गलत आर्थिक नीतियों की कीमत चुका रहे लोग

punjabkesari.in Sunday, Jan 23, 2022 - 05:43 AM (IST)

एक अलग राग गाती आवाजों को सुनना अच्छा है। किसी समय मुख्य आर्थिक सलाहकार डा. अरविंद सुब्रमण्यन वर्तमान में ब्राऊन यूनिवर्सिटी में वाटसन इंस्टीच्यूट फॉर इंटरनैशनल एंड पब्लिक अफेयर्स में एक सीनियर फैलो हैं। उन्होंने अकादमिक क्षेत्र में उत्कृष्टता प्राप्त की है और एक अच्छे लेखक हैं। दिसंबर में डा. सुब्रमण्यन ने ‘आत्मनिर्भर भारत’ शीर्षक के अंतर्गत एक लेख में सरकारी आर्थिक नीतियों बारे खामियां पाईं। 

बहुपक्षीय चिंताएं : डा. सुब्रमण्यन की तीन शीर्ष चिंताएं हैं सबसिडियां, संरक्षणवाद तथा क्षेत्रीय व्यापार समझौतों को त्यागना। उनकी अन्य चिंताओं में संदिग्ध डाटा, संघवाद का विरोध, बहुलतावाद तथा स्वतंत्र संस्थानों को कम करके आंकना शामिल है। उन्होंने बेइरादा कारण बताए कि क्यों उन्होंने सरकार के साथ लगभग 4 वर्ष खुशी से बिताने के बाद 2018 में उसे  छोड़ा। वह खुश नहीं थे और संभवत: उनको आभास हो गया था कि स्थिति और भी बुरी होने वाली है। 

निश्चित तौर पर स्थिति निकृष्टतम हो गई। यू.पी.ए. सरकार के अंतर्गत औसत टैरिफ, जो लगभग 12 प्रतिशत था, अब बढ़ कर 18 प्रतिशत हो गया है। सेफगार्ड शुल्कों, एंटी-डंपिंग शुल्कों तथा गैर टैरिफ उपायों का असमान इस्तेमाल हो रहा है। भारत बहुपक्षीय व्यापार समझौतों से बाहर निकल आया है जिनका देश को काफी लाभ होता। यह विड बना है कि जहां नरेन्द्र मोदी राजनीतिक-रक्षा बहुपक्षीय समझौतों (जी.एस.ओ.एम.आई.ए., सी.ओ.एम.सी.ए.एस.ए., क्वाड, दूसरा क्वाड, आर.ई.एल.ओ.एस.) में शामिल होने को उतावले हैं, वह व्यापार समझौतों के खिलाफ हैं। 

किसी समय के एक अन्य आर्थिक सलाहकार भी मोदी की आॢथक नीतियों से निराश हो गए हैं। डा. अरविंद पनगढिय़ा वर्तमान में कोल िबया यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफैसर हैं तथा नीति आयोग के उप-चेयरपर्सन थे। एक हालिया लेख में उन्होंने सरकार का गुणगान किया लेकिन अपना डंक भी तैयार रखा। उन्होंने लिखा कि मुक्त व्यापार समझौतों के साथ-साथ ऊंचे शुल्कों को वापस लेने, तानाशाहीपूर्ण विश्वविद्यालय अनुदान आयोग एक्ट 1956 को एक आधुनिक कानून के साथ बदलने तथा प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष करों के आधार को व्यापक करके अर्थव्यवस्था को आवश्यक तौर पर खुला बनाना होगा। आवश्यक तौर पर सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के निजीकरण में तेजी लानी तथा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का निजीकरण शुरू करना होगा। 

इस तथ्य के अतिरिक्त कि डा. अरविंद सुब्रमण्यन तथा डा. अरविंद पनगढिय़ा कुछ वर्ष पहले तक सरकार के ‘भीतरी’ लोग थे, दोनों उदार अर्थशास्त्री हैं, प्रतिष्ठित अकादमिक संस्थान में पढ़ाते हैं तथा निजी क्षेत्र नीत माडल के समर्थक हैं। जहां उन्हें आर्थिक नीतियों की खामियों की पहचान करने में कोई हिचक नहीं है, वे ऐसी कमियों के विनाशकारी परिणामों को सूचीबद्ध करने में हिचकिचाते हैं। 

