कांग्रेस की छवि को पहुंच रहा और भी नुक्सान

punjabkesari.in Thursday, Sep 29, 2022 - 04:38 AM (IST)

कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष के चुनावों को लेकर घटनाक्रमों, जिनमें मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के करीबी राजस्थान के विधायकों द्वारा खुला विद्रोह शामिल है, ने पहले से ही बुरी हालत में पहुंच चुकी कांग्रेस की छवि को और नुक्सान पहुंचाया है। अपनी ही कब्र खोद रही पार्टी को वास्तव में कोई राहत नहीं मिल रही, तब भी जब यह स्पष्ट है कि इसने अपने लिए पर्याप्त से ज्यादा गड्ढा खोद लिया है। ये घटनाक्रम एक अयोग्य नेतृत्व तथा वरिष्ठ सलाहकारों के समूह को दर्शाते हैं जो जमीनी हकीकतों के प्रति बंद कानों के साथ अंधेरे में हाथ-पांव मार रहे हैं।

एक और झटका उन्हें तब मिला जब गहलोत से जुड़े 90 विधायकों ने अपनी खुद की बैठक बुलाने का निर्णय किया और स्पीकर को अपने इस्तीफे सौंप दिए। यह अलग मामला है कि उन्होंने जानबूझ कर गलत फॉरमैट में अपने इस्तीफे सौंपे ताकि उन्हें स्वीकार न किया जा सके। इस्तीफों के नाटक का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पहलू यह था कि पहली बार पार्टी के विधायकों अथवा वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी हाईकमान के निर्देशों की अवहेलना की जिनमें गांधी परिवार शामिल है जिन्हें कुछ चुनिंदा नेता घेरे रहते हैं जिन्होंने बार-बार अपनी अकुशलता के सबूत दिए हैं।

यह घटनाक्रम एक ऐसे समय में हुआ है जब गांधी परिवार के सर्वाधिक पसंदीदा नेता ने अपनी निजी महत्वाकांक्षाओं को पार्टी से ऊपर रखा है। स्थापित नेतृत्व की ऐसी सार्वजनिक तौर पर अवहेलना की आशा की जा रही थी। एक तरह से यह एक प्रथा बन सकती है। पार्टी की पूर्ववर्ती 2 लोकसभा चुनावों को जीतने में असफलता तथा इसी समय के दौरान दर्जनों विधानसभा चुनाव हारना इस बात का पर्याप्त सबूत है कि केवल वही पार्टी के पतन के लिए जिम्मेदार हैं जिसने स्वतंत्रता से लेकर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी नीत गठबंधन बनने तक देश पर एक-छत्र राज किया।

नि:संदेह अतीत में कांग्रेस जनता पार्टी से  हार गई थी उसके बाद गैर-कांग्रेसी गठबंधनों से लेकिन इसे गत एक दशक से जो झटके मिल रहे हैं उन्होंने इसका अब तक का सबसे घटिया रिकार्ड बना दिया है। पंजाब में शर्मनाक पराजय के बाद, जहां इसने खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी और कमजोर राजनीतिक कुशाग्रता का प्रदर्शन किया, ऐसा दिखाई देता है कि कांग्रेस ने गुजरात तथा हिमाचल प्रदेश में होने वाले चुनावों के लिए भी अपने हथियार डाल दिए हैं।

दिलचस्प बात यह है कि ‘भारत जोड़ो यात्रा’ विशेष तौर पर इन दोनों चुनावी राज्यों से गुजर रही है। चाहे यह भारत जोड़ो यात्रा है अथवा जिस तरह से पार्टी ने अपने अध्यक्षीय चुनावों से निपटा है, दिखाता है कि गांधी परिवार द्वारा ‘तटस्थ’ रहने के दावों के बावजूद पार्टी अध्यक्ष के लिए ‘स्वतंत्र’ चुनावों की घोषणा के बावजूद कुछ भी नहीं बदला। यह तथ्य कि यात्रा का नेतृत्व राहुल गांधी कर रहे हैं, जिनके पास पार्टी का कोई पद नहीं है, संकेत देता है कि वह अपनी शक्तियां नहीं छोडऩा चाहते तथा बिना कोई जिम्मेदारी उठाए पार्टी का नेतृत्व करना चाहते हैं।

यह भी एक तथ्य है कि गहलोत सहित अन्य पार्टी नेता उनसे मिलने के लिए गए ताकि मुख्यमंत्री का पद संभाले रखने के लिए उनसे इजाजत ली जा सके, हालांकि वह पार्टी पदाधिकारी नहीं हैं। गहलोत को तब शॄमदा होना पड़ा जब राहुल गांधी ने सार्वजनिक तौर पर उनसे कहा कि पार्टी ने एक नेता, एक पद नीति पर अमल करने का निर्णय किया है। क्या पार्टी में किसी ने भी इस बात पर आपत्ति उठाई कि राहुल गांधी ने किस अधिकार से वह घोषणा की जिसने गहलोत को धूल चटा दी।

अध्यक्ष पद के लिए स्वतंत्र चुनाव के दावों के बावजूद जिस तरह से कांग्रेस हाईकमान कार्य कर रहा है, ताकत को अपने हाथों में बनाए रखने के उसी बर्ताव को दर्शाता है। यह पूरी तरह से स्पष्ट कर दिया गया था कि गहलोत आधिकारिक उम्मीदवार हैं यद्यपि शशि थरूर ने भी अपना दावा ठोक दिया तथा कुछ अन्य भी ऐसा करने का प्रयास कर रहे थे। अत: वह चुनाव जिसमें गांधी परिवार को ‘तटस्थ’ रहना था, एक अन्य स्वांग में बदल रहा है। पार्टी चुनावों का जो भी अंतिम परिणाम हो, पार्टी की छवि को और अधिक नुक्सान पहुंच रहा है। एक ऐसे समय में जब सरकार को नियंत्रण में रखने के लिए भारत को एक मजबूत विपक्ष की जरूरत है, पुरानी वैभवशाली पार्टी अपनी ताॢकक भूमिका न निभाकर देश को असफल बना रही है।-विपिन पब्बी


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