अनावश्यक सार्वजनिक इकाइयों का निजीकरण जरूरी

2021-07-20T06:00:55.44

तकनीकों की वैश्विक प्रतिस्पर्धा में हम पिछड़ते जा रहे हैं। चीन ने सफलतापूर्वक मंगल ग्रह पर अपना यान उतारा है, सूर्य के ताप के बराबर का ताप अपनी प्रयोगशाला में बना लिया है और लड़ाकू विमानों को राफेल या दूसरी कंपनियों से खरीदने के स्थान पर स्वयं बनाने में सफलता हासिल की है। यदि हमें इस क्षेत्र में अपनी पैठ बनानी है तो नई तकनीकों के सृजन में भारी निवेश करना जरूरी होगा। यद्यपि वर्ष 2021-2022 के बजट में केंद्र सरकार ने पूंजी खर्चों में लगभग 35 प्रतिशत की वृद्धि की है और वर्तमान वर्ष में 5.5 लाख करोड़ रुपए का पूंजी खर्च करने का प्रस्ताव है, परंतु यह फलीभूत होगा कि नहीं, यह निश्चित नहीं है। इस निवेश में नई तकनीकों का क्या हिस्सा है यह भी स्पष्ट नहीं है।

सच यह है कि आने वाले समय में तकनीकों का ही बोलबाला होगा। जिस  देश के पास आधुनिकतम तकनीकें होंगी, वही विजयी होगा। हम देख चुके हैं कि किस प्रकार अमरीका की आधुनिक पैट्रियाट मिसाइलों ने सद्दाम हुसैन के ईराक की सेना को चंद दिनों में ही ध्वस्त कर दिया था। इसलिए हमें तकनीकों में भारी निवेश करना होगा। प्रश्न है कि इसके लिए रकम कहां से आए? सरकारी इकाइयां तीन प्रकार की हैं। 

पहली इकाइयां सार्वजनिक सुविधाएं प्रदान करने वाली हैं, जैसे स्टेट बैंक ऑफ इंडिया हर जिले में क्लीयरिंग हाऊस चलाता है अथवा जैसे सैंट्रल बोर्ड ऑफ सैकेंडरी एजुकेशन द्वारा पूरे देश के विद्यालयों को नियमित किया जाता है।  इस प्रकार की सार्वजनिक इकाइयों को बनाए रखना जरूरी है। इन कार्यों को निजी हाथों में नहीं छोड़ा जा सकता। दूसरी इकाइयां वे हैं जिनके समकक्ष निजी इकाइयां वर्तमान में सफल हैं, जैसे स्टेट बैंक को छोड़कर अन्य बैंक के सामने प्राइवेट बैंक सफल हैं; अथवा जैसे एयर इंडिया के सामने कुछ निजी एयरलाइंस सफल हैं, आदि। 

इन क्षेत्रों में सार्वजनिक इकाइयों को बनाए रखने का औचित्य नहीं है क्योंकि इन सेवाओं को निजी उद्यमी उपलब्ध करा सकते हैं। यह सही है कि निजी उद्यमियों द्वारा जनता से अधिक रकम वसूल कर मुनाफाखोरी की जा सकती है लेकिन इस समस्या को नियंत्रण व्यवस्था सुदृढ़ करके संभाला जा सकता है। वर्तमान में सार्वजनिक इकाइयों का ‘मार्कीट कैपिटलाइजेशन’ यानी उनके शेयरों की बाजार में कीमत लगभग 20 लाख करोड़ है। इसके सामने वर्तमान वर्ष 2021-2022 सरकार द्वारा कुल पूंजी खर्च केवल 5.5 लाख करोड़ रुपए किया जा रहा है। अत: यदि वर्तमान सार्वजनिक इकाइयों का निजीकरण कर दिया जाए तो हमें 20 लाख करोड़ रुपए की विशाल रकम मिल सकती है। इसमें यदि एक-चौथाई इकाइयां, जैसे स्टेट बैंक को मान लें, जिनका निजीकरण नहीं करना चाहिए, तो हमें लगभग 15 लाख करोड़ रुपए की विशाल रकम मिल सकती है। 

इस विशाल रकम का हमें नई तकनीकों के सृजन में तत्काल निवेश करना चाहिए। जैसे एक इकाई आर्टीफिशियल इंटैलीजैंंस को बढ़ावा देने के लिए बनाई जा सकती है। वर्तमान में मैडीकल आदि क्षेत्रों में आर्टीफिशियल इंटैलीजैंस की सहायता से रोगियों को लाभ मिल रहा है। आर्टीफिशियल इंटैलीजैंस द्वारा डॉक्टर के लिए तमाम टैस्ट रिपोर्ट्स को स्वयं देखना आवश्यक नहीं रह जाता। दूसरे, छठी पीढ़ी के इंटरनैट के सृजन के लिए हमें निवेश करना चाहिए। तीसरे, इंटरनैट ऑफ थिंग्स जैसे इंटरनैट के माध्यम से किसी द तर की सुरक्षा व्यवस्था को संचालित करना, एयर कंडीशनिंग को नियंत्रित करना इत्यादि में निवेश करने में बहुत संभावनाएं हैं। चौथा, आने वाले समय में जैनेटिक जीन परिवर्तन से नई दवाएं इत्यादि बनाई जा रही हैं जिस पर भी हमें निवेश करना चाहिए। 

पांचवा, आयुर्वेद, यूनानी एवं हो योपैथी जैसी वैकल्पिक दवाओं के विस्तार के लिए हमें इकाई बनानी चाहिए, जो इन उपचार व्यवस्थाओं का अंतर्राष्ट्रीय प्रचार करे और अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुसार इन पर शोध करे इत्यादि। छठा, वर्तमान में इसरो द्वारा दूसरे देशों के सैटेलाइट अंतरिक्ष में पहुंचाए जा रहे हैं। यही कार्य एक अलग इकाई द्वारा किया जा सकता है। भारत भी अमरीका की तरह वाणिज्यिक स्तर पर अंतरिक्ष एवं दूसरे ग्रहों में यान भेज सकता है। इस सब के लिए जरूरी है कि देश वर्तमान की तुलना में नई तकनीकों के सृजन में 10 गुना निवेश बढ़ाए। इसके लिए सरकार को कठोर कदम उठाते हुए स्टेट बैंक को छोड़ कर अन्य सरकारी बैंकों, एयर इंडिया, तेल क पनियों आदि का निजीकरण कर देना चाहिए। 

मैं मानता हूं कि जिस इकाई का निजीकरण किया जा रहा है, उसके कर्मचारियों को सेवानिवृत्त नहीं किया जा रहा। जो भी उद्यमी इन इकाइयों को खरीदेगा उसे भी कर्मचारी की जरूरत होगी। यदि कर्मचारी ईमानदारी से काम करेंगे तो उन्हें वह निकाले, इसकी जरूरत नहीं है। अत: इस समय सार्वजनिक इकाइयों के श्रमिकों के हित साधने के स्थान पर सरकार को देश का तकनीकी भविष्य साधना चाहिए।-भरत झुनझुनवाला
 


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Content Writer

Pardeep

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