पंजाब में चुनावी नतीजे अप्रत्याशित हो सकते हैं

2021-10-11T04:33:09.027

कम्प्यूटर में जैसे रीबूट का बटन दबाते ही सब कुछ बंद हो जाता है और फिर सब नए सिरे से शुरू होता है, ठीक उसी तरह कांग्रेस ने चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाकर पंजाब की राजनीति को रीबूट कर दिया है। यह रीबूट का बटन ऐसा था, जिसने सारे राजनीतिक समीकरण बदल दिए। यहां एक उदाहरण महत्वपूर्ण है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में 1995-96 में जब मायावती को मुख्यमंत्री बनाया गया था तो वह पूरे दलित समुदाय के लिए सत्ता का प्रतीक बन गई थीं। पंजाब की राजनीति में चन्नी का उदय भी ठीक वैसा है। पंजाब में 32 फीसदी दलित मतदाता हैं। इस तरह चन्नी का मुख्यमंत्री बनना पंजाब में एक ऐसी राजनीति का उदय है, जिसकी तरफ वहां अभी तक किसी ने देखा ही नहीं था। 

अकाली दल ने बसपा से यही सोच कर समझौता किया था कि दलित वोट उनके पाले में आ जाएंगे। कांशीराम भी पंजाब से थे और पंजाब की राजनीति में काफी समय से बसपा की एक भूमिका चली आ रही है। चन्नी भी उसी रविदासिया समुदाय से हैं, जिससे कांशीराम थे। चन्नी के मुख्यमंत्री बनने से पंजाब के दलितों को अपना नायक मिल गया है। ऐसे में वे उस पार्टी की ओर क्यों देखेंगे, जो ज्यादा से ज्यादा मंत्रीपद ही दे सकती है। इस तरह कांग्रेस के इस कदम से एक समीकरण तो अकाली दल का बिगड़ गया। अब अकाली दल जितनी भी सीटें बसपा के लिए छोड़ेगा, वे कांग्रेस के लिए तोहफा होंगी। 

चन्नी के मुख्यमंत्री बनने से पंजाब में जट्ट राजनीति का समीकरण भी बिगड़ा है मगर उससे पहले आम आदमी पार्टी (आप) का समीकरण बिगड़ गया है क्योंकि उसे भी काफी संख्या में दलित वोट मिल रहे थे। इस तरह अकाली दल और ‘आप’ की झोली में जाने वाले वोट अब कांग्रेस के पक्ष में जाएंगे। पिछले महीने चन्नी की रेटिंग सर्वे में 1 फीसदी से भी नीचे थी। मगर एक महीने के अंदर अब उनकी रेटिंग 20 प्रतिशत से ऊपर हो गई है। इतनी बड़ी छलांग बहुत ही कम देखने को मिलती है। इसकी एक अन्य वजह यह है कि जो कांग्रेसी नवजोत सिंह सिद्धू और कैप्टन अमरिंदर की लड़ाई से परेशान थे, उनको भी अपना नायक मिल गया है। सिद्धू और कैप्टन की रेटिंग 10-10 फीसदी गिरी है और यह पूरा बदलाव चन्नी के खाते में नजर आ रहा है। 

कोई शक नहीं कि चन्नी को मुख्यमंत्री बनाना कांग्रेस का मास्टर स्ट्रोक था, मगर इसमें भी एक पेंच फंसा है। मायावती 90 के दशक के मध्य में मुख्यमंत्री तो बन गई थीं मगर ब्राह्मणों को साथ लाकर अपनी सत्ता बनाने में उन्हें 2007 तक का लंबा समय लगा। ऐसा ही पंजाब में दिख रहा है। दलित कांग्रेस के साथ आए हैं तो जट्ट सिख छिटक रहे हैं। ये दो तरफ जाते दिख रहे हैं। एक शिरोमणि अकाली दल की तरफ, जबकि दूसरा हिस्सा आम ‘आप’ की ओर। भले ही वोट शेयर ऊपर से एक सा नजर आ रहा है, मगर नीचे सब कुछ बदल चुका है, खासकर उक्त तीनों पार्टियों में। 

अगर चौथी पार्टी भाजपा की बात करें तो वह पंजाब में दूर खड़ी जमालो है, जो न तीन में है और न तेरह में। उसे पंजाब के ङ्क्षहदुओं की पार्टी माना जाता है। अगर कांग्रेस सुनील जाखड़ को उपमुख्यमंत्री बना देती तो वह नंबर वन की दौड़ में आ जाती, मगर उसने ङ्क्षहदू चेहरे के रूप में ओ.पी. सोनी को चुना जो सिर्फ एक सीट के नेता माने जाते हैं। इस तरह पंजाब में अब ङ्क्षहदू वोटर ही किंग मेकर होने वाला है। वह अगर अकाली या ‘आप’ के साथ गया तो वे आगे रहेंगे और अगर कांग्रेस के पक्ष में आया तो पार्टी सत्ता में वापसी करेगी।

पंजाब में दलित और हिंदू वोट जो पहले हाशिए पर थे, अब किंग मेकर हो गए हैं। जहां तक सिद्धू की बात है तो वह सिक्सर मारने चले थे मगर हिटविकेट दिखाई दे रहे हैं। इस पूरी राजनीति में सबसे ज्यादा नुक्सान उन्हें ही हुआ है। जहां तक कैप्टन की बात है तो वह अमित शाह से मिल चुके हैं। चुनाव से पहले अपनी अलग पार्टी बनाएंगे, उन्हें संसाधनों की कोई कमी नहीं होने वाली। प्रत्याशियों की कमी भी नहीं होगी। ‘आप’ और कांग्रेस में जिन्हें टिकट नहीं मिलेगा, उन्हें कैप्टन टिकट देंगे। इस तरह कैप्टन कांग्रेस के गुब्बारे में पिन का काम करेंगे। आंकड़ों में तो ‘आप’ 5 साल पहले भी आगे दिखाई दे रही थी। उसकी सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि उसके पास कोई चेहरा नहीं है।

अरविंद केजरीवाल क्या नरेंद्र मोदी जैसा चेहरा बन पाए हैं, जो किसी भी राज्य में चुनाव जितवा सकें। अभी ऐसा नहीं लगता। शिअद के पास अपना 25 फीसदी वोट कायम है। उसके लिए सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि वह भाजपा से अलग हो गई है, जिस कारण उसे 15 फीसदी हिंदू वोट और मिल जाता था। जहां तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा की बात है तो देश में पंजाब ही ऐसा राज्य है, जहां इन दोनों की रेटिंग सबसे खराब है, तमिलनाडु और केरल से भी ज्यादा। भाजपा यहां पहली बार 117 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। तभी यह स्पष्ट होगा कि उसके साथ कितने फीसदी हिंदू वोट हैं। अगले 5 महीने में पंजाब की राजनीति किस दिशा में जाती है, कहा नहीं जा सकता। इस बार नतीजे अप्रत्याशित हो सकते हैं।-यशवंत देशमुख
        


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Content Writer

Pardeep

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