यदि हम ‘शांति’ चाहते हैं तो ‘युद्ध’ के लिए तैयार रहें

2020-10-14T02:19:14.647

वायुसेना प्रमुख आर.के.एस. भदौरिया ने पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एल.ए.सी.) पर व्याप्त तनाव की स्थिति का जिक्र करते हुए 29 सितम्बर को दिल्ली में प्रैस वार्ता के दौरान कहा कि देश की उत्तरी सीमा पर न तो शांति है और न ही युद्ध जैसा माहौल है। उन्होंने यह भी कहा कि वायुसेना की ओर से स्थिति पर तेजी से काबू पाया गया है तथा वायुसेना क्षेत्र में किसी भी गलत हरकत का बनता जवाब देने में पूरी तरह सक्षम है। न तो युद्ध और न ही शांति के मायने समझने के लिए मेरी अप्रैल 1983 की याद ताजा हो गई। जब मैं अपनी पलटन, 51 माऊंटेन रैजीमैंट रायवाला से लेकर जम्मू-कश्मीर के अंदर एल.ओ.सी. वाले पुंछ इलाके में पहुंचा तथा करीब साढ़े 3 वर्षों का समय उस क्षेत्र में बिताया। 

आप्रेशन एरिया की जिम्मेदारी के बारे में चार्ज लेते समय हमें उच्च कमांडर ने ‘नो वॉर नो पीस’ वाला संकल्प समझाया तथा साथ ही ‘आप्रेशनल आर्डर’ से संबंधित ‘टॉप सीक्रेट’ के दस्तावेज भी सौंपे गए। स्टैंडिंग आप्रेटिंग प्रोसीजर (एस.ओ.पी.) के अनुसार पहले से तैनात सेना की संख्या में से एक-तिहाई सेना को हर समय मोर्चों पर तैनात होना था। 

तोपखाने की 18 तोपों में से 6 तोपों को 2-2 की संख्या में बांट कर गन पोजीशन में अलग-अलग क्षेत्रों में निर्धारित लक्ष्यों के ऊपर गोला-बारूद तैयार रखा गया। बस केवल आदेश का इंतजार तथा ट्रिगर दबाना बाकी था। चार्ज लेते समय जब मैं 8 सिख पलटन के जिम्मेदारी वाले क्षेत्र सरला, सिम्मी, बाज पिकटों से होते हुए भारत की आखिरी पोस्ट ‘डंडा’ पर पहुंचा जोकि पाकिस्तानी चौकी से करीब 15 गज की दूरी पर थी। उस समय एल.ओ.सी. पर कंटीली तार नहीं लगी हुई थी। 

हमारा नेतृत्व करने वाले पलाटून कमांडर जे.सी.ओ. को पाकिस्तानी सेना के पंजाबी हवलदार ने कुछ ऐसे कहा, ‘‘खबरदार, यदि आगे बढ़े तो हमें फायर करने का आदेश हमारी जेब में है। आपको तो आपकी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से अनुमति लेनी पड़ेगी।’’ खैर, आपबीती की यह कहानी तो लम्बी है। पर अफसोस की बात है कि करीब 4 दशकों  के बाद भी गलवान घाटी में बुजदिल चीनियों के साथ मुठभेड़ करते समय हमारे जवानों के हाथ पीछे की ओर बंधे हुए नजर आए। 

सवाल यह पैदा होता है कि जब 15-16 जून को बिना हथियारों के उच्च कोटि की बहादुरी का प्रदर्शन करते हुए 20 जवान शहादत का जाम पी गए तथा अब जब पेइङ्क्षचग लगातार अपनी नीतियां बदल रहा है तथा दोनों देशों की ओर से भारी गिनती में सेना, वायुसेना, तोपें, टैंक, मिसाइलें, संचार साधन तथा बाकी के इंतजाम सहित एल.ए.सी. पर तैयार रहने के हालात हैं तो फिर क्या यह युद्ध जैसा माहौल नहीं है? पाकिस्तान ने तो जम्मू-कश्मीर में छदम युद्ध छेड़ रखा है तथा मौका मिलने पर चीन भी कम नहीं करेगा। क्या चीन-पाकिस्तान की संयुक्त तैयारी वाले संकेत नहीं मिल रहे? 

बाज वाली नजर
उल्लेखनीय है कि 7 नवम्बर 1959 को चाऊ एन लाई ने भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू को लिखे पत्र तथा देश-विदेशों में जारी किए गए अपने नक्शों के अनुसार मैकमोहन लाइन को नकारते हुए चीन ने पूर्वी सैक्टर में तवांग क्षेत्र सहित सभी नेफा (अब अरुणाचल प्रदेश) पर अपना दावा ठोका। 

पश्चिमी सैक्टर में कराकोरम दर्रे से लेकर संग चिनमो दरिया के क्षेत्रफल को अपना क्षेत्र बताया। भारत ने चीन के एक पक्षीय सुझाव को ठुकरा दिया। पेइचिंग ने फिर भी यह सुझाव दिया कि यदि भारत लद्दाख को चीन को सौंप देगा तो वह अपना दावा अरुणाचल प्रदेश से छोड़ देगा क्योंकि ऐसा नहीं हुआ, बल्कि अब जबकि लद्दाख को भारत का केंद्र शासित प्रदेश घोषित किया जा चुका है इसलिए अब हमलावर जैसा रुख अपनाए हुए है। गत करीब एक वर्ष से पी.एल.ए. ने मिलिट्री एक्सरसाइज के नाम पर तिब्बत की उच्च पर्वतीय वाली समतल भूमि पर तोपें, टैंक, मिसाइल, संचार साधन तथा युद्ध के साजो-सामान सहित 50,000 पैदल सेना से घेराबंदी कर रखी है। इसके अलावा हवाई अड्डे भी सरगर्म हैं। 

चीन की विस्तार वाली राष्ट्रीय नीति तथा उसकी खोटी नीयत को मुख्य रखते हुए कूटनीतिक तथा सैन्य स्तर पर जारी बैठकों का दौर उस समय तक अर्थहीन रहेगा जब तक कि वह एल.ए.सी. से संबंधित प्रमाणित नक्शों तथा पुरातन दस्तावेज सहित सीमा की तहबंदी के लिए राजी नहीं हो जाता। मेरा यह भी निजी तौर पर मानना है कि चीन पहले म्यांमार, नेपाल, भूटान, बंगलादेश, श्रीलंका और मालदीव जैसे देशों को साथ जोड़ कर जब कभी भी युद्ध लड़ेगा तो वह पाकिस्तान के साथ संयुक्त रूप से केवल 3488 कि.मी. की एल.ए.सी.  तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि ङ्क्षहद महासागर तक फैलेगा। यदि हम शांति चाहते हैं तो हमें युद्ध के लिए भी तैयार रहना जरूरी है।-ब्रिगे. कुलदीप सिंह काहलों (रिटा.)
 


Pardeep

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