संस्कार विहीन नई युवा पीढ़ी

2021-06-15T03:50:32.873

हर सुबह अखबार पढ़े बिना भी रहा नहीं जा सकता परंतु पढऩे के बाद मन बहुत दुखी हो जाता है। कुछ समाचारों में तो शर्म से सिर भी झुक जाता है। सबसे अधिक समाचार अपराध के और वे भी भयंकर दिल दहला देने वाले पढ़ने को मिलते हैं। उसके बाद अधिक समाचार भ्रष्टाचार के होते हैं या फिर नेताओं की वे घोषणाएं होती हैं जो बहुत कम पूरी होती हैं। यह सोच कर दुख भी होता है और हैरानी भी होती है। सच्चाई यह है कि आजादी के बाद इस देश के नेताओं ने जितनी भी घोषणाएं की हैं यदि उनमें से 25 प्रतिशत भी पूरी हो गई होतीं तो आज भारत स्वर्ग बन गया होता। 

देश में सब प्रकार की योजनाएं होने के बाद भी अपराध प्रतिदिन बढ़ रहे हैं। सबसे अधिक अपराध बच्चों के विरुद्ध और उसमें भी सबसे अधिक लड़कियों का यौन शोषण, बलात्कार और हत्या। अधिकतर बलात्कार निकट के परिचित लोग करते हैं और अब तो कभी-कभी नशे के पागलपन में पिता भी दुष्कर्म करने लगे हैं। भारतीय इतिहास में न तो बलात्कार शब्द मिलता है और न ही बलात्कार की घटनाओं का वर्णन मिलता है। द्रौपदी का केवल चीरहरण हुआ था। किसी ने उसका किसी भी प्रकार से शोषण नहीं किया। परंतु उसी के कारण भारत के इतिहास का एक बहुत बड़ा युद्ध महाभारत हुआ था। 

आज चीरहरण ही नहीं बेटियों का सब कुछ सरेआम लूटा जा रहा है। दिल्ली में निर्भया कांड हुआ था। देश की पूरी जवानी सड़कों पर आ गई थी। शायद इस प्रकार का युवा शक्ति का प्रदर्शन पहली बार हुआ था। सरकार भी हिल गई, वर्मा कमेटी बनी। कानून बदला गया और बलात्कार पर फांसी देने का प्रावधान किया गया। यह हैरानी और शर्म की बात है कि इस सबके बाद भी बलात्कार बढ़ते जा रहे हैं। बच्चों के विरुद्ध अपराधों की सं या भारत के क्राइम ब्यूरो के अनुसार 2014 में 89,423 थी। एक वर्ष बाद 94 हजार हो गई और 2016 में 1 लाख 70 हजार हो गई। उसी वर्ष 1700 बच्चों की हत्या की गई। 800 बच्चे गुम हो गए। 

प्रयास संस्था के श्री अमोघ काव्थ के अनुसार 52 प्रतिशत बच्चे यौन शोषण के शिकार होते हैं। 2016 में 56300 बच्चों को अगवा किया गया। 16695 लड़कियों को विवाह करने के लिए विवश करके अगवा किया गया। क्राइम ब्यूरो के अनुसार 2014 से 2016 तक देश में बलात्कारों की सं या 13667 से बढ़ कर 36522 हो गई। एक दुख का विषय यह है कि इन अपराधों में पकड़े गए अपराधियों में से केवल 30 प्रतिशत को सजा होती है, 70 प्रतिशत छूट जाते हैं। कानून को स त करके फांसी का प्रावधान करने के बाद यही अंतर पड़ा है कि अब बलात्कार के बाद पीड़िता की हत्या भी कर दी जाती है। 

