राष्ट्रपति चुनाव : विपक्ष बार-बार क्यों फिसलता रहा

punjabkesari.in Wednesday, Jun 22, 2022 - 05:56 AM (IST)

पहले शरद पवार, फिर फारूक अब्दुल्ला और अब महात्मा गांधी के पौत्र गोपाल कृष्ण गांधी, तीनों ने उत्साही विपक्ष के राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनने से इंकार कर दिया है। राष्ट्रपति पद के चुनाव की अधिसूचना जारी होने के तत्काल बाद विपक्ष में राष्ट्रपति पद पर कब्जा करने की जो तेजी दिखाई दी थी, वह धीरे-धीरे अब सतह पर आ गई है। 

जब तक राष्ट्रपति पद के चुनाव की घोषणा नहीं हुई थी, विपक्ष की ओर से सबसे ज्यादा सक्रियता 2024 में प्रधानमंत्री पद के दावेदार 2 ही नेताओं में दिख रही थी। एक, तृणमूल कांग्रेस की नेत्री ममता बनर्जी और दूसरे, तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव (के.सी.आर.)। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का कार्यकाल 25 जुलाई को खत्म हो रहा है। ममता और के.सी.आर. राष्ट्रपति चुनाव के माध्यम से रायसीना के भव्य भवन में अपना प्रत्याशी लगाने की कोशिशों में लगे हैं। 

सबको पता है कि अगर 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जरा सी भी चुनौती देनी है तो एकजुट होकर लडऩा होगा। लेकिन पहले ही दिन से के.सी.आर. अपनी योजनाओं में लग गए और ममता दी विपक्ष के अपने उम्मीदवार के लिए। राष्ट्रपति चुनाव की अधिसूचना 9 जून को जारी की गई और उसी के बाद  ममता दी ने तो विपक्ष की बैठक भी 15 जून को दिल्ली में बुला ली। लेकिन साथ ही पहला झटका उसी दिन उनके पुराने प्रतिद्वंद्वी वामपंथियों से मिला, जिनके नेता सीताराम येचुरी ने बयान जारी कर दिया कि हम भी उसी दिन बैठक बुला रहे थे और ममता दी ने बैठक बुला ली, हमसे पूछा भी नहीं। 

वामपंथियों को शायद पता था कि राष्ट्रपति चुनाव के 10,79,206 वोटों में से 5,26,430 वोट भाजपा नेतृत्व वाले राजग के पास हैं। यह भी तय था कि बीजद, वाई.एस.आर. कांग्रेस और अन्नाद्रमुक के वोट भी एन.डी.ए. को ही मिलने हैं तो एन.डी.ए. के उम्मीदवार को जीतने में कोई दिक्कत नहीं आनी चाहिए। लेकिन सजग विपक्ष की पहचान चुनाव जीतने से ज्यादा जरूरी लडऩे और चुनौती देने से होती है। 

खैर, ममता दी ने 15 जून को दिल्ली में बैठक कर ली। जो निंदा कर रहे थे, वे वामपंथी तो बैठक में आ गए, पर विपक्ष का केंद्र कांग्रेस के राहुल गांधी  प्रवर्तन निदेशालय के फेरे में फंसे रहे और दूसरी बड़ी नेता प्रियंका गांधी भाई के साथ जुटी रहीं। नाम के लिए बैठक में मल्लिकार्जुन खडग़े रहे और अपनी तरफ से बिना किसी नाम के सामने आ गए। सहमति के नाम पर एन.सी.पी. नेता शरद पवार का नाम सामने आया, लेकिन वह तुरंत इस प्रतिष्ठापूर्ण कुर्सी पाने की संभावना के विरोध में सामने आ गए और स्पष्ट रूप से मना कर दिया। यूं बैठक की उपयोगिता पर उसी समय से सवाल उठने लगे थे जब बैठक में शामिल दलों की संख्या मात्र 17 थी। बैठक में न तो तेलंगाना के चंद्रशेखर की  टी.आर.एस. थी, न आंध्र के मुख्यमंत्री जगनमोहन रेड्डी की वाई.एस.आर. कांग्रेस और न ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के नेतृत्व वाला बीजू जनता दल। 

