सोशल मीडिया पर सक्रिय ‘लिंच मॉब्स’

2021-09-12T13:47:06.753

संविधान का आर्टिकल 21 गारंटी देता है कि ‘किसी भी व्यक्ति को कानून द्वारा स्थापित प्रक्रियाओं के सिवाय उसके जीवन अथवा निजी स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जा सकता।’ यह प्रक्रिया इस बात पर बल देती है कि प्रत्येक आरोपी को स्वतंत्र तथा निष्पक्ष मुकद्दमे का अधिकार है जिस पर सामाजिक पक्षपात तथा रूढिय़ों का प्रभाव न हो। आपराधिक न्याय का आधार यह है कि जब तक दोषी साबित न हो प्रत्येक व्यक्ति को निर्दोष माना जाए। यह निर्दोषता की प्रक्रिया अदालतों में शुरू से ही चली आ रही थी। जब तक कि सर्वोच्च अदालत ने यह नहीं कहा है कि उपरोक्त कथन आपराधिक तथा नागरिक कानून दोनों का सुनहरा मानदंड बना हुआ है। इसके साथ ही एक नियम है विचाराधीन। यह शब्द लातीनी भाषा के एक शब्द से आया है जिसका अर्थ है ‘निर्णय के अंतर्गत’। जब एक बार कानूनी प्रक्रियाएं सक्रिय हो जाती हैं मामलों को विचाराधीन माना जाता है। जब एक बार व्यक्ति को गिरफ्तार कर लिया जाता है तो आपराधिक प्रक्रियाएं गतिशील हो जाती हैं जिस व्यक्ति पर आरोप लगते हैं उसकी गिरफ्तारी के लिए  सम्मन जारी किए जाते हैं।

 

विचाराधीन का नियम ऐसे में तब तक लागू होता है जब तक आरोपी को सजा अथवा रिहाई नहीं दे दी जाती। कोई भी प्रकाशन, प्रसारण तथा किसी भी ऐसी वस्तु का प्रसार जो विचाराधीन हैं, अदालत की मानहानि का मामला बनता है। एक ऐसा पदार्थ जो जुर्माने अथवा जेल के रूप में दंडनीय है। कुछ विदेशी न्यायाधिकरणों में मीडिया संगठनों के खिलाफ थर्ड पार्टी कॉस्ट आर्डर भी दिए जाते हैं ताकि पक्षपाती रिपोॄटग के परिणामस्वरूप किसी मुकद्दमे में देरी की लागत की भरपाई की जा सके। ये सब यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है कि आरोपी के जीवन अथवा स्वतंत्रता से संबंधित कोई भी निर्णय किन्हीं परिस्थितियों अथवा पक्षपाती रिपोर्टों से प्रभावित न हो। यहां तक कि वैधानिक संस्थाओं में भी काफी हद तक विचाराधीन कानून के लिए सम्मान है।

 

सदस्य किसी भी ऐसे मामले को रैफर नहीं कर सकते जिसका न्यायिक निर्णय लम्बित है। अदालतों के कानून के सामने लम्बित मामलों को लेकर सदनों में चर्चा करने से बचा जाता है ताकि अदालतें बाहर कही गई बातों से बिना प्रभावित हुए कार्य कर सकें। हालांकि ऐसे पवित्र अधिकारों को एक स्वांग बना दिया गया है क्योंकि अपनी वित्तीय बाध्यताओं के चलते प्रिंट, प्रसारण, रेडियो तथा डिजिटल मीडिया अनियंत्रित तथा प्रतिस्पर्धात्मक तांक-झांक में उलझे रहते हैं। वे किसी भी ऐसे असहाय व्यक्ति के खिलाफ अपने खुद के जज, ज्यूरी तथा वकील खड़े कर देते हैं जैसे कि उन्हें पहले से ही उसके दोष का पता हो। एंकर तथा अनपढ़ ऑनलाइन व्यक्तित्व न्यायपालिका की भूमिका निभाते हैं। वे ‘तथ्यों’ की जांच शुरू करते हैं तथा अदालतों द्वारा एक भी सुनवाई करने से पहले ही अपने निर्णय थमा देते हैं।

 

 यह रुझान गत वर्ष तब सर्वाधिक निकृष्ट अभिव्यक्ति में दिखाई दिया जब एक युवा अभिनेता दुर्भाग्य से अप्राकृतिक कारणों से मर गया। इसकी तीव्रता इतनी थी कि मुम्बई हाईकोर्ट की एक खंडपीठ ने एक जनहित याचिका में यह व्यवस्था दी कि ‘मीडिया ट्रायल’  न्याय देने में दखलअंदाजी कर रहा है जिसके परिणामस्वरूप यह कांटैंप्ट ऑफ कोट्र्स एक्ट 1971 के अंतर्गत ‘अदालत की मानहानि’ का मामला बनता है। समस्या केवल मुकद्दमे से पूर्व चरण तक ही सीमित नहीं है। मीडिया जो छवि बनाता है वह अदालतों द्वारा व्यक्ति को रिहा किए जाने के बाद भी बनी रहती है। उमा खुराना नामक एक अध्यापिका, जिस पर गलत संदेह के कारण मीडिया द्वारा धावा बोल दिया गया था कि उसने कथित रूप से छात्राओं को वेश्यावृत्ति में धकेला था, के मामले में उस पर भीड़ द्वारा हमला किया गया। हालांकि बाद में अदालत में यह साबित हो गया कि आरोप गढ़े गए थे और उस महिला को रिहा कर दिया गया। हालांकि एक बार जो सोशल मीडिया पर रुझान बन जाता है उसके तथ्यों के सामने आने या अदालती निर्णयों के बाद भी कम नहीं किया जा सकता।

 

यह कहना असामान्य होगा कि प्रत्येक अदालती निर्णय पूर्ण सत्य है और इसी कारण अपील अदालतों का पिरामिड अस्तित्व में है। ए.के. गोपालन बनाम नोरदीन 1969 मामले में सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी कि किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी के बाद कोई प्रकाशन मानहानि का मामला होगा यदि यह संदिग्ध के विरुद्ध पक्षपाती  होगा। इसी तरह शीर्ष अदालत ने एम.पी. लोहिया बनाम पश्चिम बंगाल राज्य मामले में यह कहा कि बोलने तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कई बार न्याय के प्रशासन के साथ दखलअंदाजी का कारण बन सकती है तथा मीडिया में सामने आने वाले आर्टीकल पक्षपाती हो सकते हैं जिनकी इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्ट्सि सीकरी ने कहा था कि जब कोई मुद्दा उठाया जाता है, याचिका दाखिल की जाती है, इससे पहले कि अदालत उसे अपने हाथ में ले लोग यह चर्चा शुरू कर देते हैं कि इसका परिणाम क्या होना चाहिए। यह नहीं कि परिणाम क्या है? बल्कि क्या होना चाहिए और इसका जजों द्वारा मामले पर निर्णय देने पर असर पड़ता है।      
मनीष तिवारी
manishtewari01@gmail.com


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Content Writer

Seema Sharma

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