भौतिकवादी सोच के प्रभाव के कारण पैसे और स पत्ति का पागलपन इतना बढ़ गया कि कई जगह बाप बेटे की हत्या कर रहा है। बेरोजगारी और गरीबी के कारण नौबत यहां तक आ गई है कि 26 मई के ‘टाइ ज ऑफ इंडिया’ के एक समाचार ने मेरी आत्मा तक को भी दहला दिया। तेलंगाना में नौकरी के लिए एक बेटे ने सरकारी क पनी के अवकाश प्राप्त अपने पिता को मार डाला। उस क पनी में यह नियम है कि अवकाश प्राप्त पिता के मरने के बाद बेटे को तुरंत नौकरी दी जाती है। समाचार में यह भी लिखा था कि इस काम में उसकी मां और दो भाई भी शामिल थे। उसकी पत्नी और दो बेटों ने मिलकर एक तौलिए से गला दबाया और उसे मार दिया। ऐसे समाचार पढ़कर आंखों के आगे अंधेरा छा जाता है। 

अखबारें भ्रष्टाचार के समाचारों से भरी पड़ी होती हैं। देवभूमि कहे जाने वाले हिमाचल प्रदेश में अब तो कफन तक चोरी करने जैसे अपराध हो रहे हैं। कोरोना संकट में पीड़ित लोगों को बचाने के लिए पी.पी. किट खरीदने में स्वास्थ्य विभाग में घोटाले हुए। एक समाचार के अनुसार पी.पी. किट की जगह रेनकोट खरीदे गए।  प्रदेश में वर्षों से फर्जी डिग्रियां बेची जाती रहीं। केवल हिमाचल में ही नहीं ये डिग्रियां दूसरे प्रदेशों में भी गईं। 

सरकार यहीं थी, पुलिस यहीं थी, सी.आई.डी. विभाग यहीं था परन्तु भ्रष्टाचार इतना शक्तिशाली हो गया है कि सब खामोश होकर तमाशा देखते रहे। हिमाचल पूरी तरह कलंकित हो गया। जरा सोचिए किसी नौजवान से कुछ लाख रुपए लेकर उसे फर्जी डिग्री देकर उसकी जिंदगी बर्बाद कर दी गई। उस डिग्री से या तो नौकरी मिलेगी, या नहीं मिलेगी। वह कभी भी पकड़ा जा सकता है। मध्य प्रदेश के बदनाम व्यापम घोटाले के ऐसे सैंकड़ों लोग जेलों में सड़ रहे हैं। ट्रांसपेरैंसी इंटरनैशनल की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के सबसे अधिक भ्रष्ट देशों में भारत का नाम है। शायद ऐसी हालत देखकर एक उर्दू के कवि ने ये पंक्तियां कही हैं :
इस सिरे से उस सिरे तक सभी शरीके जुर्म हैं।
आदमी या तो जमानत पर रिहा है या है फरार॥ 

इस बात पर मुझे और भी अधिक ङ्क्षचता है कि देश के शासक और विद्वान इस परिस्थिति के मूल कारण को नहीं देख रहे हैं, न उसका कोई समाधान कर रहे हैं। नई तकनीक ने देश का पूरा सामाजिक पारिवारिक वातावरण बदल दिया। बच्चों के हाथ में मोबाइल और लैपटॉप आ गए। उसने युवा पीढ़ी का ध्यान इतना आकॢषत कर दिया कि अब बच्चों को माता-पिता के पास बैठने के लिए या दादा-दादी, नाना-नानी के पास बैठकर रामायण-महाभारत की कहानियां सुनने का समय नहीं रहा। 

हाथ में मोबाइल और इंटरनैट होने के बाद नई पीढ़ी में एक नया अहम पैदा हुआ है। उन्हें लगता है कि ‘मैं सब कुछ जानता हूं’। बीते समय की तरह बड़ों की बातों को सुनना और मानना अब बीते समय की बात हो गई। हमारे देश की नई पीढ़ी को संस्कार देने की पुरानी पर परा समाप्त हो गई। नई पर परा बनी नहीं।-शांता कुमार(पूर्व मुख्यमंत्री हि,प्र. व पूर्व केंद्रीय मंत्री)


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Content Writer

Pardeep

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