धन बचाने मेें ‘समझदारी’, सुरक्षा के लिहाज से मूर्खतापूर्ण

punjabkesari.in Sunday, Jun 26, 2022 - 05:28 AM (IST)

प्रथम तथा द्वितीय विश्व युद्धों के दौरान सारे अमरीका में एक प्रसिद्ध पोस्टर सामने आया था : इसमें कहा गया था ‘मैं आपको चाहता हूं-अमरीकी सेना के लिए।’ इसमें सिर पर हैट के साथ जो चित्र दिखाया गया था उसे प्यार से अंकल सैम कहा गया। भारत सरकार रक्षाबलों में सैनिकों की नियुक्ति के लिए अपनी नई योजना का प्रचार करने के लिए इसी तरह के पोस्टर के साथ प्रयास कर सकती थी। यद्यपि इसे संभवत: इसमें एक पंक्ति शामिल करने की जरूरत होती-‘दर्जी, धोबी अथवा हज्जाम बनने के लिए।’ 

अग्रिपथ नामक योजना साधारण है, दरअसल बहुत साधारण। तीनों रक्षा बलों में हर वर्ष 46000 सैनिकों की भर्ती की जाएगी। 6 महीनों के लिए उनको प्रशिक्षण दिया जाएगा तथा 42 महीनों के लिए तैनाती की जाएगी। 48 महीनों की समाप्ति पर एक चौथाई को अन्य 11-13 वर्षों के लिए सेवा देने हेतु बरकरार रखा जाएगा तथा बाकी (लगभग 34500) को 11,67,000 के बरतरफी भुगतान के साथ सेवानिवृत्त कर लिया जाएगा। उनके लिए नौकरी, पैंशन, ग्रैच्युटी तथा चिकित्सा एवं अन्य लाभों की कोई गारंटी नहीं होगी।

पहले कार्रवाई, बाद में विचार 
योजना की खामियां स्पष्ट तथा स्वाभाविक हैं। यह स्पष्ट अनुमान है कि इस विचार को ‘शीर्ष’ से थोपा गया। यही वह तरीका है जिससे 2014 से सरकार कार्य कर रही है। इसके उदाहरणों में नोटबंदी, राफेल सौदा, भूमि अधिग्रहण कानून (एल.ए.आर.आर. एक्ट) में संशोधन तथा तीन कृषि कानून शामिल हैं। 

समय-समय पर इसके खिलाफ प्रदर्शन होते रहे, अधिकतर युवाओं द्वारा, जिन्होंने रक्षाबलों में नियमित नौकरी के लिए प्रशिक्षण तथा तैयारी की और महामारी के कारण एक से अधिक बार उन्हें इससे वंचित रखा गया। उनमें से कई संभवत: 21 वर्ष की आयु पार कर चुके होंगे, जो अग्रिपथ के अंतर्गत निर्धारित की गई। प्रदर्शन शुरू होने के एक दिन बाद सरकार ने क्रमवार बदलावों की घोषणा करनी शुरू की और बेशर्मी से बदलावों को ‘पूर्व-नियोजित’ बताया। किसी भी बदलाव ने अग्रिपथ को लेकर मूलभूत आपत्तियों का समाधान नहीं किया : 

पहला, समय। पूरी सीमा पर सुरक्षा स्थिति अत्यंत अनिश्चित है तथा (चीन द्वारा) हमलों व (पाकिस्तान द्वारा) घुसपैठों का कोई अंत नहीं है। कोई भी तब अपनी छत की मुरम्मत कर सकता है जब सूर्य चमक रहा हो, न कि तब जब वर्षा हो रही हो। दूसरा, अग्रिवीरों का प्रशिक्षण उन्नत स्तर का नहीं होगा और उन्हें अग्रिम पंक्तियों में तैनात नहीं किया जा सकेगा। एडमिरल अरुण प्रकाश ने संकेत दिया है कि सामान्य तैनाती में 5-6 वर्षों तक प्रशिक्षण दिया जाता है। इसके अतिरिक्त नौसेना तथा वायुसेना बड़े पैमाने पर तकनीकी रूप से उन्नत बन रही है तथा किसी भी नाविक अथवा वायुसैनिक को 6 महीनों के लिए प्रशिक्षित नहीं किया जा सकता। 

