कांग्रेस के लिए खुद को पुन:परिभाषित करने का अच्छा अवसर

7/15/2019 3:06:40 AM

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपना पद छोड़ दिया है और पार्टी अगले सप्ताह अपना नया नेता चुनेगी। इससे एक नेतृत्व शून्य पैदा हो गया है और गोवा तथा कर्नाटक जैसे राज्यों में जो हम देख रहे हैं, वह इसी शून्य का परिणाम है। नए नेता द्वारा पदभार सम्भालने के बाद इनमें से कुछ में मामला सुलझ जाएगा हालांकि अन्य समस्याएं बनी रहेंगी और अगले पार्टी अध्यक्ष के सामने कई वर्षों तक चुनौतियां होंगी। 

वर्तमान में यह स्पष्ट नहीं है कि नया नेता कैसे चुना जाएगा। पार्टी सूत्रों के हवाले से रिपोट्स बताती हैं कि वरिष्ठ पार्टी नेताओं तथा कांग्रेस मुख्यमंत्रियों ने सहयोगियों से बंद लिफाफों में नाम देने को कहा है। अन्य वरिष्ठ नेताओं के बाद सलाह करने के बाद ‘अत्यंत लोकप्रिय नामों को’ शार्टलिस्ट किया जाएगा और फिर उन्हें कांग्रेस कार्य समिति तक पहुंचाया जाएगा। ऐसा लगता है कि यह इकाई तब इसका अध्यक्ष चुनेगी। कांग्रेस कार्य समिति में 4 महिलाओं (सोनिया गांधी, प्रियंका गांधी, कुमारी शैलजा तथा अम्बिका सोनी) सहित 24 सदस्य हैं। 20 पुरुषों में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, अहमद पटेल तथा पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया, ओमान चांडी तथा तरुण गोगोई शामिल हैं। 

पार्टी के लिए अच्छी खबर
एक तरह से नया नेता चुनना पार्टी के लिए अच्छी खबर है क्योंकि वह इसे 2019 की पराजय से दूर ले जाएगा और पार्टी खुद को इस आरोप से बचा लेगी कि इस पर एक ही परिवार का अधिकार है। दूसरी ओर कांग्रेस के पास उस तरीके को पुन:परिभाषित करने का एक अवसर भी है, जिससे भारत में राजनीतिक दल संचालित किए जाते हैं। यह देखने के लिए कि इसका क्या अर्थ है, हम अन्य लोकतांत्रिक प्रणालियों की समीक्षा करेंगे, जिन पर हमारी प्रणाली आधारित है।

कंजर्वेटिव पार्टी ब्रिटेन में सत्ताधारी दल है। इसकी प्रधानमंत्री ने पद छोड़ दिया क्योंकि वह यूरोपियन संघ से देश के बाहर निकलने का कोई रास्ता सुझाने में असफल रहीं। हालांकि कंजर्वेटिव सरकार बनी रही और पार्टी अपना नेता चुनेगी जो स्वत: अगला प्रधानमंत्री बनेगा। यह स्थानीय वोटों की एक शृंखला के माध्यम से किया जा रहा है जहां पार्टी सदस्य मतदान करते हैं। गृह तथा विदेशी मामलों के मंत्रियों, लंदन के पूर्व मेयर तथा पर्यावरण एवं ग्रामीण मामलों के मंत्री सहित कई उम्मीदवारों ने चुनाव लडऩे का फैसला किया। लगभग 10 लोगों की सूची को सांसदों द्वारा प्रथम तथा द्वितीय पसंद के माध्यम से छोटा करके अंतिम दो उम्मीदवारों तक लाया गया। अंतिम दो उम्मीदवार, बोरिस जॉनसन तथा जेरेमी हंट अब लगभग 1.2 लाख कंजर्वेटिव पार्टी सदस्यों को लुभाने के लिए देश भर में प्रचार कर रहे हैं, जो अंतत: ब्रिटेन के अगले प्रधानमंत्री बारे निर्णय करेंगे। 

