पुतिन के दौरे से पहले भारत-रूस की कहानी

punjabkesari.in Saturday, Dec 04, 2021 - 05:43 AM (IST)

21वीं  द्विपक्षीय शिखर बैठक के लिए रूस के राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन के 6 दिसम्बर को भारत दौरे पर आने की उम्मीद है। यह बैठक भारत-रूस संबंधों के बारे में बिना सूचना की अटकलों की पृष्ठ भूमि में हो रही है। पुतिन की यात्रा नकारात्मक आख्यानों का मुकाबला करने और भारत-रूस संबंधों की वर्तमान स्थिति और भविष्य के पाठ्यक्रम को प्रदर्शन करने का एक अवसर है। भारत-रूस संबंध शीतयुद्ध के वर्षों के भारत-यू.एस.एस.आर. संबंधों से प्रवाहित होते हैं, जब भारत को इस देश से काफी राजनीतिक, आर्थिक और रक्षा समर्थन प्राप्त था। इस विरासत को स्वीकार करते हुए हमें उन वस्तुनिष्ठ कारकों पर ध्यान देना चाहिए जो संबंधों को वर्तमान प्रासंगिकता प्रदान करते हैं। 

रक्षा सहयोग सांझेदारी का एक महत्वपूर्ण तत्व बना हुआ है। हमारे सशस्त्र बलों के लगभग 60 से 70 प्रतिशत हथियार और उपकरण रूसी मूल के हैं। रूस ने परम्परागत रूप से सैन्य प्रौद्योगिकियों की आपूॢत की है जो अन्य देशों ने नहीं की। अत्याधुनिक वायु रक्षा प्रणाली, एस-400 की आगामी पूॢत इसे प्रदर्शित करती है। पिछले एक दशक में भारत ने अपने हथियार अधिग्रहण स्रोतों में विविधता पाई है। भारत के हथियारों के आयात में फ्रांस, इसराईल और अमरीका की हिस्सेदारी में तेजी से वृद्धि हुई है। फिर भी पिछले 5 वर्षों में हमारे हथियारों का लगभग आधा आयात रूस से हुआ है। हाल के वर्षों में हमारे ऊर्जा सहयोग में वृद्धि हुई है। भारतीय कम्पनियों ने रूस के हाईड्रोकार्बन क्षेत्र में अनुमानित 15 बिलियन अमरीकी डॉलर का भारी निवेश किया है। रूस के सुदूर पूर्व और आर्कटिक क्षेत्र में कथित तौर पर और निवेश को अंतिम रूप दिया जा रहा है। रूस का सबसे बड़ा विदेशी निवेश लगभग 13 बिलियन अमरीकी डॉलर का भारत में मिडस्ट्रेम और डाऊनस्ट्रेम हाइड्रोकार्बन परियोजनाओं में है। 

भारतीय कंपनी गेल (गैस अथॉरिटी ऑफ इंडिया) का एक रूसी कम्पनी के साथ 20 साल तक 25 अरब डालर का एल.एन.जी. आपूर्ति अनुबंध है। भारत में एक बड़ी पैट्रो रसायन परियोजना के लिए भारत-रूस संयुक्त उद्यम की संभावना है। जैसा कि भारत जलवायु परिवर्तन का मुकाबला करने के लिए अपने कार्बन उत्सर्जन पर अंकुश लगाना चाहता है, हमारे स्वच्छ ऊर्जा मिश्रण में परमाणु ऊर्जा का अनुपात अनिवार्य रूप से बढ़ेगा। कोविड-19 ने हमें दिखाया है कि महत्वपूर्ण प्राथमिक या मध्यवर्ती सामग्री के लिए बाहरी निर्भरता हमारी अर्थव्यवस्था में व्यवधान पैदा कर सकती है। दुनिया के लगभग 30 प्रतिशत प्राकृतिक संसाधनों के मेजबान के रूप में, रूस हमारे संसाधनों की सुरक्षा को बढ़ाने के लिए व्यापार और निवेश के अवसर प्रदान करता है। रक्षा और ऊर्जा स्तम्भों को सुदृढ़ करने के लिए एक मजबूत आर्थिक स्तम्भ का वादा अभी भी पूरी तरह से साकार किया जाना बाकी है। 