लै. जनरल पी.आर. शंकर, जो आर्टिलरी के महानिदेशक के तौर पर सेवानिवृत्त  हुए, ने एक लेख में आंकड़ों के साथ तर्क दिया है कि जब अग्रिपथ योजना को पूरी तरह से लागू कर दिया जाएगा तो भारत के पास एक ऐसी सेना होगी जिसके सैनिक ब्रह्मोस, पिनाका अथवा वज्र हथियार प्रणाली से निपटने में सक्षम नहीं होंगे और न ही एक गनर तथा 2आई.सी. बनने की। उन्होंने इसे किंडरगार्टन आर्मी का नाम दिया। तीसरा, बहुत से प्रतिष्ठित रक्षा अधिकारियों ने इस ओर संकेत किया है कि एक युद्धक सैनिक को अपनी यूनिट में गर्व महसूस होता है, वह जोखिम उठाने तथा संकट की स्थिति में नेतृत्व कौशल का प्रदर्शन करने में सक्षम होता है। कोई भी मानव स्रोत पाठ्यपुस्तक यह नहीं सिखाती कि ऐसे गुण प्रशिक्षण के 6 महीनों में किसी में भरे जा सकते हैं। इससे अधिक समय तो एक पुलिस कांस्टेबल के प्रशिक्षण में लगता है। 

चौथा, रक्षाबलों, विशेषकर सेना में एक परम्परा तथा लोकाचार होता है। एक सैनिक को आवश्यक तौर पर अपने देश तथा अपने कामरेडों के लिए मरने के लिए तैयार रहना पड़ता है। रैजीमैंटल प्रणाली संभवत: पुरातन है लेकिन इसने भारतीय सेना को विश्व के बेहतरीन लड़ाकू बलों में से एक बनाया है। ड्यूटी के 4 वर्षों के दौरान अग्रिवीर जानते होंगे कि कार्यकाल समाप्त होने पर उनमें 75 प्रतिशत नाखुश पूर्व-सिपाही (पूर्व-सैनिक के दर्जे के बिना) तथा वित्तीय रूप से असुरक्षित होंगे। क्या 4 वर्षों के दौरान ऐसे सैनिकों के बीच कोई कामरेडी अथवा दुश्मनी होगी? आप कैसे आशा कर सकते हैं कि यदि जरूरत पड़ी तो ऐसे सैनिक सर्वोच्च बलिदान देंगे? 

पांचवां, जरा सोचें कि अर्थव्यवस्था की कीमत पर गुणवत्ता, क्षमता तथा प्रभावशीलता को बलिदान करने के क्या परिणाम होंगे। पैंशन का भारी-भरकम बिल वास्तव में एक बड़ी समस्या है लेकिन इस बात का कोई सबूत नहीं है कि इसे लेकर वैकल्पिक माडल्स की समीक्षा की गई। यह दावा कि अग्रिपथ माडल इसराईल में जांचा-परखा है, बचकाना है। इसराईल की जनसंख्या बहुत कम है, व्यावहारिक रूप से कोई बेरोजगारी नहीं तथा युवाओं के लिए सैन्य सेवा आवश्यक है। क्यों अग्रिपथ को एक पायलट योजना के तौर पर लागू नहीं किया गया और तीनों सेवाओं में भर्ती के लिए एक सर्वव्यापक तथा एकमात्र तरीका बनाने से पहले इसका परीक्षण क्यों नहीं किया गया? अब सेना के उप-प्रमुख जनरल राजू ने कहा है कि अग्रिपथ एक ‘पायलट’ योजना है जिसे 4-5 वर्षों के बाद सुधारा जाएगा। 

एक संविदात्मक बल?
सरकार द्वारा प्रस्तुत तथाकथित बदलाव तथा रियायतें इस मूलभूत प्रश्र का उत्तर नहीं देतीं कि क्या पूरी तरह से न प्रशिक्षित, कम प्रोत्साहित तथा अधिकांश संविदात्मक रक्षाबल देश की सुरक्षा पर गंभीर असर नहीं डालेंगे? सेवानिवृत्त अग्रिवीरों के लिए सी.ए.पी.एफ्स, रक्षा संस्थानों तथा सी.पी.एस.यूस में 10 प्रतिशत आरक्षण इसका उत्तर नहीं है। पुनर्वास महानिदेशक के अनुसार, पूर्व सैनिकों के लिए ग्रुप सी पदों में वर्तमान 10-14.5 प्रतिशत  तथा गु्रुप-डी पदों में 20-24.5 प्रतिशत आरक्षण के विपरीत वास्तविक तैनाती प्रतिशत ग्रुप-सी पदों में 1.29 (अथवा कम) और ग्रुप-डी पदों में 2.66 (या कम) थी। 

यदि रक्षा बलों में तैनाती के लिए बदलावों की जरूरत थी, तो इसका एक तरीका यह था कि एक स्थिति पत्र छापा जाता, मुद्दों को सूचीबद्ध किया जाता, वैकल्पिक समाधानों की मांग की जाती, संसद की स्थायी समिति में मुद्दे पर चर्चा होती, संसद में वाद-विवाद होता और कानून अथवा योजना तैयार की जाती। कमजोर अग्रिपथ योजना को आवश्यक तौर पर वापस लिया जाना चाहिए और सरकार को जरूरी तौर पर ड्राइंग बोर्ड्स में लौटना होगा।-पी. चिदम्बरम


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