क्या भारतीयों के पास धार्मिक स्वतंत्रता है

2021-04-12T02:16:17.903

आज सुबह हैडलाइन आई, ‘‘अपने धर्म को चुनने के लिए लोग स्वतंत्र हैं : सुप्रीम कोर्ट’’ यह रिपोर्ट एक जनहित याचिका के बारे में थी जिसमें भारतीयों को उनके पैदा होने वाले विश्वास को बदलने से रोकने की मांग की गई थी। न्यायाधीश नाराज थे। उन्होंने कहा, ‘‘यह किस तरह की याचिका है?’’ 18 वर्ष से ऊपर के व्यक्ति को अपना धर्म क्यों नहीं चुनना चाहिए? याचिकाकत्र्ता भाजपा के अश्विनी उपाध्याय थे। 

भारतीय न्यायपालिका का धर्म की स्वतंत्रता को लेकर एक लम्बा इतिहास रहा है। इसे फिर से देखना उचित हो सकता है। पहले तो पाठकों को इसे समझना होगा। आपके पास  धर्म की स्वतंत्रता नहीं है। आपके पास उस विश्वास से बाहर निकलने का कोई अधिकार नहीं है जिसमें आप पैदा हुआ थे। मुझे नहीं पता कि क्या हमारे न्यायाधीश इसे जानते हैं या वास्तव में उन्होंने कानून पढ़ा है लेकिन यह एक सच्चाई है। 

हमारे संविधान के अनुच्छेद 25 में लिखा है, ‘‘सभी व्यक्ति समान रूप से अंतर्रात्मा की स्वतंत्रता, धर्म का प्रचार, और अभ्यास करने के लिए स्वतंत्र रूप से हकदार हैं।’’ यह स्पष्ट रूप से एक मौलिक अधिकार है। जिसका अर्थ है जो राज्य के अतिक्रमण से उच्चस्तर की सुरक्षा प्राप्त करता है। मौलिक अधिकार को एक बहस के बाद तैयार किया गया था जिसमें भारत के ईसाइयों ने विशेष रूप से प्रचार करने का (अन्य लोगों को परिवर्तित करने का अधिकार) अधिकार मांगा था। क्योंकि यह उनके विश्वास का एक अंग था। 

भारत में मुसलमान बड़े पैमाने पर प्रचार नहीं करते हैं। यहां तक कि तब्लीगी जमात भी मुसलमानों को बेहतर मुसलमान बनाने की कोशिश करती है। यह ईसाई लोग हैं जो मानते हैं कि उनके धर्म को ईसा मसीह के अच्छे उपदेशों के फैलाने और लोगों को अपने विश्वास में आमंत्रित करने की आवश्यकता है। 

उन्होंने इस अधिकार के लिए कहा और यह विशेष रूप से हमारे संविधान के निर्माताओं द्वारा दिया गया जिसमें हिन्दू कट्टरवादी के.एम. मुंशी शामिल थे जो ईसाइयों के साथ सहमत थे। असैम्बली में केवल एक हिन्दू ने प्रचार के अधिकार का विरोध किया और वह ओडिशा का 26 वर्षीय ब्राह्मण लोकनाथ मिश्रा थे। उनके भाई रंगनाथ मिश्रा तथा भतीजा दीपक मिश्रा दोनों भारत के मुख्य न्यायाधीश बने। 

मिश्रा ने कहा कि भारत को धर्म निरपेक्ष बनाकर हिन्दुओं ने अन्य समुदायों पर अहसान किया है और यह प्रचार की अनुमति दी जानी चाहिए लेकिन इसे मौलिक अधिकार के रूप में नहीं दिया जाना चाहिए। उसे चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि यह अधिकार सर्वोच्च न्यायालय की नजर के तहत भारत में अनेकों अधिकारों के मामले में धोखे से छीन लिया गया है। आइए हम देखें कि मेरी नजर में यह सब क्या है? 

2003 में नरेन्द्र मोदी के अन्तर्गत गुजरात ने एक कानून पारित किया जिसमें अनिवार्य रूप से गुजरातियों के लिए धर्म की सभी स्वतंत्रताओं को हटा दिया। अपने धर्म को बदलने के लिए किसी एक व्यक्ति को सरकार की अनुमति लेना था। लोगों को एक फार्म द्वारा डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रेट को सूचित करना था कि वे किन कारणों से धर्मांतरण कर रहे हैं। उन्हें अपना पेशा तथा मासिक आय भी बतानी थी। इसके अलावा फार्म में यह भी बताना था कि वह उस धर्म में कितनी देर से हैं जिसमें वह धर्मांतरण कर रहे हैं।

