कोयला मंत्रालय में रहस्यमयी ‘फेरबदल’

10/8/2019 1:03:28 AM

कोयला सचिव सुमंत चौधरी को अचानक हटाकर उनके पद पर ए.के. जैन की नियुक्ति ने सत्ता के गलियारों में सभी को अपनी जीभ दांतों में दबाने के लिए मजबूर कर दिया है। चौधरी के उत्तराधिकारी के रूप में जैन के नियुक्ति आदेश दरअसल चौधरी के भविष्य पर मौन हैं और इसी से उनको लेकर रहस्य बढ़ रहा है। उन्हें न तो अपने पश्चिम बंगाल कैडर में वापस किया गया है और न ही केन्द्र में कोई अन्य मंत्रालय या विभाग दिया गया है। आदेश में यह भी उल्लेख नहीं किया गया है कि चौधरी को आगे की पोस्टिंग के लिए प्रतीक्षा में रखा गया है। 

इस नियुक्ति का आदेश आने के समय को लेकर भी काफी अटकलें लगाई जा रही हैं, क्योंकि ठीक उसी समय पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के साथ बैठकों के लिए राजधानी में थीं। यह कहा गया कि बनर्जी निवर्तमान मुख्य सचिव मलय कुमार डे को बदलने के लिए चौधरी को कोलकाता भेजने हेतु केन्द्र से अनुरोध करने जा रही हैं। लेकिन पश्चिम बंगाल के बाबुओं के पास इस सोच पर यकीन करने का ठोस आधार नहीं है। कहा जा रहा है कि न तो चौधरी और न ही राज्य की मुख्यमंत्री को इस लक्ष्य को हासिल करने में कोई दिलचस्पी थी। जनवरी, 2021 में सेवानिवृत्त होने से पहले चौधरी के पास जाहिर तौर पर 16 महीने का समय अभी बाकी बचा हुआ है। 

दूसरी ओर हाल के दिनों में कोयला मंत्रालय में सचिवों को काफी तेजी से बदले जाते हुए देखा गया है। चौधरी ने लगभग 10 महीने तक कोयला सचिव के रूप में काम किया लेकिन उनके पूर्ववर्ती इंद्रजीत सिंह ने इस पद पर मुश्किल से 5 महीने ही बिताए थे। 

असंतोष की तेज होती आवाज
व्हिसलब्लोअर माने जाते भारतीय वन सेवा के अधिकारी संजीव चतुर्वेदी ने हाल ही में प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष में 25,000 रुपए का दान दिया। उन्हें उत्तराखंड उच्च न्यायालय के आदेश के अनुपालन में केन्द्र से मुआवजे के रूप में यह राशि मिली, जो उनकी मूल्यांकन रिपोर्ट में प्रतिकूल प्रविष्टियों पर विवाद का निपटारा कर रहा था। चतुर्वेदी ने कथित तौर पर प्रधानमंत्री कार्यालय (पी.एम.ओ.) को यह कहते हुए लिखा है कि उनके करियर के दौरान विभिन्न अधिकारियों द्वारा उन्हें परेशान किए जाने के बाद ईमानदार अधिकारियों की मदद करने के लिए एक कोष बनाया जाना चाहिए, जो निशाना बनाए जाने की कार्रवाई का शिकार हुए हैं। अपने पत्र में उन्होंने संविधान सभा में सरदार पटेल की टिप्पणी को उद्धृत किया जहां उन्होंने कहा था, ‘‘यदि आपके पास एक अखिल भारतीय सेवा नहीं है, जो कि अपनी स्वतंत्रता के साथ अपने दिमाग से बोलती है, तो आपके पास एक अखंड भारत नहीं होगा।’’ 

चतुर्वेदी, जिन्होंने 2012 का रेमन मैग्सेसे पुरस्कार भी जीता था, वर्तमान में उत्तराखंड के हल्द्वानी में वनों के संरक्षक के रूप में तैनात हैं। उन्होंने पहले रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से प्राप्त धन को भी दान किया था। सूत्रों का कहना है कि पी.एम.ओ. की ओर से चतुर्वेदी के सुझाव पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है, हालांकि पी.एम. के राहत कोष में धन दान करने के उनके कदम की काफी सराहना की गई है। 

ममता के ‘वफादारों’ को महसूस हो रही है तेज आंच
कोलकाता पुलिस के विवादास्पद पूर्व प्रमुख राजीव कुमार तृणमूल शासित पश्चिम बंगाल से एकमात्र वरिष्ठ अधिकारी नहीं हैं, जिनकी केन्द्रीय एजैंसियों द्वारा जांच की जा रही है। जहां कुख्यात शारदा चिट फंड  घोटाले में कुमार की कथित भूमिका के लिए जांच की जा रही है, 2 अन्य- सेवानिवृत्त आई.पी.एस. एस.के. पुरकायस्थ और वरिष्ठ आई.ए.एस. अधिकारी अत्री भट्टाचार्य- सी.बी.आई. की जांच सूची में हैं। सी.बी.आई. से अलग प्रवर्तन निदेशालय भी राज्य सरकार की 
एक कम्पनी के विनिवेश से जुड़े मामले में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के मुख्य सचिव गौतम सान्याल की जांच कर रहा है। 

हालांकि इन 4 अधिकारियों के लिए एक बात सामान्य है- वे सी.एम. के आंतरिक सर्कल का हिस्सा होने के रूप में हर तरफ जाने जाते हैं। ‘वफादारों’ के रूप में उनको लेकर कहा जाता है कि उनके पास हर तरह की ताकत और अधिकार हैं जबकि केन्द्र का मानना है कि कथित वित्तीय घोटालों और दुरुपयोग की शक्ति में नियमित जांच के साथ-साथ इन बाबुओं में एजैंसियों की रुचि काफी बढ़ गई है। वहीं राज्य सरकार यह मान रही है कि मोदी सरकार का मुख्यमंत्री से सीधा टकराव ही इन अधिकारियों के लिए कड़ी परीक्षा साबित हो रहा है। कहा जा रहा है कि इस सारी कसरत का मकसद राज्य सरकार को शॄमदा करना है।-दिल्ली का बाबू दिलीप चेरियन
 


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