कई परिणाम : इस कॉलम के पाठकों को पता है कि परिणाम क्या हैं :
* और अधिक गरीब लोग शामिल होने से प्रति व्यक्ति आय में गिरावट,
* बच्चों में कुपोषण, बौनेपन तथा पिंडरोग में वृद्धि,
* वैश्विक भूख सूचकांक में (116 देशों में से) 94 रैंक से 104 रैंक पर फिसलना,
* नोटबंदी, एम.एस.एम.ईज. का समर्थन न मिलने, गरीबों को नकद हस्तांतरण से इंकार तथा महामारी के कुप्रबंधन के परिणामस्वरूप लाखों लोग गरीबी में धकेल दिए गए,
* उच्च बेरोजगारी दर (शहरी 8.4 प्रतिशत, ग्रामीण 6.4 प्रतिशत),
* उच्च मुद्रास्फीति (सी.पी.आई. 5.6 प्रतिशत),
* उच्च अप्रत्यक्ष कर तथा पक्षपातपूर्ण प्रत्यक्ष कर, गलत तरीके से लागू जी.एस.टी.,
* पैट्रोल, डीजल तथा एल.पी.जी. की बिक्री से लाभ कमाना,
* लाइसैंस-परमिट शासन की वापसी,
* एकाधिकारवाद का उभरना,
* क्रोनी पूंजीवाद,
* उच्च श्रेणी के व्यवसायों, इंजीनियरिंग, चिकित्सा तथा विज्ञान कौशल का प्रवास। 

जहां लोग गलत नीतियों तथा उनके परिणामों की आर्थिक कीमत चुका रहे हैं, अभी मोदी सरकार की राजनीतिक कीमत चुकाने की बारी नहीं आई। किसी भी अन्य उदार लोकतंत्र में बिना धन, भोजन अथवा दवाओं के गरीब लाखों मजदूरों की घर वापसी, ऑक्सीजन, अस्पतालों में बैड्ज, दवाओं, एम्बुलैंसों और यहां तक कि श्मशानों में स्थान की चिंतनीय कमी, कोविड-19 के कारण  लाखों लोगों की मौत, हजारों लाशों को  गंगा में तैरने अथवा इसके किनारों पर छोड़ देना, लाखों बच्चों की शिक्षा को नजरअंदाज करना जब स्कूलों को बंद करने का आदेश दिया गया तथा युवाओं में बेरोजगारी की बढ़ती दर सरकार के अस्तित्व के लिए चुनौती होते। यहां सरकार उदासीन बनी पड़ी है, संसद में चर्चा को बंद कर दिया, ढीली-ढाली नीतियों को जारी रखा तथा राज्य समर्थित चश्मों से लोगों को चकाचौंध कर दिया। 

बढ़ रहा अन्याय : इसी बीच अन्याय तथा पक्षपात के साथ असमानता बढ़ रही है। एल. चांसिल तथा टी. पिकेटी द्वारा लिखित विश्व असमानता रिपोर्ट 2022 में अनुमान लगाया गया है कि भारत की शीर्ष 10 प्रतिशत व्यस्क जनसं या के पास 57 प्रतिशत राष्ट्रीय आय है तथा नीचे वाले 50 प्रतिशत के पास केवल 13 प्रतिशत। शीर्ष 1 प्रतिशत को राष्ट्रीय आय का 22 प्रतिशत प्राप्त होता है। गत रविवार को जारी ऑक्सफॉर्म की रिपोर्ट में इस बात की पुष्टि की गई है कि शीर्ष 10 प्रतिशत के पास देश की 77 प्रतिशत संपत्ति है। 

भारतीय अरबपतियों की सं या 102 से बढ़ कर 142 हो गई जबकि 2021 में 84 प्रतिशत घरों को अपनी आय में गिरावट का सामना करना पड़ा। अरबपतियों की संपत्ति मार्च 2020 में 23.14 लाख करोड़ रुपए से बढ़ कर नव बर 2021 में 53.16 लाख करोड़ रुपए हो गई जबकि 4,60,00,000 से अधिक लोग अत्यंत गरीबी में पहुंच गए। बजट (2022-23) कुछ दिन दूर है। यह बहुत दुखद होगा कि यदि सरकार यह मानती है कि वह ‘टैफलोन-कोटेड’ है तथा उसे किसी बदलाव की जरूरत नहीं है। परवाह न करने वाली सरकार के लिए एकमात्र डर की चीज एक राजनीतिक कीमत चुकाना है।-पी. चिदंबरम 
 


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