नागालैंड को लेकर सरकार दुविधा की स्थिति में

punjabkesari.in Friday, Dec 17, 2021 - 04:57 AM (IST)

भारतीय पुलिस सेवा से मेरे कई पूर्व सहयोगी और यहां तक कि कुछ सेवारत अधिकारी यह तर्क दे सकते हैं (और यह वाजिब भी है) कि मुझे ऐसी चीजों पर टिप्पणी करने का कोई अधिकार नहीं है जिन्हें मैंने खुद अनुभव नहीं किया। मैं स्वीकार करता हूं कि मैंने निजी तौर पर कभी भी उत्तर-पूर्व में सेवाएं नहीं दी हैं। 70 के दशक में सी.आर.पी.एफ. में डी.आई.जी.पी.  के तौर पर 8 में से 3 बटालियन, जो मेरी निगरानी में थीं, को उस क्षेत्र में तैनात किया गया था-एक मिजोरम में, अन्य त्रिपुरा में तथा तीसरी सिक्किम में। मगर वह मात्र प्रतिनिधिक अनुभव था। 

मेरे करीबी मित्र, आई.पी.एस. के मध्य प्रदेश काडर के चमन लाल जो 90 के दशक में नागालैंड में डी.जी.पी. थे, उनसे मेरा रास्ता उस वक्त टकराया जब मैं खालिस्तान आंदोलन के चरम के दौरान पंजाब पुलिस का नेतृत्व कर रहा था। जैसा कि मैं जानता हूं कि चमन जिस जगह भी रहे वहां के लोगों की संवेदनाओं के प्रति हमेशा जागरूक रहे। उन्होंने जो भी कार्रवाई की तथा निर्णय लिया वह हमेशा लोगों की सेवा से प्रेरित रहा। चमन को नागालैंड में 1994 या 95 में लगभग ऐसी ही एक घटना याद थी जिसमें राष्ट्रीय राइफल्स की एक यूनिट तथा निर्दोष नागरिक शामिल थे। नागालैंड के डी.जी.पी. के तौर पर चमन ने उस कार्रवाई में इस्तेमाल अत्यधिक बल के खिलाफ बहुत कड़ा रुख अपनाया तथा स्थानीय लोगों की एक उच्च स्तरीय स्वतंत्र जांच की मांग का समर्थन किया। 

सेना देश के दुष्ट बने अपने ही नागरिकों से निपटने के लिए प्रशिक्षित नहीं है। इसे शत्रुतापूर्ण दुश्मनों से निपटने के लिए प्रशिक्षित किया गया है। यह मार डालने के लिए प्रशिक्षित हैं। सेना से किन्हीं परिस्थितियों में अपने हथियारों का इस्तेमाल न करने की आशा करना मूल रूप से न्यायोचित नहीं है। मेरा हमेशा से यह मानना है कि आंतरिक संघर्षों से लडऩे के दौरान देश के भीतर सेना का इस्तेमाल एक ऐसा रास्ता है जिससे गंभीरतापूर्वक बचा जाना चाहिए।

इसका एक आदर्श समाधान यह है कि स्थानीय राज्य पुलिस का विस्तार किया जाए तथा कांस्टेबुलरी के राज्य में ही विकसित यूनिट का इस्तेमाल किया जाए जिन्हें विद्रोह की स्थितियों में इस तरह के अनुभवों से लडऩे के लिए सशस्त्र तथा प्रशिक्षित किया जाए। आदेशों के प्रति वफादारी तथा आज्ञाकारिता सुनिश्चित करने के लिए एक अच्छा नेतृत्व आवश्यक है। मगर हमारे सैनिकों तथा अद्र्धसैनिक बलों द्वारा जिस तरह की भावना का प्रदर्शन किया जा रहा है उससे ऐसा लगता है कि हमारी पहाड़ी जनजातियां हम में से एक नहीं, बल्कि ‘एलियन’ अथवा ‘कोई अन्य’ हैं। 

अब अपने मित्र चमन की ओर लौटता हूं जिसका पक्का विचार था कि अफस्पा नागालैंड से हटा लिया जाना चाहिए और फिर उसके बाद सारे उत्तर-पूर्व से। यह कानून देश के अशांत क्षेत्रों में लागू किया गया था जहां सशस्त्र विद्रोही अथवा माओवादी या सशस्त्र आतंकवादी राज्य के खिलाफ कार्रवाइयां कर रहे थे। कानून के साथ संभावित उलझाव के खिलाफ कानूनी सुरक्षा पर जोर देने का सेना का तर्क निरपवाद था। इसका तर्क था, जो सही भी था, कि इसके अधिकारियों तथा लोगों को पुलिस की तरह प्रशिक्षण तथा कानूनी बारीकियों की जानकारी नहीं दी जाती। उन्हें लड़ाई में उन्हीं की तरह जानलेवा हथियारों के साथ लैस लोगों के सामने खड़ा कर दिया जाता है। यदि वे कोई वास्तविक गलती करते हैं तो उन्हें हत्या के मुकद्दमे की दौड़-भाग से बचाए जाने की जरूरत है, जैसा युद्ध के समय के दौरान नहीं होता। 

चमन, जिन्होंने नागालैंड में जीवन का अनुभव किया है, उनका मानना है कि इस तरह का ‘लाइसैंस टू किल’ खुलेआम नहीं दिया जा सकता। उनका कहना है कि अफस्पा में भी प्रताड़ना से बचने के लिए बचाव के बिंदू सूचीबद्ध हैं। इन्हें आप्रेशनल कमांडरों द्वारा सहजता से ही नजरअंदाज कर दिया जाता है, जो यह समझते हैं कि कानून तथा उनके वरिष्ठ अधिकारी न केवल किसी भी तरह के उल्लंघन को माफ कर देंगे बल्कि उनकी तरक्की में भी योगदान डालेंगे। 

उदाहरण के लिए, उन्होंने प्रश्र किया कि मौन मामले में ‘पिन प्वाइंट’ खुफिया जानकारियों को वैरीफाई क्यों नहीं किया गया। यदि इसके लिए समय नहीं था तो वाहन को घेर कर यात्रियों को अपने हाथ ऊपर उठा कर उतरने तथा अपनी पहचान की पुष्टि करने के लिए क्यों नहीं कहा गया? इन परिस्थितियों में यह एक समझदारीपूर्ण कार्रवाई होती, मगर इसकी बजाय ऐसा लगता है कि इसका उद्देश्य छापामार हमले तथा असम राइफल्स के कमांडैंट उनकी पत्नी तथा युवा बेटे की जघन्य हत्या का बदला लेना था। 

सरकार एक दुविधा की स्थिति में है। इसे नागालैंड और यहां तक कि उत्तर-पूर्व के अन्य क्षेत्रों से अफस्पा वापस लेने की मांग के सामने झुकना पड़ सकता है। यदि यह ऐसा नहीं करती तो इसे नागा, मिजो तथा मेघालय के राजनीतिक दलों का समर्थन खोने का जोखिम है जो अब भाजपा के साथ गठजोड़ में हैं। इससे भी खराब बात यह कि गत दो दशकों से यहां व्याप्त नाजुक शांति के फिर भंग होने का एक और भी बड़ा खतरा है। यह विनाशकारी होगा।-जूलियो रिबैरो (पूर्व डी.जी.पी. पंजाब व पूर्व आई.पी.एस. अधिकारी)


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