गाय को बाघ बनाने की राजनीति

2021-09-14T05:13:19.207

चाहे मुझे मार डालो पर गाय पर हाथ न उठाओ। इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूॢत शेखर कुमार यादव इस बात का जिक्र लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के हवाले से करते हैं। गौकशी के मामले में जावेद की जमानत याचिका खारिज कर उन्होंने सरकार से गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने के बारे में भी खूब कहा है। हिन्दी में लिखित यह फैसला स्वागत के योग्य है। सित बर के शुरूआत की यह ईबारत भविष्य में गौसेवा और गौरक्षा के लिए राष्ट्रव्यापी कानून के मार्ग में मील का पत्थर साबित हो तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। 

गौकशी के कारण देश के अनेक क्षेत्रों में हिन्दू-मुस्लिम समस्या से दो-चार होना नई बात नहीं। हालांकि उत्तर प्रदेश और बिहार समेत देश के 24 राज्यों में गौहत्या पर पाबंदी है, इसके बावजूद इस तरह की घटनाएं होती हैं। इसके लिए आपसी सौहार्द और सामाजिक समरसता को खत्म करने वाले अवयव जिम्मेदार हैं। तनाव कायम करने के ये ऐसे मामले हैं, जिस कारण मॉब-लिंचिंग की घटनाएं होती हैं।

समाजवादी पार्टी की सरकार में सरकारी वकील रहे शेखर, योगी राज में न्यायमूॢत नियुक्त हुए। उन्होंने पालिथीन खाकर मरने वाली गायों के अलावा सरकारी और गैर-सरकारी गौशालाओं में शोषित गौवंश पर भी टिप्पणी की है। पर इस विषय में होने वाली सारी चर्चा गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की बात पर सिमट गई। 

गाय और गंगा की राष्ट्रीय अस्मिता से जुड़ा राजनीतिक अर्थशास्त्र सुर्खियों में है। 21वीं सदी के आरंभ में गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करने की राजनीति जोर पकड़ती है। फिर राष्ट्रीय गंगा नदी घाटी प्राधिकरण का सूत्रपात भी हुआ। नैनीताल हाईकोर्ट ने एक दिन गंगा नदी को कानूनी तौर पर जीवंत प्राणी मानने का फैसला सुनाया था। न्यूजीलैंड की वांगानूई नदी के विषय में आदिवासियों की लंबी लड़ाई को सफलता मिली, पर उत्तराखंड की सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में उस फैसले को चुनौती देकर शीघ्र ही स्थगनादेश प्राप्त किया गया।

अब धूल फांकती इस फाइल की ओर देखने की फुर्सत किसी को नहीं है। गौसेवा के सवाल पर केंद्रीय कानून की मांग भी लंबे अर्से से सड़कों पर धूल फांक रही है। जस्टिस यादव भारतीय जीवनशैली व कृषि परंपरा में गौवंश की उपयोगिता का जिक्र करते हैं। किसानी के लिए हाथी के समान बैल देने वाली गायों के दान का प्रसंग जनक और याज्ञवल्क्य की भूमि पर सहज मिल जाता रहा। 

राष्ट्रीय पशु घोषित करने की इस राजनीति में गाय और बाघ आमने-सामने हैं। स्वतंत्र भारत के इतिहास का सबसे व्यापक जनांदोलन भी गौवंश के नाम है। हालांकि गाय और बाघ जैसे मूक पशुओं को राजनीति के पेंच में फंसने पर अल्पसं यक का तमगा मिला। सिपाही विद्रोह के बाद महॢष दयानंद के आर्य समाज ने गौवंश रक्षा की मांग शुरू की। इसकी अहमियत का ध्यान कर गांधीजी 1927 में आजादी से भी अहम गौसेवा को करारते थे। इससे पहले उन्होंने वृक्षों की खेती की भी वकालत की थी। विरासत में मिले वनों का नाश रोकने और नवीन वन उगाने के मामले में उनके रचनात्मक प्रयास इनके परस्पर संबंधों की व्याख्या करते हैं। 

भारत के राष्ट्रीय पशु बाघ को बहुसं य समाज शक्ति की देवी दुर्गा की सवारी मानता है। इस लिहाज से भारतीय समाज में गाय और बाघ दोनों ही पवित्र माने जाते हैं। इनके संरक्षण का विधान भी यही है। खाद्य शृंखला में विपरीत स्वभाव के ये दोनों पशु दक्षिण एशिया की जलवायु के अनुकूल हैं। गायों के गोबर में शीघ्र ही कीड़े लगते हैं। पक्षियों की अनेक प्रजातियों को इससे आहार मिलता है। गौपालक भगवान कृष्ण के मामले में गौर करने से समझ आता है कि गौवंश ने आर्यावर्त के लिए उपजाऊ मिट्टी पैदा करने का काम किया। धरती माता, गौ माता व गंगा माता के सौजन्य से निर्मित भारत भूमि का विस्तार विंध्यांचल से बंगाल की खाड़ी तक पहुंच गया। 

ग्रामीण क्षेत्रों में पशुपालन को संस्कृति का अभिन्न हिस्सा माना जाता है। गोचर भूमि के संरक्षण और संवर्धन से खाद्य सुरक्षा के अलावा जैविक विविधता भी सुरक्षित होती है। बाघ जैसे मांसाहारी जंतु का जीवन गाय जैसे शाकाहारी जीवों पर ही आश्रित है। ‘जीवस्य जीव भोजनम्’ की उत्पत्ति इसी से हुई है। गाय को बाघ बनाने की राजनीति का स्याह पक्ष भी है। आंकड़े के लिहाज से 1947 में गौवंश की सं या 121 करोड़ थी जो अब 10 करोड़ रह गई है। तमिलनाडु के जल्लीकट्टू मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का जिक्र भ्रामक है। दरअसल बैलों का यह खेल गौवंश की रक्षा के लिए ही आयोजित किया जाता है। फैसले की त्रुटियों को दूर करने से ऐतिहासिक अभियान में एक नया दस्तावेज जुड़ेगा।-कौशल किशोर


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Content Writer

Pardeep

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