महामारी में लाखों ने अपने प्रियजनों को खो दिया

6/10/2021 4:58:52 AM

2 माह के बुरे सपने के बाद कोविड महामारी की दूसरी लहर देश में कम होती प्रतीत हो रही है। रोजाना के पॉजिटिव मामलों की गिनती जो प्रतिदिन 4 लाख से ऊपर दिखाई देती थी अब एक लाख से भी कम पर आ गई है। इसी तरह मौतों की गिनती जो प्रतिदिन 4000 से ऊपर का आंकड़ा पार कर गई थी अब करीब 2000 प्रतिदिन रह गई है। हालांकि ये मात्र आधिकारिक आंकड़े हैं तथा कुछ ही लोग इसकी सच्चाई पर भरोसा करते हैं क्योंकि देश में अस्पताल बैडों, दवाइयों तथा ऑक्सीजन की कमी, श्मशानघाटों पर जलती हुई चिताएं तथा गंगा में बहते हुए शवों के चित्र कुछ और ही बयां करते हैं। 

मगर वास्तविकता यह है कि शवों के दफनाने और उनके संस्कार  में आई कमी के बारे में कम ही सुना गया है। निश्चित तौर पर यह एक संयम देने वाली बात है और यदि यह ट्रैंड निरंतर जारी रहा तो बुरे सपने की बात पीछे रह जाएगी और जीवन फिर पटरी पर लौट आएगा। महामारी ने हमारे देश को बुरी तरह से प्रभावित किया और शायद विश्व में सबसे यह बुरा दौर था। इसने लाखों की तादाद में देशवासियों को गरीबी में धकेल दिया। 23 करोड़ लोगों ने अपना रोजगार खो दिया, जी.डी.पी. वृद्धि आधिकारिक तौर पर माइनस 7.3 प्रतिशत पर खड़ी है तथा लाखों मध्यम और लघु उद्यमों पर ताला लग गया है। 

औद्योगिक उत्पादन की लागत में एक बड़ी बढ़ौतरी हुई है जिसमें लौह अयस्क भी शामिल हैं जिसकी कीमतें पिछले 6 माह के दौरान दोगुनी हो चुकी हैं। इससे इन उद्यमियों को और भी दिक्कत हो जाएगी जो दोबारा गति पकडऩा चाहते हैं। छोटे व्यापारियों तथा दुकानदारों की हालत भी दयनीय है।

ऑनलाइन खरीददारी ने उनके व्यवसाय को और ज्यादा गैर फायदेमंद बना दिया है। सरकार को भी अब अर्थव्यवस्था को ट्रैक पर फिर से लाने की बात सोचनी चाहिए। बढ़ती हुई बेरोजगारी तथा गरीबी ने देश में नाजुक कानून-व्यवस्था की स्थिति पैदा कर दी है। डकैती, छीना-झपटी और लूटपाट जैसे अन्य अपराधों में बढ़ौतरी हुई है। शिक्षा एक अन्य क्षेत्र है जो महामारी के चलते पीछे को धकेला गया है। छात्र स्कूलों, कालेजों, विश्वविद्यालयों तथा अन्य संस्थानों में पिछले एक साल से नहीं जा पा रहे। 

कुछ छात्र तो एम.बी.ए.  जैसे प्रोफैशनल कोर्स बिना किसी बैठक के ऑनलाइन विकल्प को अपनाए हुए हैं। यह जग-जाहिर है कि शिक्षा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा दोस्तों तथा सहपाठियों से सीखने का भी है। इसी तरह की हालत उन छात्रों की भी है जो पिछले साल या इस वर्ष पास हुए हैं। महामारी के चलते शिक्षा की उड़ान बुरी तरह से प्रभावित हुई है। इसमें कोई शंका वाली बात नहीं कि इनमें से कुछ छात्रों को मनोवैज्ञानिक चिकित्सक तथा कौंसलिंग की मदद की जरूरत पड़ सकती है। छात्रों में सबसे ज्यादा वे प्रभावित हुए हैं जिनके पास इंटरनैट तक की पहुंच नहीं है। डिजिटल दुनिया ने ऐसे छात्रों के बीच खाई को और बड़ा कर दिया है। 

ऑनलाइन क्लासों को लेने वाले टीचरों के लिए भी यह कठिन समय की घड़ी है। छात्रों से जुड़े रहने के लिए उन्हें नए-नए रास्तों तथा तकनीकों को सीखना पड़ रहा है। उनका कार्य साधारण से बेहद दूर पहुंच चुका है क्योंकि उन्हें अपने बच्चों तथा परिवारों को भी देखना है। वास्तव में महिला टीचरों को विशेषकर और दबाव झेलना पड़ रहा है क्योंकि उन्हें अपने बच्चों तथा परिवारों को भी देखना पड़ रहा है। एक ही समय में वह क्लासों तथा पारिवारिक जि मेदारियों को निभा रही हैं। देश में ऐसा कोई भी पेशा नहीं है जो महामारी के चलते प्रभावित नहीं हुआ हो। 

डाक्टरों, पैरामैडीकल स्टाफ, सुरक्षाकर्मी, मीडिया, फ्रंटलाइन कर्मचारी तथा सामाजिक कर्मचारियों के कार्यों की ल बी अवधि ने उनके लिए और ज्यादा मुश्किलें बढ़ा दी हैं। जीवन के कई अन्य भाग भी हैं जहां पर हम महामारी का और ज्यादा प्रभाव देख पा रहे हैं। अब न्यायपालिका की बात ही कर लेते हैं। जैसा कि अदालतें एक वर्ष से ज्यादा समय से बंद पड़ी हैं और कुछ ही अनिवार्य मामले देखे जा रहे हैं। इसलिए विभिन्न अदालतों में लंबित पड़े मामलों की गिनती 3.5 करोड़ से अब 4.2 करोड़ तक आ पहुंची है। स्पष्ट तौर पर इससे न्याय मिलने में और देरी हो रही है और मामलों के हल होने में और कितने साल लग जाएंगे। 

लाखों की तादाद में माताएं, पिता, बहनें, भाई तथा अन्य नजदीकी रिश्तेदार और दोस्तों ने अपने प्रियजनों को खो दिया। छोटे बच्चों की स्थिति तो और भी दयनीय है जिन्होंने अपने अभिभावकों को खो दिया। शुरूआती आधिकारिक अनुमान के अनुसार 3621 बच्चों ने अपने माता-पिता को खोया है तथा 30,071 ने अपने माता-पिता में से किसी एक को जरूर खोया है। उनकी क्षतिपूर्ति किसी भी हालत में नहीं हो सकती।-विपिन पब्बी


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