तालिबान के साथ बातचीत के लिए भारत अपनी खिड़की खुली रखे

2021-07-24T04:23:30.537

रणनीतिक रूप से अफगानिस्तान एक बार फिर उथल-पुथल की स्थिति में है। तालिबानियों के सैन्य हमलों के आवश्यक अंत के लिए अफगानिस्तान में एक दर्जन से अधिक कूटनीतिक मिशनों द्वारा वार्ता के नवीनतम दौर के बावजूद अफगान बलों तथा आतंकवादी समूहों के बीच लड़ाई जारी है। तालिबानियों ने अफगानिस्तान में काफी जगह पर कब्जा कर लिया है जिसके तहत सैंकड़ों जिलों तथा महत्वपूर्ण सीमा पार करने वाले रास्तों पर कब्जे के साथ-साथ प्रांतीय राजधानियों को घेरे में लेना शामिल है। 

स्वाभाविक तौर पर तालिबानी हमले बातचीत द्वारा समस्या के समाधान के लिए सहयोग करने के उनके दावों के विपरीत हैं। जो भी हो इसका परिणाम निर्दोष अफगानियों के जीवन के रूप में निकल रहा है जिनमें लक्ष्य बनाकर की गई हत्याओं के माध्यम से नागरिकों को विस्थापित करना, लूटमार तथा इमारतों को जलाना शामिल है। इसके साथ ही महत्वपूर्ण आधारभूत ढांचों तथा संचार नैटवर्कों को भी नष्ट किया जा रहा है। अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी ने स्वीकार किया है कि जेहादी लड़ाकों ने कुछ लड़ाइयां जीती हैं लेकिन इस बात पर जोर दिया कि ‘हम युद्ध जीतेंगे।’ हालांकि स्थिति पेचीदा होने के साथ विस्फोटक भी है क्योंकि तालिबानियों ने बड़ी तेजी से भू-क्षेत्रों पर कब्जे किए हैं। 

9/11 के हमलों के बाद अमरीका द्वारा तालिबानी शासन को पलटने के लगभग 20 वर्षों बाद तथा अमरीकानीत विदेशी बलों के लगभग वापस लौटने के करीब आतंकवादियों का अफगानिस्तान के 400 जिलों में से आधे से अधिक पर नियंत्रण है। मध्य तथा दक्षिण एशिया के बीच पहाड़ों से घिरे इस देश में तालिबानी लड़ाकों ने आतंक मचा रखा है। इसकी जनसं या अधिकतर जातीय पश्तूनों, ताजिक तथा उज्बेकियों की है। वास्तव में अफगानिस्तान की कई शताब्दियों से दुखद कहानी है। अफगान गृह युद्ध के दौरान 1994 में तालिबान प्रमुख धड़ों में से एक के रूप में उभरे। इनका देश के लगभग  तीन चौथाई हिस्से पर शासन था। उन्होंने बहुत नृशंस व्यवहार किया तथा अफगानों का नरसंहार किया। 

नागरिकों के सांस्कृतिक जनसंहार के अपने अभियान में उन्होंने हॉबीज पर प्रतिबंध लगा दिया जिनमें पतंग उड़ाना तथा पक्षियों को पालतू के तौर पर रखना शामिल था। उन्होंने टैलीविजन, संगीत तथा सिनेमा पर भी प्रतिबंध लगा दिया और 10 तथा उससे अधिक उम्र की लड़कियों को स्कूल भेजने की मनाही कर दी। उन्होंने बड़ी सं या में स्मारकों को ध्वस्त कर दिया जिनमें बामियान स्थित बुद्ध की 1500 वर्ष पुरानी प्रसिद्ध प्रतिमा भी शामिल थी। उन्होंने शरिया इस्लामिक कानून तथा आतंकी इस्लामवाद के अपने नियम बना लिए। 

