गुजरात में पटेल-ओ.बी.सी. का मेल, भाजपा का पुराना खेल

2021-09-14T04:57:29.737

गुजरात में भाजपा पिछले 26 सालों से सत्ता में है। अब कम से कम अगले 5 सालों तक सत्ता में रहने का उसने फार्मूला बनाया है, जिसके तहत विजय रूपाणी को हटाया गया है। इसी के तहत भूपेन्द्र पटेल को मुख्यमंत्री बनाया गया है जो पाटीदार समाज से आते हैं। यानी मु यमंत्री पाटीदार और प्रधानमंत्री ओ.बी.सी.। गुजरात की 182 सीटों में से कहा जाता है कि 70 सीटों पर पाटीदार असर रखते हैं। उनकी आबादी 18 फीसदी के आसपास मानी जाती है। दूसरी तरफ ठाकौर, कोली, तेली आदि ओ.बी.सी. में आते हैं जो 60 सीटों पर असर रखते हैं। क्या यह फार्मूला काम करेगा? यह देखना दिलचस्प रहेगा।

सबसे बड़ी बात है कि गुजरात प्रधानमंत्री और गृहमंत्री का गृह राज्य है। ऐसे में दोनों गुजरात में हार एफोर्ड नहीं कर सकते। अगर ऐसा हुआ तो 2024 से पहले उनकी छवि को धक्का लगेगा। जिस तरह यू.पी. में भाजपा को चुनाव जीतना है क्योंकि 2024 का रास्ता यहीं से होकर जाता है, उसी तरह गुजरात में भी चुनाव निकालना है। भाजपा को एक डर यह भी है कि अगर गुजरात कांग्रेस सत्ता में आई तो वह पुराने मामले खोल सकती है और मोदी, शाह की छवि को चोट पहुंचाने की कोशिश कर सकती है। 

कुछ जानकारों का कहना है कि पाटीदार वोटों का समर्थन मिलना भाजपा को कम होता जा रहा है। भाजपा इस सियासी जोखिम के सहारे आगे की राजनीति नहीं कर सकती थी। खासतौर से इस बात को देखते हुए कि कांग्रेस ने युवा पाटीदार नेता हाॢदक पटेल को कार्यवाहक अध्यक्ष बनाया है (पूर्णकालिक अध्यक्ष बनाए जाने की प्रबल संभावना है)। उधर सूरत के बड़े व्यापारी महेश सेवानी को आम आदमी पार्टी ने कमान सौंपी है, जो पाटीदार ही हैं। हाल ही में सूरत नगर निगम चुनावों में ‘आप’ ने 27 सीटों पर कब्जा किया था और कांग्रेस को तीसरे स्थान पर धकेल दिया था। 

दिलचस्प बात है कि ‘आप’ वाले कह रहे हैं कि गुजरात में भाजपा ने उनके डर से मु यमंत्री बदला है और वह समझ गई है कि मरणासन्न कांग्रेस को तो हराया जा सकता है लेकिन जीवंत ‘आप’ को नहीं। यह हो सकता है कि खाम याली हो लेकिन सूरत में ‘आप’ की दस्तक थोड़ी उत्सुकता बढ़ाती है क्योंकि सूरत पाटीदारों का गढ़ है और यहां की ज्यादातर विधानसभा सीटों पर भाजपा जीतती रही है। हालांकि कुछ जानकारों का कहना है कि भाजपा तो खुद चाहती है कि ‘आप’ कुछ मजबूत हो ताकि एंटी भाजपा वोट का विभाजन कांग्रेस और उसमें हो जाए।

कुल मिलाकर लगता है कि भाजपा ने गुजरात में कोर्स करैक्शन किया है। 5 साल पहले आनंदी बेन पटेल को हटा कर जब विजय रूपाणी को मु यमंत्री बनाया गया था तब भी बहुत से जानकारों ने सवाल उठाया था। उनका कहना था कि आखिर किसी पाटीदार को ऐसे समय मु यमंत्री पद से क्यों हटा दिया गया, जब पाटीदार आरक्षण की मांग पर हो-हल्ला किए हुए हैं? दूसरा सवाल था कि पाटीदार की जगह किसी जैन समुदाय के नेता को मुख्यमंत्री बनाने की तुक क्या है? इससे कौन-सा हित सधता है? कौन-सा वोट बैंक भाजपा से जुड़ता है? लेकिन तब भाजपा को लगा कि जो कर दिया सो कर दिया। 

गुजरात के लोगों को तो प्रधानमंत्री मोदी, गृहमंत्री अमित शाह (उस समय वह मंत्री नहीं थे) से लेना-देना है। लेकिन विधानसभा चुनावों में भाजपा को झटका लगा था। पार्टी हारते-हारते बची थी, अगर अंतिम समय में मोदी भावुक अपील नहीं करते, मणिशंकर अय्यर का नीच बयान नहीं आया होता और अंतिम समय में भाजपा ने कांग्रेस के एक दर्जन नेताओं को तोड़ कर चुनाव नहीं लड़वाया होता तो लेने के देने पड़ सकते थे। 

पाटीदारों की नाराजगी 2019 के लोकसभा चुनावों में भी बनी रही हालांकि भाजपा ने 2014 की तरह सभी 26 सीटों पर कब्जा किया लेकिन पाटीदारों का वोट करीब 60 फीसदी से कम होकर 49 फीसदी ही रह गया। जिस राज्य में सिर्फ दो ही दल हों (भाजपा और कांग्रेस), वहां एक-एक वोट की कीमत होती है। भाजपा ने इसे समझना शुरू किया और फिर कोरोना आ गया। यहां गुजरात सरकार पर आरोप लगे। हाईकोर्ट तक ने स त टिप्पणियां कीं। मौत के आंकड़ों को छुपाने से लेकर खराब वैंटीलेटर का मसला उठा।  हालांकि इस बीच 260 स्थानीय निकायों में से 180 जीतकर भाजपा ने अपनी ताकत का अहसास करवाया लेकिन उसको आभास हो चला था कि चुनावी विजय के लिए विजय रूपाणी को हटाना ही पड़ेगा। 

सवाल उठता है कि क्या सवा साल पहले मुख्यमंत्री बदलने से चुनावी वैतरणी पार करना आसान हो जाता है? सवाल तो यह भी है कि अगर रूपाणी कोरोना काल में फेल होने के कारण हटाए गए तो फिर भाजपा को यू.पी. समेत कई अन्य राज्यों में मुख्यमंत्री बदल देने चाहिएं। छींटे तो दिल्ली तक पर पड़ रहे हैं। 

26 साल से सत्ता में बैठी भाजपा फिर से सत्ता में आने के लिए इतनी जुगतें कर रही है लेकिन कांग्रेस क्या कर रही है? कायदे से पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा को कड़ी टक्कर देने और 77 सीटें निकालने के बाद कांग्रेस को पूरा दम-खम लगाना चाहिए था लेकिन वह अपने विधायकों का भाजपा में जाना देखती रही। आज हालत यह है कि कांग्रेस की ठिलाई, गुटबाजी के चलते ‘आप’ को वहां पैर-पसारने का मौका मिल गया है। भाजपा की मजबूरी यह है कि अब कांग्रेस में तोड़-फोड़ की बहुत ज्यादा गुंजाइश नहीं बची है। उधर कांग्रेस को लग रहा है कि 26 साल की सत्ता विरोधी लहर उसे सत्ता के किनारे तक ले जाएगी। क्यों बेकार में हाथ-पैर चलाकर तैरा जाए और किनारे लगने की कोशिश की जाए।-विजय विद्रोही
 


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Content Writer

Pardeep

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