आई.ए.एस. व आई.पी.एस. में सेवा के साथ जनसेवा

punjabkesari.in Friday, Aug 05, 2022 - 03:57 AM (IST)

आई.ए.एस. तथा आई.पी.एस. में सेवा कर रहे कितने अधिकारी लोगों की सेवा करने के लिए निष्ठावान हैं? लोगों का कहना है कि ऐसे लोगों की संख्या कुछेक है। वास्तव में कुछ की बजाय बहुत से ऐसे हैं, पुलिस के मुकाबले आई.ए.एस. में अधिक। मुझे अत्यंत खुशी है कि अनिल स्वरूप मेरे मित्र हैं। यू.पी. काडर के एक आई.ए.एस. अधिकारी, जिन्होंने विभिन्न सरकारों के अंतर्गत अपनी क्षमता के अनुसार लोगों की निरंतर सेवा की है। सरकारी सेवा से रिटायर होने से पूर्व उन्होंने सचिव स्कूली शिक्षा के तौर पर शिक्षा क्षेत्र में सेवाएं देते हुए अपनी एक अमिट छाप छोड़ी है। 

उन्होंने सभी सिविल सोसाइटी संगठनों की राज्य के शत्रुओं के तौर पर आलोचना नहीं की, जैसे कि मेरे पूर्व आई.पी.एस. सहयोगी, एन.एस.ए. अजीत डोभाल करते दिखाई देते हैं। यहां तक कि सेवानिवृत्त होने के बाद भी अनिल ने लोगों की सेवा में अपनी रुचि जारी रखी है। उन्होंने यह अपने द्वारा शुरू ‘नैक्सस फॉर गॉड’ नामक आंदोलन के माध्यम से किया जिसकी शुरूआत उनके मूल राज्य उत्तर प्रदेश से हुई और अब यह हरियाणा, उत्तराखंड तथा राजस्थान जैसे कुछ पड़ोसी राज्यों तक भी फैल गया है। ‘नैक्सस फॉर गॉड’ विलक्षण विचारों को आमंत्रित करता है तथा उन्हें अन्य राज्यों में या कुछ एन.जी.ओ. के माध्यम से लागू करता है जो सफल रहे हैं। 

अनिल को इसका विचार तब आया जब वह भारत सरकार में सचिव स्कूल शिक्षा थे। उस हैसियत से उन्होंने भारत के हर हिस्से का भ्रमण किया तथा जमीनी स्तर पर परियोजनाओं की उन्हें जानकारी प्राप्त हुई। उन्होंने ऐसी कई परियोजनाओं को अपनाया और राज्य सरकारों को इन परियोजनाओं का प्रचार करने के लिए तैयार किया। अपने एक दौरे के दौरान वह मुम्बई आए तथा मुक्तांगन नामक एक सिविल सोसाइटी एन.जी.ओ. द्वारा संचालित एक म्यूनिसिपल स्कूल में पहुंचे, जिसके बोर्ड में मैं भी रहा हूं।

मुक्तांगन की शुरूआत मेरे मित्र सुनील मेहता द्वारा की गई थी जो एक परोपकारी गुजराती मिल मालिक थे। उनका परिवार वर्ली के नजदीक पैरागोन मिल्स का मालिक था। जहां लगभग सभी मिल मालिकों ने 1980 के दशक में दत्ता सामंत की हड़ताल के बाद अपनी दुकानदारी बंद कर दी तथा जमीनें बेच दीं जिससे उन्हें अपना बाकी जीवन चलाने के लिए पर्याप्त मुआवजा मिल गया, सुनील ने मुक्तांगन की स्थापना की जिसका संचालन उनकी पत्नी एलिजाबेथ (लिज) करती हैं जिन्हें अध्यापन में विशेषज्ञता तथा रुचि है। 

लिज एक अंग्रेज महिला हैं जो मेरे मित्र, जो पढ़ाई के लिए इंगलैंड में थे, से मिलने तथा उससे शादी करने से पूर्व एक अध्यापिका थीं। लिज ने कुछ वर्षों के लिए एक शिक्षाविद् के तौर पर आगाखान ट्रस्ट के लिए काम किया है। उनकी विशेषज्ञता उपलब्ध थी तथा सुनील ने एक तीर से कई शिकार करने का फैसला किया-परोपकार के लिए अपने उत्साह को शामिल और जरूरतमंदों के लिए कार्य किया। 