शीघ्र ही अफगानिस्तान अंतर्राष्ट्रीय झगड़ों का केंद्र बन गया। सोवियत संघ ने 1979 में इस पर कब्जा किया। इसने इस्लामिक मुजाहिद्दीन बलों को सक्रिय कर दिया जिनको पाकिस्तान तथा पश्चिम का समर्थन प्राप्त था। दरअसल तालिबान औपचारिक रूप से अमरीका-सऊदी-पाकिस्तान समर्थित मुजाहिद्दीन से उभरा है। इसके परिणामस्वरूप 1992 में सोवियत समर्थित अफगानिस्तान के शासन का पतन हो गया। इसके बाद हमें एक और गृहयुद्ध देखने को मिला। यह तालिबान आतंकवाद का एक स्वरूप है। 

यद्यपि पाकिस्तान बार-बार इस बात से इंकार करता रहा है कि वह तालिबान के उभरने के पीछे नहीं है, इस बात में कोई संदेह नहीं कि जो बहुत से मुजाहिद्दीन अफगान आंदोलन में शामिल हुए उन्होंने पाकिस्तान के मदरसों में शिक्षा प्राप्त की। दरअसल सऊदी अरब तथा संयुक्त अरब अमीरात के साथ पाकिस्तान इन तीन देशों में से एक था जिन्होंने तालिबानियों को मान्यता दी थी, जब वे अफगानिस्तान में सत्ता में थे। अफगानिस्तान में अमरीकानीत मिशन के कमांडर जनरल ऑस्टिन मिलर ने जून में चेतावनी दी थी कि देश अराजक गृह युद्ध की ओर बढ़ेगा जिसे उन्होंने पूरी दुनिया के लिए चिंता की बात बताया है। अफसोस की बात यह है कि बड़ी शक्तियों के पास तालिबान से निपटने के बारे में कोई उत्तर नहीं है, सैन्य अथवा राजनीतिक रूप से। 

इतनी ही चिंता का विषय है तालिबान को लेकर भारत की ढीली-ढाली नीतियां। भारत की अफगानिस्तान में बड़ी दावेदारियां हैं, रणनीतिक, राजनीतिक तथा आॢथक, जिसने कई विकास तथा शैक्षणिक परियोजनाओं पर देश में 3 अरब डालर से अधिक खर्च किए। भारत ने अफगानिस्तान के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। रूसी कूटनीतिज्ञ रोमन बाबुश्किन का कहना है कि अब यह नई दिल्ली पर निर्भर करता है कि वह देश में अपनी भागीदारी के स्तर बारे निर्णय ले। रूस तथा भारत दोनों अफगानिस्तान में कई विकास तथा शैक्षणिक परियोजनाओं में सहयोग कर रहे हैं। 

इस पेचीदा व्यवस्था में मोदी सरकार को ‘सिद्धांतों से आगे देखना होगा’। विदेश मंत्री जयशंकर का कहना है कि सबूत इस विचार का बड़ी मजबूती से समर्थन करते हैं कि भारत ने अपने हितों को प्रभावपूर्ण तरीके से यहां आगे बढ़ाया है। उनका कहना है कि अपनी महत्वाकांक्षाएं पूरी करने के लिए जोखिम उठाना अंतनिर्हित है। क्या यही समय है कि अफगानिस्तान में ऐसी महत्वाकांक्षाओं की परीक्षा ली जाए? हां। भारत के पास इस देश के सामने वास्तविक चुनौतियों का समाधान हेतु सब कुछ करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। तालिबान के साथ निपटने के दौरान कड़ी सच्चाइयों को ध्यान में रखना होगा। यह कार्य आसान नहीं है लेकिन अफगानिस्तान में अपने लक्ष्यों तथा उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए नई दिल्ली को जोखिम उठाना होगा। 

क्या भारत को तालिबान के साथ बातचीत के लिए अपनी खिड़की खुली रखनी चाहिए? यह संभवत: भारत की सुरक्षा तथा आॢथक हितों के लिए आवश्यक होगा। भारत को राजनीतिक मोर्चे पर भी काम करना होगा। इसे तालिबान से जुड़े कट्टरपंथी तत्वों पर पाकिस्तान के प्रभाव से भी निपटने बारे सोचना होगा जैसे कि हक्कानी नैटवर्क। अफगानिस्तान की पेचीदा भू-राजनीतिक व्यवस्था के मद्देनजर हमें कश्मीर के हितों को भी ध्यान में रखना होगा।-हरि जयसिंह
 


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Content Writer

Pardeep

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