इंसान को ‘बीमार कर रहा अस्वस्थ पशुधन’

2020-11-28T05:09:27.16

ईश्वर /ब्रह्मांड/प्रकृति का एक कड़ा नियम है : मनुष्य द्वारा उत्पन्न होने वाले सभी कष्टों को मनुष्य को ही सहन करना होगा। क्या इस ग्रह में कोई खुश है? अमीर या गरीब? हिंदू इसे कर्म का नियम कहते हैं। अन्य धर्म इसे संयोग के रूप में खारिज करते हैं। सभी दुखों की जड़ हमारा खाना खाने का तरीका और हमारी सम्पत्ति की चाह है : हमारे कपड़े, कार, मकान, पैसा। ये दोनों पृथ्वी को नष्ट कर रहे हैं। लेकिन इसकी शुरुआत हम जो खाते हैं उससे होती है।

देखें कि दुख का चक्र कैसे निर्मित होता है। हम खाने के लिए जानवर पालते हैं। यह वे जानवर हैं जो जलवायु परिवर्तन कर रहे हैं जो इतना खतरनाक है कि, दुनिया भर में, देश टुकड़ों के लिए लड़ रहे हैं। जलवायु परिवर्तन ने आस्ट्रेलिया में कई महीनों से चल रही जंगल की आग, अफ्रीका और एशिया में टिड्डों के आक्रमणों को जन्म दिया है क्योंकि बारिश के समय और व्यापकता में वृद्धि हुई है-ये तो सिर्फ दो उदाहरण हैं। लेकिन अब एक नया कारक देखा गया है। यह हमेशा से था लेकिन अभी इस पर शोध किया गया है और इसका खुलासा हुआ है।

हम मवेशियों को वास्तव में बुरी तरह से रखते हैं, बंद बाड़ों मेंं, कोई कसरत नहीं, अपने स्वयं के गोबर में खड़े होते हैं, उनके दूध और मांस को बढ़ाने के लिए हार्मोन के इंजैक्शन लगाए जाते हैं, उनके बच्चों को उनके सामने मारा जाता है, वे स्थायी रूप से गर्भधारण किए रहते हैं, खराब भोजन... हमने गायों और भैंसों के लिए जितना संभव हो सके दुष्टता में कोई कसर नहीं छोड़ी है। परिणामस्वरूप वे बीमार हैं। भारत में उनमें से ज्यादातर को मस्टाइटिस, कैंसर, तपेदिक, पैर और मुंह की बीमारी और कई अन्य रोग हैं। जो कोई भी दूध पीता है या उनका मांस खाता है, उसे ये बीमारियां होना निश्चित हैं। लेकिन यह दुनिया के लिए आमतौर पर क्या कर रहा है? वायुमंडल के गर्म होने और जलवायु परिवर्तन के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार तीन गैसें हैं। कार्बन डाईआक्साइड, मीथेन और नाइट्रसआक्साइड। इनमें से मीथेन सबसे घातक है-कार्बन डाईआक्साइड नहीं। यह दुनिया को गर्म करने में कार्बन डाईआक्साइड से 24 गुना अधिक प्रभावी है। 

यह सिर्फ 3 स्रोतों से आती है : कोयला, चावल और मांस के लिए पाले जाने वाले जानवर। भारत, चीन और ब्राजील-मीथेन दुनिया के अंत के लिए हमारा उपहार है। एक गाय प्रतिदिन 600 लीटर मीथेन का उत्सर्जन करती है। सूअर, बकरी, मुर्गी और मांस के लिए पाले जाने वाले हर कोई घास खाने वाले जानवर अलग-अलग मात्रा में करते हैं। यह तब है जब वे स्वस्थ हों। लेकिन दुनिया में ज्यादातर पशुधन बीमार है-बीमार और पीड़ित मुर्गियों से लेकर गायों और भैंसों तक, एक भी स्वस्थ जानवर मिलना दुर्लभ है। अब शोधकत्र्ताआें ने पाया है कि बीमार पशुधन और भी अधिक मीथेन उत्पन्न करते हैं। और उनका अध्ययन एक दुष्चक्र दिखाता है। मीथेन स्थानीय स्तर पर और विश्व स्तर पर वातावरण को गर्म करती है और गर्म तापमान रोगजनकों के प्रसार और दुनिया भर में अस्वस्थ पशुधन की संख्या में वृद्धि करता है। 

