ऐतिहासिक किसान संसद ने अपनी सार्थकता साबित की

08/04/2021 6:11:36 AM

जब संसद के बाहर खड़े होकर देश का कृषि मंत्री सामने सड़क पर चल रही किसान संसद पर टिप्पणी करने को मजबूर हो, उसे ‘निरर्थक’  बताए तो इसे किसान संसद की सार्थकता का प्रमाणपत्र मानना चाहिए। जब सत्ता का अहंकार और कुर्सी हिलने का डर मिल जाता है तो इसी तरह की बौखलाहट सामने आती है। जो लोग यह कहते हैं कि एक समानांतर संसद चलाना संविधान प्रदत्त संस्था का अपमान है, वे पिछले कई दशकों से देश में चल रही जन संसद की परिपाटी से परिचित नहीं हैं। जो लोग देश के स्वतंत्रता आंदोलन से अछूते रहे हैं, उनसे आजादी के बाद के आंदोलनों की समझ की क्या उम्मीद जाए? 

22 जुलाई से प्रतिदिन जब संसद का अधिवेशन होता है तो संसद के बाहर देश के कोने-कोने से आए 200 किसान अपनी ‘किसान संसद’ में भाग लेते हैं। संसद में हर रोज शोर-शराबा होता है, किसान संसद में शांतिपूर्ण कार्रवाई होती है। संसद में किसानों को गाली दी जाती है लेकिन किसान संसद गाली का जवाब गाली से नहीं देती। संसद में कागज फाड़े जाते हैं, किसान संसद में सिर्फ तर्कों की चीर-फाड़ होती है। संसद की शान-ओ-शौकत और सुरक्षा पर करोड़ों रुपए फूंक कर अब तक इस सत्र में लोकसभा में केवल 18 घंटे काम हुआ है। उधर सड़क पर चल रही किसान संसद ने बिना ताम-झाम के उन्हीं दिनों में 37 घंटे कार्रवाई पूरी कर ली है। 

पुलिस और मीडिया ने किसानों की उपस्थिति से हिंसा की जो आशंका जताई थी, उसका जवाब किसानों ने अपने अनुशासन और शांतिप्रियता से दिया है। इस आंदोलन को सिर्फ पंजाब और हरियाणा तक सीमित बताने वाले लोगों को देश के कोने-कोने से भाग ले रहे किसान प्रतिनिधियों ने जवाब दे दिया है। अक्सर मर्दों के इर्द-गिर्द घूमने वाले किसान आंदोलन में महिला किसानों ने अपनी अलग आवाज दर्ज की है। 

अपनी उपस्थिति से किसानों ने सड़क से दूर चल रही संसद पर भी असर डाला है। किसान संसद के आयोजन से पहले संयुक्त किसान मोर्चा ने सभी सांसदों के नाम एक व्हिप जारी किया था। अब तक सांसदों और विधायकों को व्हिप रूपी आदेश देने का काम पाॢटयां और उसके नेता ही करते थे लेकिन लोकतंत्र के इतिहास में पहली बार अपने प्रतिनिधियों को चुनने वाली जनता ने सीधा उन्हें आदेश दिया कि संसद के इस सत्र में सिर्फ किसानों के मुद्दे पर चर्चा हो, किसान आंदोलन की मांगों का समर्थन हो, किसान विरोधी कानूनों को रद्द किया जाए। 

किसान संसद ने कम से कम विपक्षी सांसदों को किसानों के मुद्दे उठाने पर मजबूर तो किया। इसने राहुल गांधी को ट्रैक्टर चलाना सिखा दिया, कांग्रेसी सांसदों को हवालात का चक्कर लगवा दिया और बाकी सभी विपक्षी सांसदों को लगातार किसानों के मुद्दे उठाते रहने का तरीका सिखा दिया। राम मनोहर लोहिया कहते थे कि जब सड़कें सूनी हो जाती हैं तो संसद आवारा हो जाती है। सड़क के सूनेपन को भर कर किसानों ने संसद को जुबान दे दी है। 

किसान संसद की सार्थकता का सबसे बड़ा प्रमाण इस संसद की कार्रवाई और इसके प्रस्ताव हैं। पिछले 8 महीनों से सरकार बड़ी मासूमियत से पूछ रही थी कि किसानों को इन कानूनों में क्या काला नजर आता है। विज्ञान भवन में वार्ता के 11 दौर में किसान प्रतिनिधिमंडल ने बार-बार अपनी आपत्तियां विस्तार से दर्ज करवाई थीं। फिर भी सरकारी और दरबारी पक्ष किसानों से यह सवाल बार-बार पूछता था। किसान संसद ने इस सवाल पर रही-सही कसर भी पूरी कर दी।

तीनों कानूनों पर दो-दो दिन लंबी बहस के बाद किसान संसद ने विस्तृत और तर्कपूर्ण प्रस्ताव के जरिए इन तीनों कानूनों को रद्द किया। किसान संसद ने ए.पी.एम.सी. मंडी वाले कानून पर 10, अनिवार्य वस्तु संशोधन कानून पर 11 और कॉन्ट्रैक्ट खेती वाले कानून पर 20 आपत्तियां दर्ज कीं। जिस सरकार को पिछले 8 महीनों में किसानों की एक आपत्ति भी सुनाई नहीं देती थी, उसके पास अब 41 आपत्तियां दर्ज हो चुकी हैं। 

तीन किसान विरोधी कानूनों को खारिज करने के साथ-साथ किसान यह मांग कर रहे हैं कि स्वामीनाथन कमीशन द्वारा संपूर्ण लागत का डेढ़ गुणा दाम सुनिश्चित करने की सिफारिश को अब लागू किया जाए। किसान सभी फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद की गारंटी देने वाले कानून की मांग करते हुए उसके प्रस्ताव पर चर्चा कर रहे हैं। इस संसद ने एक बात साफ कर दी है, अब किसान संसदीय कार्रवाई और कानूनी दांवपेच की भाषा भी समझने लगे हैं। इस ऐतिहासिक किसान संसद ने तो अपनी सार्थकता साबित कर दी है। अब किसान सड़क के दूसरे छोर पर स्थित लोकसभा और राज्यसभा से पूछ रहे हैं : यह कैसी संसद है, जिसमें करोड़ों अन्नदाताओं की फसलों और नस्लों पर चर्चा के लिए जगह नहीं है? ऐसी संसद के इस मानसून सत्र को निरर्थक क्यों न माना जाए?-योगेन्द्र यादव
 


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Content Writer

Pardeep

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