क्षेत्रीय दलों में अकेले 2 राज्यों, दिल्ली और पंजाब में सरकार पर मजबूती से काबिज आम आदमी पार्टी को भी निमंत्रण दिया गया था, लेकिन न वे बैठक में गए बल्कि उन्होंने तो ऐसी बैठकों से दूरी बनाए रखने की घोषणा कर दी और साफ कहा कि जब तक चीजें साफ नहीं होतीं, ऐसी बैठकों का कोई फायदा नहीं। यानी इस बैठक के नतीेजे को ही अंतिम मान लिया जाए तो विपक्ष के उम्मीदवार के जीतने की कोई संभावना ही नहीं बचती।

इस दिन यह भी कहा गया कि अगर पवार राजी नहीं होते तो फारूक अब्दुल्ला या पश्चिम बंगाल के राज्यपाल रहे गोपाल कृष्ण गांधी को उम्मीदवार बनाया जा सकता है। फारूक ने एक दिन की चुप्पी के बाद इस पेशकश से हाथ जोड़ दिए, जबकि गांधी ने कहा कि जब तक कोई ठोस विचार सामने नहीं आता, वह कोई प्रतिक्रिया नहीं करेंगे। माना जाता है कि गोपाल कृष्ण गांधी ने कुछ दिन तक इंतजार भी किया, लेकिन अंतत: 20 जून को हाथ जोड़ दिए कि मैं भी विपक्ष का उम्मीदवार नहीं बनूंगा। 

अब सवाल यह उठता है कि आखिर तीन-तीन बड़े नेताओं ने यह मौका क्यों खोया? यह जानते हुए भी कि हार होनी है, तब भी विपक्ष को अपनी बात रखने का एक मौका मिलता है। देश की जनता के प्रतिनिधियों से वह सीधे मिलता है और आमतौर पर हर प्रदेश की राजधानी में अपने प्रचार के लिए जाता है। मीडिया से उसकी बात होती है। लेकिन इन तीनों नेताओं ने इससे किनारा कर लिया। 

अब जब 29 जून को नामांकन दाखिल करने की अंतिम तिथि है, एन.डी.ए. और यू.पी.ए. दोनों ने मंगलवार रात अपने-अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी। यू.पी.ए. तथा अन्य विपक्षी पाॢटयों द्वारा पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा को सांझा उम्मीदवार चुना गया है, जबकि राजग की ओर से झारखंड की पूर्व राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू को उम्मीदवार बनाया गया है, जो अनुसूचित जनजातीय समुदाय से संबंध रखती हैं। 

हालांकि विपक्ष की एकता और भूमिका पर सवाल उठते हैं, खास तौर पर तब जब वे नरेंद्र मोदी को 2024 में चुनौती देना चाहते हैं। जिस राष्ट्रपति चुनाव में सत्ता पक्ष के पास 50 प्रतिशत वोट नहीं हैं, उसमें भी अगर विपक्ष के सामने एकता की समस्या होती है, तो यह बड़ी समस्या है। विपक्ष के नेताओं में अहं का टकराव है और यह टकराव लोकतंत्र के लिए भी घातक है, क्योंकि अगर विपक्ष कमजोर होता है तो कई बड़ी समस्याएं पैदा होती हैं। 

यह भी तय है कि राष्ट्रपति चुनाव में हाल के वर्षों मेें सत्ता पक्ष के सामने कोई खास चुनौती नहीं रही, न ही वे हालात हैं कि अगस्त 1969 में वामपंथी समर्पित इंदिरा गांधी के तेज दिमाग से अंतर्रात्मा की आवाज पर वी.वी. गिरि चुनाव जीत जाएं और न ही हालात वे हैं कि विपक्ष के मजबूत उम्मीदवार और पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुब्बाराव जीत जाएं। लेकिन लोकप्रिय राष्ट्रपति ए.पी.जे. कलाम के सामने चुनाव लडऩे वाली कैप्टन लक्ष्मी जैसे कई मौके हैं, जब विपक्ष ने सत्ता पक्ष को कड़ी चुनौती दी और लोकतंत्र की लाज रखी है। पिछली बार भी कोविंद को कोई खास चुनौती कांग्रेस की मीरा कुमार नहीं दे पाई थीं, लेकिन चुनाव तो उन्होंने ठीक से लड़ा था। इस बार भी क्या ऐसा संभव है, हमें यह देखना होगा।-अकु श्रीवास्तव
     


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