी कंपनियों ने जब वैंटीलेटर का आयात रोक दिया तो देश में ही वैंटीलेटर तैयार किए गए।

अभी ऑक्सीजन की कमी को लेकर बहुत सारा बखेड़ा है। पर आंकड़ों पर आप जाएंगे तो चकरा जाएंगे। वास्तविकता तो यह है कि देश में ऑक्सीजन की कमी नहीं बल्कि उसके प्रबंधन में ही पूरा लोचा है। देश में 50 हजार मीट्रिक टन का स्टाक है। सात हजार मीट्रिक टन का प्रतिदिन उत्पादन भी होने लगा है। खपत अब भी पांच हजार मीट्रिक टन के आसपास ही है पर पूरा खेल बिगड़ा ऑक्सीजन के निर्यात से। खैर इसे अब रोक दिया गया है और उम्मीद भी यह की जानी चाहिए कि जल्द ही यह संकट खत्म हो जाएगा।

निर्यात और जरूरत की संभावना के मद्देनजर  मैडीकल ग्रेड की ऑक्सीजन के लिए पिछले साल के मध्य में ही  देश भर में 162 प्लांट लगाने की योजना तैयार की गई थी। लेकिन सरकार की शीर्षस्थ अधिकारियों की फौज और राज्य सरकारों की अक्षमता की वजह से इस प्लांट की निविदा प्रक्रिया में ही आठ महीने गंवा दिए गए। यह सब तब हो रहा है जब इनके लिए पी.एम. केयर फंड से अपेक्षित 200 करोड़ से ज्यादा की रकम आबंटित कर दी गई थी। लापरवाही की वजह से इन पर काम रुक गया और आज हमें पचास हजार मीट्रिक टन मैडीकल ऑक्सीजन का आयात करने पर मजबूर होना पड़ा। इसी सप्ताह प्रधानमंत्री को सीधे जब अफसरों से बात करनी पड़ी तो इस्पात सचिव को भी इसमें शामिल करना पड़ा ताकि सिलैंडरों के निर्माण की जरूरतों के लिए फाइल लम्बी न चले।

वैक्सीन का मामला भी खास अलग नहीं है। वैक्सीन बनने की प्रक्रिया के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वैक्सीन निर्माता कंपनियों के स्थल पर जाकर निरीक्षण करने की पहल का सबने बहुत स्वागत किया। हमारी बहुत वाहवाही हुई। हमने जब अभियान शुरू किया तो हमने विश्व नेतृत्व की तरह व्यवहार किया। दुनिया भर के कई देशों को उनकी जरूरतों के अनुसार वैक्सीन भेजी गई। डब्ल्यू.एच.ओ. ने हमारी हौसला अफजाई की। लेकिन अपने देश में तो हमने 45 साल तक के लोगों को वैक्सीन देने में तीन महीने लगा दिए।

प्रबंधन का बुरा नमूना यह था कि 45 लाख से ज्यादा वैक्सीन डोज हमने बर्बाद कीं। हमारे स्वदेशी  निर्माता वैक्सीन का निर्माण बढ़ाने के लिए कुछ सुविधाएं मांग रहे थे। यहां सरकार की व्यापारिक क्षमता ने काम किया लेकिन  उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए जो कुछ रकम वे चाह रहे थे, जिसके लिए सरकार ने काफी लंबा समय लिया और अब जब 18 साल के युवाओं को भी वैक्सीन लगाने का लक्ष्य दे दिया गया है तो सीरम इंस्टीच्यूट को 3000 करोड़ रुपए और भारत बायोटैक को 1500 करोड़ रुपए देने की घोषणा की गई है।

इस समय सबसे बड़ा खतरा दवाओं को लेकर बनाया गया संकट है। ड्रग कंट्रोलर जैसी संस्था कहीं नहीं दिख रही है। जो कालाबाजारी दिख रही है, उसमें कई जगह सिस्टम की भी संलिप्तता दिखी। कोरोना से जुड़ी दवाओं का ही नहीं, ऑक्सीमीटर तक का कृत्रिम अभाव हो गया है। 800 रुपए में मिलने वाला ऑक्सीमीटर अचानक 2000 रुपए को छू रहा है और वह भी आसानी से मिल नहीं रहा।

एक बड़ा सवाल है, पूरी व्यवस्था मरीजों को इलाज मुहैया करा पाने में विफल कैसे हुई? यह कह कर सिस्टम अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता कि लोग (जनता) लापरवाह हो गए थे। अगर आप राज्य कमेटियों का अध्ययन करते हैं तो पाते हैं कि सिर्फ केरल और तमिलनाडु ही ऐसे राज्य हैं जहां इन कमेटियों में विशेषज्ञों को अधिक संख्या में रखा गया। अन्य राज्यों में सेवानिवृत्त अफसरों, ब्यूरोक्रेट्स, कुछ निजी अस्पताल के संचालकों की उपस्थिति ही ऐसी कमेटियों में ज्यादा दिखती है।

अब अगर यह सवाल उठता है कि यह बड़ी-बड़ी कमेटियां मूल जरूरतों को भी आभास नहीं कर पाती हैं तो इनकी कार्यशैली पर सवाल उठना ही चाहिए। दरअसल इनको अपनी बात कहने की क्षमता पर ही अब शक हो गया है और इसी लिए बात अब सर्वोच्च स्तर तक नहीं पहुंचती। स्थिति बिगडऩे पर दवाओं और ऑक्सीजन की जो कालाबाजारी हुई, उसमें पूरी ब्यूरोक्रेसी का हाथ पर हाथ धरे बैठे रहना उसकी नीयत को शक के दायरे में लाता है।  ऑक्सीजन और दवा उत्पादन को बढ़ाने का जो फैसला फरवरी के दूसरे सप्ताह में मामलों को बढ़ते देख लिया जा सकता था, उसके लिए मार्च बीतने तक और स्थिति के बिगड़ जाने का इंतजार किया गया। रेमडिसिवर जैसी दवाओं और ऑक्सीजन उत्पादन बढ़ाने के बारे में हमने तब सोचा, जब बहुत से लोग इनकी कमी से जान गंवा चुके थे।

दूरदॢशता का अभाव स्थिति को और बिगाड़ देता है। आपदा प्रबंधन को और चुस्त करना ही होगा और साथ ही जिम्मेदारी भी तय करनी होगी। आपदा प्रबंधन के लिए एक पूरे मंत्रालय की जरूरत अब साफ दिखती है।

-अकु श्रीवास्तव


Content Writer

Shivam

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