हमारी न्याय वितरण प्रणाली वास्तव में बहुत शर्मनाक

punjabkesari.in Thursday, May 05, 2022 - 04:05 AM (IST)

जहां हम विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र तथा संविधान में प्रदत्त मूलभूत अधिकारों के लिए खुद पर गर्व करते हैं, न्याय पाने के लिए गरीब तथा वंचित लोगों को अभी भी लम्बा संघर्ष करना पड़ रहा है। उनके लिए समय पर न्याय प्राप्त करना अभी भी दूर की कौड़ी है। 

जहां यह सर्वविदित है कि अदालतों में 4 करोड़ से अधिक मामले लम्बित हैं, कोविड महामारी के दौरान अदालतों द्वारा क्षमता से काफी कम काम करने के कारण लम्बित मामलों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई। जो चीज वास्तव में चिंताजनक है वह यह कि जेलों में 3 चौथाई से अधिक विचाराधीन कैदी हैं। उन पर केवल अपराध के आरोप लगे हैं लेकिन अदालतों द्वारा उन्हें दोषी साबित नहीं किया गया। उनमें से कइयों पर छोटे-मोटे अपराधों के आरोप हैं जैसे कि चोरी तथा स्नैचिंग। 

इसलिए जेलों में सड़ रहे 75 प्रतिशत कैदी इस स्थिति में नहीं हैं कि जमानत की राशि का प्रबंध कर सकें अथवा  न ही वे अपने लिए वकीलों की फीस चुकाने में सक्षम होते हैं या अदालतें कुछ विशेष कारणों से उन्हें जमानत देने से इंकार कर देती हैं। हालांकि एक चीज उनमें सांझी होती है, उनमें से लगभग सभी गरीब तथा अशिक्षित पृष्ठभूमि वाले होते हैं।

नैशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो (एन.सी.आर.बी.) के नवीनतम आंकड़े के अनुसार सभी विचाराधीन कैदियों में से 68 प्रतिशत या तो अनपढ़ थे या वे थे जिन्होंने स्कूल छोड़ दिया था। एक अन्य महत्वपूर्ण बात यह कि जेलों में क्षमता से अधिक भरे हुए लगभग 73 प्रतिशत विचाराधीन कैदी दलित, जनजातीय तथा अन्य पिछड़ा वर्गों से हैं जबकि 20 प्रतिशत मुसलमान। विचाराधीन कैदियों की सर्वाधिक संख्या के मामले में शीर्ष 5 राज्यों में दिल्ली, जम्मू-कश्मीर, बिहार, पंजाब तथा ओडिशा शामिल हैं। 

ऐसे व्यक्तियों की दयनीय स्थिति तथा न्याय प्रदान करने की हमारी घटिया प्रणाली के अन्य कई पहलुओं बारे गत सप्ताह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तथा भारत के प्रधान न्यायाधीश एन.वी. रमन्ना की अध्यक्षता में आयोजित मुख्यमंत्रियों की एक कांफ्रैंस में चर्चा की गई थी। प्रधानमंत्री ने बताया कि ऐसे कैदियों में से अधिकतर ‘गरीब या सामान्य परिवारों’ से थे और राज्यों से अपील की कि जहां तक संभव हो उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया जाए। उन्होंने पुराने हो चुके कानूनों को समाप्त करने की जरूरत पर भी बल दिया। उन्होंने बताया कि 1800 से अधिक कानूनों की बेकार के तौर पर पहचान की गई है तथा जहां केंद्र ने ऐसे 1450 कानूनों को खत्म किया है, राज्यों ने ऐसे केवल 75 कानून समाप्त किए हैं। 

यह अलग बात है कि उन्होंने केंद्र द्वारा देशद्रोह के लिए ब्रिटिश काल के कानूनों या आपराधिक मानहानि कानूनों अथवा गैर-कानूनी गतिविधियों (संशोधन) कानून  के अंतर्गत कड़े अथवा तानाशाहीपूर्ण कानूनों जिन्हें यू.ए.पी.ए. भी कहा जाता है, के बारे में कुछ नहीं कहा, जिनके अंतर्गत सरकारें अदालती आदेशों के बिना किसी को भी हिरासत में ले सकती हैं तथा महीनों तक राजनीतिक विरोधियों को जेलों में रख सकती हैं। 

विचाराधीन कैदियों की दयनीय स्थिति के लिए राज्यों पर दोष डालना निश्चित तौर पर एक समाधान नहीं है। यह महत्वपूर्ण है कि जहां लम्बित मामलों की संख्या तेजी से बढ़ रही है वहीं न्यायिक अधिकारियों के रिक्त पदों की संख्या भी बढ़ रही है। जैसा जस्ट्सि रमन्ना ने इशारा किया, 2016 में न्यायिक अधिकारियों की स्वीकृत संख्या   अब 24,112, के मुकाबले 20,811 थी, जो 6 वर्षों में 16 प्रतिशत की वृद्धि है। जिला अदालतों में इसी समय के दौरान लम्बित मामलों की संख्या 2.65 करोड़ से बढ़ कर 4.11 करोड़ हो गई जो 54.64 प्रतिशत की वृद्धि है। इसी तरह हाईकोर्ट के जजों की कुल स्वीकृत संख्या 1104 है जबकि 388 पद रिक्त हैं। 

विडम्बना यह है कि राज्य सरकारों, हाई कोर्ट्स, केंद्र सरकार तथा सुप्रीमकोर्ट जैसी सभी एजैंसियों की इन रिक्तियों को बनाए रखने के लिए जिम्मेदारी है। ऐसे कई मामले हैं जिनमें हाईकोर्ट्स ने नियुक्तियों के लिए सुझाव नहीं दिए हैं क्योंकि हाईकोर्ट के जज, राज्य सरकारें कई महीनों से इन सुझावों या प्रस्तावों को दबाए बैठे हैं, सुप्रीमकोर्ट ने लम्बे समय से इन प्रस्तावों को क्लीयर नहीं किया है और अंतत: केंद्र सरकार कई महीनों से इन प्रस्तावों को दबाए बैठी है। 

प्रधानमंत्री तथा भारत के प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता में मुख्यमंत्रियों तथा वरिष्ठ न्यायिक अधिकारियों की बैठक बुलाने में 6 महीने का समय लग गया। हमारे देश की न्याय प्रदान करने की बीमार प्रणाली, विशेषकर गरीबों तथा हाशिए पर धकेले गए समाज के वर्गों के लिए, यह जरूरी हो जाता है कि ठोस परिणाम के लिए प्रणाली में सुधार हेतु अधिक ध्यान दिया जाए।-विपिन पब्बी    


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