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‘गोरा’ बनाने के नाम पर अब नई पैंतरेबाजी!

2020-06-30T05:25:58.813

कहते हैं कि किसी भी बड़े बदलाव की चिंता या जरूरत तब होती है जब कोई बड़ी मुसीबत सामने दिखती है। अमूमन यह इंसानी फितरत है कि जब सब बिल्कुल ठीक चल रहा है और सौ टका दुरुस्त और फायदेमंद भी तो फिर फालतू बैठे-बिठाए क्यों मुसीबत मोल ली जाए? यह काम तो इंसान ही करता है फिर वह चाहे बड़ी कम्पनियों के संचालक हों या गृह उद्योग से जुड़े लोग। ऐसा ही कुछ 1975 से अब तक यानी 45 सालों से धड़ल्ले से बिक रही और भारतीय बाजार में खासकर गांवों के 70 प्रतिशत इलाकों में अपना बाजार बना चुकी मशहूर फेयरनैस क्रीम फेयर एंड लवली भी करने जा रही है। 

दरअसल अमरीकी अफ्रीकी समुदाय के अश्वेत जॉर्ज फ्लॉयड की मौत के बाद जो कुछ हुआ उससे एक बार फिर दुनिया भर में रंगभेद पर बहस छिड़ गई और इसी की झुलसन ने गोरेपन और त्वचा को सुंदर करने वाली तमाम क्रीमों को भी लपेटे में ले लिया। हालांकि भारत में ऐसा कुछ नहीं है लेकिन फेयरनैस क्रीम बाजार जरूर सकते में है कि कहीं यह आंच यहां भी न पहुंच जाए। ऐसे में तमाम गोरेपनकी क्रीम बनाने वाली कम्पनियों को भी लोगों की भावनाएं अब समझ में आईं और आनन-फानन में अपनी योजनाओं में बदलाव कर रही हैं। इस कड़ीमें कोलकाता में मौजूद देश की दिग्गज एफ.एम.सी.जी. कम्पनी इमामी लिमिटेड भी अपने गोरेपन की क्रीम फेयर एंड हैंडसम से फेयर शब्द हटाने की सोच रही है। 

अब फेयरनैस क्रीम का पहला आइडिया कहां से आया, इस बात के कोई पक्के सबूत तो नहीं हैं लेकिन नस्लवाद या काले-गोरे के फर्क का अमरीका का इतिहास जरूर सबके सामने है। अंग्रेजी में लम्बे समय तक काले अमेरिकन को अफ्रीकन-अमेरिकन कहा जाता रहा। उससे पहले एफ्रो-अमेरिकन कहते थे और उससे भी पहले केवल ब्लैक कहा जाता था। यकीनन ब्लैक  शब्द ही मानवता को शर्मसार करता था लेकिन यह भी सच है कि 19वीं सदी की शुरूआत तक काले लोगों को अमरीका में इंसान नहीं माना जाता था। अमरीका के इतिहासकार रिचर्ड व्हाइट ने भी एक जगह लिखा है कि समाज द्वारा काले और गोरों के बीच बनाई सीमाओं को लांघने पर काले लोगों की सरेआम लिचिंग हो जाती थी। 

हालांकि धीरे-धीरे उत्तरी राज्यों में काले नागरिकों को इंसान का दर्जा मिला लेकिन दक्षिणी राज्यों में यह 1862 से 1868 तक चले गृहयुद्ध के बाद मिल पाया। गुलामी से छूटे तब के सबसे बड़े काले नेता फ्रैडरिक डगलस को 12 जुलाई, 1854 में वैस्टर्न रिजर्व कालेज में बाकायदा तर्कों के साथ समझाना पड़ा था कि नीग्रो नस्ल के लोग इंसानियत का हिस्सा हैं। गृहयुद्ध के बाद बाकायदा जो कानूनन बराबरी मिली, धीरे-धीरे नए कानून बनाकर वह छीन भी ली गई। 20वीं सदी में मैल्कम एक्स और ब्लैक पैंथर आंदोलन के आक्रामक और माॢटन लूथर किंग के शांतिपूर्ण आंदोलनों के बाद काले लोगों को मतदान की योग्यता और दीगर नागरिक अधिकार वापस मिले। 

सबको पता है कि लोगों की आंख और त्वचा के रंग का फर्क सिर्फ मेलेनिन की वजह से है। मैडीकल साइंस का कहना है कि यह मेलेनिन की मात्रा से होता है। अत: इसको लेकर अन्य किसी भी प्रकार की धारणा बनाना ठीक नहीं है लेकिन उसके बाद भी गोरा और फेयर बनाने वाली क्रीम का बाजार खूब फला और फूला जो लगातार बढ़ता ही जा रहा है। अक्सर रंग का संबंध नस्ल और जाति से भी जोड़ दिया जाता है। तभी तो साफ रंग को लेकर पूर्वाग्रह दिख जाता है लेकिन एक कड़वा सच यह भी है कि चमड़ी के रंग से जुड़ी टिप्पणियांं कई बार जातिसूचक भी बन जाती हैं।  

मल्टीनैशनल कम्पनियों ने चमड़ी के रंग को गोरा बनाने के झूठ को अपना बड़ा बाजार बनाया और भारतीयों का शोषण किया। कई नामी-गिरामी कम्पनियां इसी का फायदा उठाकर जबरदस्त कमाई कर चुकी हैं। बाजार के जानकार भी मानते हैं कि हो सकता है इसीलिए तमाम ब्यूटी प्रोड्क्ट्स अपनी ब्रांड मार्कीट रणनीति के तहत ही अपने विज्ञापन और टैगलाइन में बदलाव करने के साथ ब्रांड एम्बैसेडर को बदलें और सिंबॉल या नाम से बाजार में फिर बरसों बरस बेखौफ राज करने के लिए उतरें। 

भारत में ब्यूटी और पर्सनल केयर बाजार की दर 9 प्रतिशत सी.ए.जी.आर. यानी कंपाऊंड एनुअल ग्रोथ अर्थात निवेश के विकास की वाॢषक दर बढऩे का अनुमान है। 2017 में यह बाजार 14-15 अरब डॉलर का था जोकि साल 2022 तक 22-23 अरब डॉलर होने का अनुमान है। शायद यही बड़ा आंकड़ा भी भारत में गोरा बनाने वाली क्रीम कम्पनियों को ललचा रहा हो, तभी तो दुनिया भर में नस्लभेद विरोधी एकाएक उग्र हुए आंदोलन के भविष्य को आंकते हुए सचेत होकर अपने भविष्य को भी संवारने की रणनीति के तहत ऐसा कुछ कर रहे हों जिससे सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे। इधर बाजार जानकारों का भी मानना है कि संभव है कि अब ये ब्यूटी प्रोडक्ट्स ब्रांड मार्कीट स्ट्रैटजी के तहत अपने विज्ञापन और टैगलाइन में बदलाव के साथ ही ब्रांड एम्बैसेडर को बदलने पर विचार करें।-ऋतुपर्ण दवे
 


Pardeep

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