फार्म के अन्य खंडों में यह भी खुलासा करना था कि क्या वह दलित या आदिवासी हैं, उनके धर्मांतरण की तिथि तथा समय, नाम, पता, उम्र और पारिवारिक सदस्यों का विवरण देना था। सेरेमनी में भाग लेने वाले सभी मेहमानों के नाम तथा पते बताना भी था। धर्मांतरण के 10 दिनों के भीतर यदि वह ऐसा नहीं करते तो उन्हें 1 वर्ष की जेल हो सकती थी। जो व्यक्ति उनका धर्मांतरण कर रहा है उसे भी एक अन्य फार्म भरना था और उसमें उक्त सभी विवरण प्रस्तुत करने अनिवार्य थे। यह सब धर्मांतरण के 1 माह पहले करना था और डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रेट को आवेदन कर अनुमति मांगना था। नौकरशाह के पास उस आवेदन को रद्द या स्वीकार करने के लिए 1 माह का समय था। 

प्रचार का यह खंडन स्पष्ट रूप से उस व्यक्ति के अधिकार को भी प्रभावित करता है जो अपना धर्म बदलना चाहता है। किसी एक व्यक्ति को तब तक अपने धर्म में बने रहना था जिसमें वह पैदा हुआ था जब तक सरकार मंजूरी नहीं दे देती। डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रेट को एक रजिस्टर भी रखना होगा जिसमें प्राप्त किए आवेदन, स्वीकृति, इंकार या लम्बित फार्मों के बारे में विवरण हो। डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रेट को प्रत्येक तिमाही को रिपोर्ट देनी थी। जबरदस्ती की कल्पना की जा सकती है। 

गुजरात विधानसभा ने जनवरी 2020 में बताया कि पिछले 5 वर्षों में राज्य में धर्मांतरण के 1895 आवेदन प्राप्त किए गए। वहीं गुजरात ने 889 व्यक्तियों को धर्मांतरण की अनुमति देने से इंकार कर दिया। सरकार ने 1006 आवेदनों की अनुमति दी जिसमें से लगभग सभी सूरत के दलित थे जिन्होंने बौद्ध धर्म में धर्मांतरण किया। 

बौद्ध धर्म में धर्मांतरण करने वाले दलित आवेदकों की गिनती बढ़ गई थी क्योंकि 2014 में उन्हें एक सामूहिक समारोह में धर्मांतरण की अनुमति देने से इंकार कर दिया गया था। मोदी सरकार ने कानून को संशोधित करने का प्रयास किया ताकि बौद्ध धर्म और जैन धर्म से हिन्दू धर्म तथा इस के प्रतिकूल धर्मांतरण नहीं हो। इसका मतलब यह है कि बौद्ध तथा जैनियों को कानूनी तौर पर हिन्दू के रूप में देखा जाएगा और यह वास्तव में धर्मांतरण नहीं होगा। मगर इसका विरोध गुजरात के जैनियों ने किया जिन्होंने हिन्दुओं के साथ अपने आपको रखने का विरोध किया और संशोधन वापस ले लिया। 

मैंने गुजरात के उदाहरण का उपयोग किया है लेकिन भारत के सभी राज्यों में इन कानूनों का अपराधीकरण है जो एक मौलिक अधिकार माना जाता है। गुजरात कानून के लिए प्रचार हेतु 3 वर्षों की सजा है (4 वर्ष यदि एक महिला, दलित या आदिवासी का धर्मांतरण हुआ)। लेकिन जिला मैजिस्ट्रेट का अनुमति से इंकार करना विश्वास के स्तर पर कैसे काम करेगा यह स्पष्ट नहीं था। एक पादरी जिससे मैंने बात की, ने कहा कि भारत के धर्म कानून ने विश्वास की प्रकृति के कारण कोई मतलब नहीं रखा। उसने कहा कि मान लो आज मैंने ईसा मसीह में विश्वास करना बंद कर दिया तो यह एक विश्वासी से अविश्वासी में बदलाव होगा। इस बदलाव के लिए उसे सरकार से अनुमति लेनी होगी मगर मैंने पहले से ही विश्वास करना बंद कर दिया है। 

हाल के महीनों में भाजपा शासित राज्यों जैसे उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश तथा अन्यों ने लव जेहाद कानून पारित किया है जिसमें धार्मिक स्वतंत्रता पर सरकारी पकड़ को और मजबूत कर दिया है। यह पूर्णत: तथा प्रमाणपूर्वक कहना गलत है कि भारतीयों को धार्मिक स्वतंत्रता है।-आकार पटेल


Content Writer

Pardeep

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