नौनिहालों की शिक्षा व पोषण पर ध्यान दें, सदियों तक लाभ लें

punjabkesari.in Tuesday, Jun 28, 2022 - 06:13 AM (IST)

सन् 2013 की बात है, दुनिया के जाने-माने इन्वैस्टमैंट बैंक, एस्पिरितो सांतो ने बताया कि भारत जल्द ही डैमोग्राफिक डिविडैंड (सांख्यिकी लाभांश) के दौर में आ रहा है। लेकिन बैंक ने आगाह किया कि सही आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य के अभाव में भारत यह मौका गंवा सकता है और तब इसके पास एक आक्रोशित युवा आबादी होगी जिसके कारण सामाजिक तनाव और तज्जनित आर्थिक विनाश संभव है। पर क्या पिछले 2 वर्षों या कोरोना पूर्व के 5 वर्षों या फिर आज भी कोई नीति इस दिशा में बनी है, जिससे देश भारत के डैमोग्राफिकडिविडैंड काल का लाभ ले सके? 

पूरी दुनिया जानती थी कि भारत का डैमोग्राफिक डिविडैंड का 37 साल का काल सन् 2018 में शुरू होगा। यह फ्रेज संयुक्त राष्ट्र पापुलेशन फंड (यू.एन.डी.ए.) का दिया हुआ है और इसकी परिभाषा है- वह वर्ष जब क्रियाशील आबादी (15 से 64 का आयु वर्ग) अक्रियाशील आबादी (14 वर्ष से पहले के बालक और 65 वर्ष से अधिक आयु के वृद्ध) से ज्यादा हो जाती है। परिवार नियोजन को लेकर हर देश की समझ के अनुसार अलग-अलग समय पर यह वर्ष आता है और हर देश के लिए यह काल कितने वर्ष का होगा, यह अलग-अलग होता है। डैमोग्राफिक डिविडैंड काल के शुरू होने का अनुमान 10 साल पहले से लग सकता है। लिहाजा समझदार सरकारें पहले से ही देश में शिक्षा और स्वास्थ्य पर ज्यादा खर्च कर उन्हें सक्षम नागरिक बनाने की तैयारी कई वर्ष पहले से ही शुरू कर देती हैं। 

10 में से 9 बच्चों को न्यूनतम स्वीकार्य भोजन नहीं : एन.एफ.एच.एस.-5 की ताजा रिपोर्ट यह भी बताती है कि सन् 2019-20 तक हर 10 में से 9 बच्चे न्यूनतम स्वीकार्य भोजन भी नहीं पाते। दूसरी डराने वाली बात है कि पिछले 5 वर्षों में एक्यूट अंडरनरिश्मैंट (अत्यंत कुपोषण) की स्थिति और बिगड़ी है, खासकर उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में। इसका मुख्य कारण है सरकार ने नई राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति की घोषणा तो संसद में 2017 में जोर-शोर से की और संकल्प लिया कि स्वास्थ्य में जी.डी.पी. का 2.5 प्रतिशत खर्च करेंगे, लेकिन इसके उलट साल-दर-साल यह घटते-घटते आज 1 प्रतिशत से भी कम रह गया है। 

भारत को 2010 से ही शिक्षा और स्वास्थ्य में जबरदस्त सुधार करते हुए नौनिहालों को कुपोषण-जनित स्टंटिंग (नाटापन), वेस्टिंग (आयु के अनुसार दुबलापन) और आयु के अनुसार वजन में कमी से बचाना था। डब्ल्यू.एच.ओ. कहता है कि ऐसे बच्चे ताउम्र कम शारीरिक और मानसिक क्षमता के होते हैं, जो इनके करियर और आय पर पूरी उम्र तक असर डालता रहता है। लेकिन हकीकत यह है कि भारत में शिक्षा पर सन् 2015 में जहां बजट का 3.8 प्रतिशत खर्च होता था, सन् 2022 में यह घट कर 3.4 फीसदी हो गया। नतीजतन, देश में उन बच्चों का प्रतिशत बढ़ता गया, जो 5वीं क्लास में होते हुए भी कक्षा 2 का सामान्य गणित का सवाल नहीं हल कर पाते या हिंदी का सामान्य शब्द नहीं लिख पाते थे। 

उधर एन.एफ.एच.एस-5 की हालिया रिपोर्ट से हकीकत पता चली कि देश के 35.5 प्रतिशत शिशु छोटे कद के हैं और ग्रामीण भारत में यह प्रतिशत 37.3 है। इससे भी चौंकाने वाली बात यह है कि यह प्रतिशत सबसे ज्यादा मेघालय में 46.5, बिहार में 42.9, उत्तर प्रदेश में 39.7 और झारखंड में 39.6 है। विश्व बैंक के अनुसार अगर किसी समाज में शिशु नाटेपन से एक प्रतिशत कद कम होता है तो व्यस्क होने पर वह बालक आर्थिक उत्पादन में 1.4 प्रतिशत कम योगदान करता है और उसकी आय भी पूरी उम्र तक कम रहती है। 

लम्हों ने खता की थी सदियों ने सजा पाई : सन् 2018 में भारत में डैमोग्राफिक डिविडैंड का काल शुरू हुआ और आज देश की औसत उम्र 29 साल है। अगले 20 वर्षों के बाद स्थिति बदलने लगेगी और हम वहां खड़े होंगे, जहां चीन आज है। यानी कुल मिलाकर अगर आज से हम शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च करें और अपने नौनिहालों को स्वस्थ और अच्छी शिक्षा दें तो इसका लाभ अगले 15 साल बाद मिलेगा। लेकिन अगर हमने इस पर गलत नीतियों के कारण ध्यान नहीं दिया तो सदियों में एक बार मिलने वाला यह अवसर हम चूक जाएंगे और भारत कई सदियां पीछे हो जाएगा। 

वर्ष 2017-18 में बेरोजगारी दर 46 साल में सर्वाधिक आंकी गई। कोरोना ने रही-सही कसर पूरी कर दी। आज जरूरत है अभियान के तौर पर शिक्षा और स्वास्थ्य में निवेश करने की, ताकि अगले 20 वर्षों में युवा भारत विकास में इतना योगदान दें कि 2055 में वृद्ध होते भारत को भी कोई ङ्क्षचता न रहे। आज देश में हर 4 मैनेजमैंट ग्रैजुएट, 5 इंजीनियर या 10 सामान्य ग्रैजुएट में से केवल 1 रोजगार के लिए अपेक्षित योग्यता रखता है। 

युवाओं में आक्रोश के पीछे कारण है शिक्षा या तकनीकी शिक्षा का उद्योग की जरूरत के अनुरूप न होना। आंकड़े यह भी बताते हैं कि रोजगार के लिए तैयार आयु के केवल आधे युवा ही जीवन-यापन भर का काम पाते हैं, बाकी निराश हो तलाश ही छोड़ देते हैं। इसे छोडि़ए, उत्तर भारत का युवा एक  हाथ में पत्थर और दूसरे में पैट्रोल लेकर सरकारी संपत्ति जला रहा है। सरकार को नीति बदलनी होगी।-एन.के. सिंह 
 


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