कभी मीडिया की ‘सकारात्मक भूमिका’ भी समझें

2020-10-16T02:20:17.527

हाल ही में एक चैनल ‘यू.पी.एस.सी. जिहाद’ शीर्षक नौ एपिसोड का सीरियल दिखा रहा था, यह कहते हुए कि कुछ मुस्लिम संस्थाएं अपने लड़कों को प्रशासनिक सेवाओं में भेजने की ‘साजिश’ कर रही हैं (लव-जेहाद की तरह जिसमें कहा जाता है कि मुसलमान लड़के ङ्क्षहदू लड़कियों को फंसा कर शादी करते हैं और धर्म परिवर्तन भी)। 

अपनी बात को इन्वैस्टिगेटिव जर्नलिज्म का नायब नमूना बता कर चैनल कह रहा था कि पिछले कुछ वर्षों में मुसलमान युवा ज्यादा तादाद में आई.ए.एस. और आई.पी.एस. बने हैं (हकीकत उलटी है)। दूसरा दावा था कि मुसलमानों के लिए अधिकतम आयु 35 साल कर दी गई है जबकि हिन्दुओं की 32 साल है (एक हाई स्कूल पास व्यक्ति भी जानता है कि धर्र्म के आधार पर कोई रियायत नहीं मिलती)।

नितांत गलत आंकड़े और तथ्य जब चार एपिसोड में परोसे गए तो एक याचिका दायर कर इस सीरियल के टैलीकास्ट पर रोक लगाने की मांग सुप्रीमकोर्ट में की गई। तब भारत सरकार के दूसरे सबसे बड़े वकील सॉलिसिटर जनरल ने सुप्रीम कोर्ट में कहा, ‘‘खोजी पत्रकारिता पर रोक नहीं लगाई जा सकती क्योंकि संविधान उन्हें यह अधिकार देता है’’। लेकिन दस दिन बाद ही जाने-माने वकील प्रशांत भूषण द्वारा 2009 में दिए गए एक इंटरव्यू को लेकर इसी कोर्ट में अवमानना की सुनवाई के मामले में भारत सरकार के सबसे बड़े वकील अटॉर्नी जनरल ने कहा, ‘‘जो मामले अदालतों में सुनवाई के अधीन हैं उन पर रिपोॄटग करके मीडिया न्यायपालिका की गरिमा को गिरा रहा है।’’ महान वकील शायद यह भूल गए कि खोजी पत्रकारिता इसका इंतजार नहीं करती कि कब मामला कोर्ट में पहुंचा। दुनिया के सभी बड़े घोटाले तब बाहर आए हैं जब उन पर कोर्ट सुनवाई कर रही थी। 

मीडिया ट्रायल का दूसरा पहलू 
एक किस्सा हकीकत बताता है। कुछ वर्ष पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एक बलात्कार के बाद हत्या का मामला हुआ। मीडिया ने बलात्कारी के खिलाफ तथ्य दिए। निचली अदालत ने उसे सजा दी। मीडिया सत्य साबित हुई और कार्य भी सराहनीय माना गया लेकिन अपराधी ने हाईकोर्ट में अपील की, जिसने उसे बरी कर दिया। जाहिर है वही मीडिया अब गलत ठहराया गया यानी ‘मीडिया ट्रायल’ का आरोप लगा। लेकिन राज्य फिर हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीमकोर्ट चला गया। देश की सबसे बड़ी अदालत ने न केवल निचली अदालत में दी गई सजा को सही ठहराया बल्कि हाई कोर्ट की समझ पर भी नकारात्मक टिप्पणी की। यानी मीडिया का सही या गलत होना इस बात पर निर्भर करेगा कि सीढ़ी-दर-सीढ़ी न्याय-व्यवस्था में किसमें कितनी सीढिय़ां चढऩे की कुव्वत है।

मीडिया की आलोचना करने से पहले एक अन्य ताजा स्थिति पर गौर करें, सत्ताधारी भाजपा के एक पूर्व केन्द्रीय मंत्री और तीन बार सांसद पर उनके कॉलेज की एक छात्रा ने साल भर तक बलात्कार और ब्लैकमेल का आरोप लगाया। एस.आई.टी. ने पूरी जांच के बाद इस गेरुआधारी सांसद को पिछले वर्ष गिरफ्तार किया। इस स्वामी नेता पर सन 2011 में भी आश्रम की एक साध्वी ने ऐसा ही आरोप लगाया था लेकिन सात साल बाद राज्य की भाजपा सरकार ने यह केस अदालत से वापस ले लिया। क्या दूसरे मामले में भी मीडिया इसलिए चुप हो जाए कि पहला केस अदालत में जेरे बहस है?