अमरीका में डैमोक्रेट्स विपक्ष में हैं। डोनाल्ड ट्रम्प का पहला कार्यकाल अगले वर्ष समाप्त होगा और डैमोक्रेट्स को यह निर्णय लेना होगा कि कौन उनके खिलाफ चुनाव लड़ेगा। अभी तक 25 डैमोक्रेट्स ने विदाई के लिए कदम आगे बढ़ाया है। इनमें पूर्व उपराष्ट्रपति जो बिडेन, भारतीय मूल की दो महिलाएं तुलसी गोबार्ड व कमला हैरिस, एक छोटे नगर का मेयर, न्यूयार्क का मेयर तथा कुछ पदेन सीनेटर शामिल हैं। वे व्यक्तिगत तौर पर एक दल को धन उपलब्ध करवाने, यात्रा के लिए कोष जुटाएंगे और विज्ञापन के माध्यम से पार्टी सदस्यों से अपील करेंगे जो पार्टी चुनाव में उनके लिए मतदान करेंगे। प्रत्येक राज्य में पंजीकृत डैमोक्रेट्स को यह कहने का अवसर मिलेगा कि राष्ट्रपति ट्रम्प के खिलाफ वे किसे अधिमान देते हैं। 

प्रक्रिया अगले वर्ष के शुरू में 3 फरवरी को पहले राज्य (लोवा) में डैमोक्रेट्स द्वारा मतदान के साथ प्रारम्भ होगी तथा अन्य राज्यों में मतदान जून तक जारी रहेगा। इससे उम्मीदवारों को देश भर में यात्रा करने और अपनी नीतियों व विभिन्न मुद्दों पर अपनी स्थिति को समझाने का अवसर मिलेगा। अमरीका में लगभग 12 करोड़ मतदाता हैं, जिनमें से 4.5 करोड़ पंजीकृत डैमोक्रेट्स तथा 3.2 करोड़ पंजीकृत रिपब्लिकन्स हैं, अन्य निर्दलीय हैं। अत: ब्रिटेन के मुकाबले अमरीका के चुनावों में प्रतिभागिता तथा उम्मीदवारों को चुनने का स्तर काफी ऊंचा होता है लेकिन हमें यह स्वीकार करना होगा कि दोनों देशों में प्रक्रिया खुली तथा लोकतांत्रिक है। 

आंतरिक लोकतंत्र नहीं
भारत में ब्रिटेन तथा अमरीका की तरह पाॢटयों के भीतर लोकतांत्रिक राजनीतिक प्रणाली नहीं है। मुद्दों में से एक है परिवार संचालित पाॢटयां, जो सभी राज्यों में हैं। कोई भी ऐसी पार्टी नहीं है जिसमें भाई-भतीजावाद नहीं हो लेकिन यह केवल एक मुद्दा है और मेरी राय में यह कोई बड़ा मुद्दा नहीं है। बड़ा मुद्दा आंतरिक लोकतंत्र का न होना है। जैसा कि ब्रिटिश तथा अमरीकी पार्टियों में है। ऐसा नहीं है कि वहां उन राज्यों में परिवारों का संबंध नहीं है और कैनेडी व क्ंिलटन्स इसका सबूत हैं। मगर वे एक ऐसी प्रणाली में कार्य करते हैं, जहां उन्हें आवश्यक तौर पर पार्टी द्वारा वोट के माध्यम से चुना जाना है। 

भारत में लोकसभा चुनावों के लिए टिकट बिना किसी वोटिंग प्रक्रिया के दे दिए जाते हैं जैसे कि अमरीकी प्राइमरीज अथवा यू.के. हासिंग्स। यही मामला विधानसभा तथा निगम चुनावों का है। किसी पार्टी द्वारा राज्यसभा के लिए टिकट देने में कोई पारदर्शिता नहीं है। निश्चित तौर पर इसमें कोई लोकतांत्रिक प्रक्रिया शामिल नहीं है और पार्टी नेता जिसे चाहे टिकट दे सकते हैं, पार्टी अथवा जनता को स्पष्टीकरण दिए बगैर कि क्यों किसी व्यक्ति पर अनुग्रह किया गया। यहां प्रतिभा को नहीं देखा जाता या कम से कम ऐसा कुछ नहीं है, जो दिखाई देता अथवा पारदर्शी हो। कांग्रेस के पास इसे बदलने के लिए दो अवसर हैं। पहला वह तरीका जिससे यह अपना नेता चुनेगी और फिर नया नेता कैसे पार्टी की कारगुजारी के लिए काम करता है।-आकार पटेल