भारत-चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा पर बिगड़ते गतिरोध के बीच कई भारतीयों ने चीन के साथ रूस की रणनीतिक सांझेदारी को भारत के लिए रूस के समर्थन को संभावित रूप से कमजोर करने के रूप में देखा। अफगानिस्तान में तालिबान के साथ राजनीतिक समाधान के लिए रूस की पहल ने इन संदेहों को मजबूत किया। रूस-पाकिस्तान संबंधों ने नकारात्मक ध्यान आकॢषत किया। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 2020 के मध्य में मास्को का दौरा किया जब भारत-चीन के बीच तनाव बहुत अधिक चल रहा था। रूस ने रक्षा मंत्री को भारत की आवश्यकताओं के अनुसार अनुबंधित रक्षा आपूर्ति की समय सीमा पर डिलीवरी को फास्ट ट्रैकिंग करने का आश्वासन दिया। रूसियों ने चीन के इस सुझाव को नजरअंदाज कर दिया कि भारत-चीन गतिरोध के दौरान इस तरह की आपूर्ति को निलम्बित कर दिया जाना चाहिए। 2019 में जब चीन और पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर की स्थिति और हमारे संविधान के अनुच्छेद 370 पर भारत के फैसलों के विरोध के लिए रूस के समर्थन को कैनवस पर उतारने की कोशिश की तो रूस ने कड़ा रुख अपनाया कि यह भारत के सम्प्रभु आंतरिक निर्णय थे। 

राष्ट्रपति पुतिन और प्रधानमंत्री मोदी, द्विपक्षीय और वैश्विक मुद्दों पर नियमित टैलीफोन सम्पर्क में रहे हैं। विदेश मंत्री जयशंकर ने जुलाई में मास्को में आर्थिक सहयोग के लिए अंतर-सरकारी आयोग सहित उच्चस्तरीय बातचीत की थी। रूसी राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के प्रमुख भारत के एन.एस.ए. अजीत डोभाल के साथ द्विपक्षीय और बहुपक्षीय परामर्श के लिए दो बार दिल्ली में रहे हैं। 6 दिसम्बर को दोनों रक्षा मंत्री रक्षा सहयोग पर अन्तर-सरकारी आयोग की सह-अध्यक्षता करेंगे। यह स्पष्ट है कि हाल के दशकों में भारत-रूस संबंधों का संदर्भ विकसित हुआ है। भारत सैन्य और आर्थिक रूप से मजबूत है। इसके वैश्विक पदचिन्हों में अब अमरीका और यूरोप, पश्चिम एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया और अन्य भौगोलिक क्षेत्रों के प्रमुख देशों के साथ मजबूत भागीदारी शामिल है। 

मोदी-पुतिन संवाद नए पहलुओं को एक साथ खींचेगा और व्यापक रणनीतिक परिदृश्य पर दृष्टिकोणों का आदान-प्रदान करेगा। रूस-चीन संबंध, पाकिस्तान के साथ रूस की व्यस्तता, अफगानिस्तान से नाटो की वापसी का भू-राजनीतिक नतीजा  और भारत-प्रशांत पर भारत के दृष्टिकोण का अनुमान लगाया जा सकता है। इन वर्षों में मोदी-पुतिन दोनों नेताओं के घनिष्ठ व्यक्तिगत संबंध विकसित हुए हैं जिन्होंने विचारों को स्पष्ट और सौहार्दपूर्ण तरीके से सक्षम बनाया है। (लेखक रूस में पूर्व राजदूत और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष थे।)-पी.एस. राघवन


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