आपको याद होगा कि यह सांसद लगातार मीडिया को बुरा भला कहता रहा और अपने को निर्दोष बताता रहा जबकि मीडिया ने वे सभी गंदे वीडियो और संदेश भी दिखाए जो सांसद और इस छात्रा के बीच रहे।  छात्रा ने विस्तार से मीडिया को इंटरव्यू में बताया था कहां, कैसे और कब इस महंत सांसद ने इसका शारीरिक शोषण किया। लेकिन इससे भी बड़ा झटका पूरे सिस्टम-न्यायपालिका, पुलिस और मीडिया को तब लगा जब दो दिन पहले इस छात्रा ने कोर्ट में बयान दिया कि उसके द्वारा लगाए सभी आरोप गलत हैं और विपक्ष के लोगों ने उसे डरा कर ये आरोप लगवाए थे। बहरहाल पुलिस (अभियोजन) ने कहा है कि वह इस छात्रा के खिलाफ ‘परजुरी’ (झूठा बयान) देने का मुकद्दमा दायर करेगी। 

मान लीजिए कल मीडिया को ऐसे वीडियो मिलते हैं जिसमें स्वामी दबाव या लालच देकर इस लड़की से बयान बदलवा रहा है तो क्या मीडिया इस आधार पर साक्ष्य समाज में न लाए कि इससे न्यायपालिका की (अटॉर्नी जनरल मुताबिक) गरिमा गिरती है? अगर सिस्टम में सब कुछ सही था तो हाथरस काण्ड के दस दिन में बलात्कार की जांच क्यों नहीं हुई, जबकि पहले दिन ही मैजिस्ट्रेट के सामने उसने कहा था, ‘‘संदीप ने मेरे साथ जबरदस्ती की, फिर मारा।’’ और क्यों 10 दिन बाद की निजी अंग की स्वाब जांच के बाद प्रदेश का अतिरिक्त महानिदेशक (कानून-व्यवस्था) ऐलान करता है कि बलात्कार नहीं हुआ। हाईकोर्ट की भी नाराजगी तो यही थी न कि जो अधिकारी जांच का हिस्सा नहीं वह ऐसा दावा मीडिया से कैसे कर सकता है। 

क्या मीडिया जांच में अनावश्यक अवरोध पैदा कर रही थी, जब उसे पीड़िता के गांव जाने से रोका गया? क्या जब कलैक्टर पीड़िता को ‘समझा’ रहा था कि मीडिया तो चली जाएगी लेकिन हम तो यहीं रहेंगे या यह कह रहा था कि ‘‘मान लो लड़की को कोरोना हो जाता तो क्या सरकार ये लाखों रुपए देती’’ तो मीडिया को इस बात का इंतजार करना चाहिए था कि ‘साहेब बहादुर’ धमकाने के बाद कब मीडिया को ‘सत्य’ की जानकारी देंगे? यह मीडिया का शिद्दत से लगना ही तो था कि हाईकोर्ट पूरे मामले का स्वत:-संज्ञान लेती है। वरना सरकार तो पूरे केस को इश्क का चक्कर और ‘ऑनर किलिंग’ बता कर कब का पल्ला झाड़ लेती। अटॉर्नी जनरल ने कोर्ट में कहा ‘‘मीडिया ट्रायल की वजह से कोर्ट भी प्रभावित होती है’’। शायद वह भूल गए कि जजों को ‘ट्रेंड ज्यूडीशियल माइंडस’ कहा जाता है। अगर मीडिया रिपोर्ट से किसी जज का फैसला बदल जाए तो वह जज बनने के योग्य नहीं है। 

दरअसल सरकारें  या उनके अभिकरण ईमानदार और संवेदनशील होकर कानून के अनुरूप काम करें तो मीडिया को न तो चीखने की जरूरत होती, न ही इन्वैस्टिगेटिव जर्नलिज्म की भूमिका होती लेकिन जब वर्दी पहना अफसर या कानून का अनुपालन लेने वाला कलैक्टर ‘मुख्यमंत्री’ को खुश करने के लिए ‘पॉलिटिकली करैक्ट’ स्थिति बनाने के लिए आपराधिक रूप से स्याह को सफेद करने लगता है तो आवाज बुलंद करना हर व्यक्ति और लोक कल्याण की संस्था का दायित्व होता है। इसका उदाहरण जेल में आसाराम  बापू और बाबा राम रहीम हैं। अगर मीडिया न होता तो न जाने कितनी लड़कियां इनके गुनाह का शिकार होतीं।-एन.के. सिंह
 


Pardeep

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