इस तरह से मुक्तांगन का जन्म हुआ। काफी आलोचना के घेरे में रहे म्यूनिसिपल स्कूल, जो भाग्य से मिल्स कार्यालय के काफी नजदीक था, को अपनाने के लिए चुना गया तथा भाग्यवश इसके लिए निगम अधिकारियों ने भी पहलकदमी की। इस प्रयोग ने इतनी सफलता प्राप्त की कि मुम्बई के स्कूल इतिहास में पहली बार एक म्यूनिसिपल स्कूल अचीवर्स  की सूची में शामिल हुआ। इस तथ्य ने बी.एम.सी. के कमिश्रर तथा राज्य के शिक्षा सचिव का ध्यान आकॢषत किया। दोनों स्कूल पहुंचे तथा सिस्टम का अध्ययन किया। 

मेहता दम्पत्ति का मुख्य उद्देश्य अध्यापन स्टाफ में एक नया दृष्टिकोण जगाना था जैसा कि लिज ने सुझाव दिया था, जहां बच्चों को रट्टा लगाकर पढऩे की बजाय सोचवान बनाने पर जोर दिया जाता है। अध्यापक उसी क्षेत्र से लिए जाते हैं जहां से विद्यार्थी आते हैं। उनका चुनाव तथा प्रशिक्षण खुद लिज द्वारा किया जाता है। कुछ ने और भी आगे पढ़ाई जारी रखी और  बी.एड पूर्ण की। अधिक से अधिक स्थानीय समुदायों ने मांग उठाई कि मुक्तांगन उनके म्यूनिसिपल स्कूलों को भी अपने अंतर्गत कर ले। वर्तमान में इस एन.जी.ओ. के पास 7 स्कूल हैं। इसने और अधिक स्कूलों को अपनाने से इंकार किया है लेकिन अपनी विचारधारा के आधार पर अध्यापकों  को प्रशिक्षित करने पर सहमति जताई है। 

सिविल सोसाइटी के कई अन्य लोग हैं जिन्होंने शिक्षा के अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों में हाथ आजमाया और सफल रहे। जरूरत है उनके काम को पहचानने तथा उसका अनुसरण करने की। अनिल स्वरूप जैसे अधिकारियों से सीखने की जरूरत है। इससे प्रत्येक हित धारक को लाभ हासिल होता है। कोविड लॉकडाऊन के दौरान आई कठिनाइयों का समाधान करने के लिए हमारे प्रधानमंत्री को मिले अधिकांश श्रेय का कारण सिविल सोसाइटी के लोगों द्वारा अनसुने तथा नि:स्वार्थ कार्य हैं जिन्होंने जरूरतमंदों को पका हुआ भोजन अथवा शुष्क राशन उपलब्ध करवाया है, विशेषकर फंसे हुए प्रवासियों को। अपने शहर मुम्बई में मैं कई नागरिकों को जानता हूं जो इसमें शामिल थे। इनमें मेरी अपनी  बेटी भी एक थी। 

प्रत्येक राज्य में अनिल जैसे कई अधिकारी हैं। वे कोई पुरस्कार अथवा पहचान नहीं चाहते लेकिन लोग उन्हें कभी नहीं भूलेंगे। आई.पी.एस. के मुकाबले आई.ए.एस. में भलाई करने की गुंजाइश अधिक है। मगर मेरे कितने पूर्व सहयोगियों ने उन लोगों के साथ न्याय किया है जिनकी सेवा करने की उनसे आशा की जाती थी? यदि उनमें मेरे मित्र अनिल स्वरूप की तरह ही जनसेवा करने की भावना हो तो लोग निश्चित तौर पर ध्यान देंगे। आप लोगों की आंखों में धूल नहीं झोंक सकते। बेशक वे एक शब्द भी नहीं बोले, उन पर ध्यान जाएगा। यहां तक कि जनता से अधिक पुलिस में उनके कनिष्ठ उन पर गौर करेंगे। और चूंकि वे स्थानीय समुदायों से होते हैं वे अच्छाई को बड़ी तेजी से फैलाते हैं। 

मैंने अनिल स्वरूप के बारे में इसलिए लिखा क्योंकि मैं उनकी पुस्तक ‘नो मोर ए सिविल सर्वैंट’ पढ़ रहा था। वह लिखते हैं कि यदि उनसे यह पूछा जाए कि वह कौन-सा व्यवसाय दोबारा चुनना चाहेंगे तो वे बेहिचक आई.ए.एस. कहेंगे। कोई भी अधिकारी, जिसे अपने अच्छे कार्य से संतुष्टि प्राप्त होती है वह वही दोहराएगा जो अनिल ने कहा है।-जूलियो रिबैरो (पूर्व डी.जी.पी. पंजाब व पूर्व आई.पी.एस. अधिकारी)
 


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