संक्षेप में : बीमार गाएं इस ग्रह को बीमार बना रही हैं और एक बीमार ग्रह गायों को और बीमार कर रहा है। इससे निपटने का केवल एक ही तरीका है और वह है पशुधन को काफी हद तक कम करना। यदि आप किसी अन्य फसल को ग्लोबल वाॄमग से बचाना चाहते हैं तो मांस खाना और निर्यात करना बंद कर दें। यदि आप जीवित रहना चाहते हैं, तो गायों और भैंसों को पालना और रखना बंद कर दें। आप हमेशा यह तर्क दे सकते हैं कि मनुष्य पशुआें को रखने के लिए एक बेहतर तरीका खोज लेंगे। लेकिन दूध और मांस का औद्योगीकरण इसके लिए अनुमति नहीं देता है। पशुपालन मंत्रालय के पास भारत में कहीं भी कोई अस्पताल नहीं है, कोई दवा नहीं है, न ही बीमार पशुआें के लिए कोई पशु चिकित्सा सहायता है। लेकिन इसके पास गायों/भैंसों के कृत्रिम गर्भाधान के लिए बड़ी रकम है। इसलिए हमारे मांस/दूध उत्पादक जानवरों की बीमारी को कम करने के लिए कोई योजना नहीं है-केवल उन्हें बड़ी मात्रा में पैदा करने के लिए है। 

एक गाय जिसे बच्चे पैदा करने के लिए साल में एक बार गर्भाधान किया जाता है, वह कमजोर होती जाएगी, कुपोषण वाली, उसकी देखभाल कभी नहीं की जाती है, पूरे दिन बांधे रखा जाता है, गंदे हाथों से दूध निकाला जाता है, कचरे जैसी चीजें खिलाई जाती हैं और उनसे अधिक काम लिया जाता है, यह जानवर कभी भी ठीक होने वाला नहीं है। जब आप बीमार हो जाते हैं तो आपका पेट खराब होने लगता है और आप बड़ी मात्रा में गैस उत्पन्न करते हैं, गाय भी यही करती है। या तो सरकार उनके स्वास्थ्य की रक्षा के लिए एक बेहतर तरीका ढूंढे या हम मवेशियों को पालना रोकें। 

वर्तमान अनुमानों से पता चलता है कि पशुधन आबादी में 2.7 प्रतिशत की सालाना वृद्धि होने जा रही है। यह बढ़ती संख्या एक दशक बाद मीथेन उत्सर्जन में 20 प्रतिशत की वृद्धि कर देगी। लेकिन जब शोधकत्र्ताआें ने एक आम परजीवी गैस्ट्रोइंटैस्टाइनल कीड़े के प्रभाव को इस समीकरण में शामिल किया, तो यह आंकड़ा 82 प्रतिशत जितना अधिक बढ़ गया-प्रत्याशित उत्सर्जन में चार गुना वृद्धि। और यह सिर्फ एक बीमारी है। प्रत्येक रोग मीथेन को बढ़ाएगा। क्या बीमारी का इलाज करने और कम करने, जानवरों के ग्रह पर जानवरों का भार कम करने और इस विनाशकारी जलवायु और बीमारी के चक्र से पशुधन को मुक्त करने के लिए कोई नए तरीके हैं? नहीं, केवल एक ही तरीका है : मांस और डेयरी उत्पाद खाना बंद करें।-मेनका गांधी
 


Pardeep

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