भाजपा को हराना इस बात पर निर्भर कि विपक्ष अपने पत्ते कैसे खेलता है

10/12/2021 3:12:51 AM

राजनीति में कुछ विशेष पल विपक्षी दलों को उल्लेखनीय सहायता पहुंचाते हैं तथा किसी राज्य में सत्ताधारी पार्टी को विपरीत रूप से प्रभावित करते हैं। तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी के लिए सिंगूर का पल, तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री जे. जयललिता द्वारा 1995 में अपने गोद लिए बेटे की शादी में खुल कर किया खर्च, इंदिरा गांधी के लिए बेलची का पल तथा राजीव गांधी द्वारा आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री टी. अंजइया का अपमान इसके कुछ उदाहरण हैं।

लखीमपुर की हालिया घटना जिसमें 4 किसानों सहित 8 लोग मारे गए थे, ऐसा ही एक पल था जो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए विधानसभा चुनावों से मात्र 5 महीने पहले सर्वाधिक असहज पल के रूप में आया। सुप्रीमकोर्ट ने घटना का स्वसंज्ञान लेते हुए विपक्ष के लिए समर्थन में वृद्धि कर दी।

विपक्ष संसद द्वारा गत दिवस पारित 3 कृषि कानूनों के खिलाफ एक वर्ष से जारी आंदोलन को हवा दे रहा है। उत्तर प्रदेश सरकार योगी द्वारा कथित अपराधियों के खिलाफ ठोस कार्रवाई  करने में हिचकिचाहट दिखाने के लिए उसके हमलों के घेरे में आ गई जिनमें केंद्रीय राज्य मंत्री अजय मिश्रा का बेटा आशीष मुख्य आरोपी के तौर पर शामिल है। 4 किसानों में से एक को कथित रूप से केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा टेनी के बेटे द्वारा कथित रूप से गोली मारी गई। अन्य पर उनके काफिले के वाहन चढ़ गए थे। 

इससे भी अधिक उत्तर प्रदेश सरकार के कांग्रेसी महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा, बसपा के सतीश मिश्रा तथा सपा के अखिलेश यादव सहित अन्य को हिरासत में लेने के निर्णय ने विपक्ष को मुद्दा उठाने का अवसर दे दिया। पूर्व कांग्रेस प्रमुख राहुल गांधी ने यह ट्वीट करते हुए अपनी हताशा व्यक्त की कि ‘इस देश के सभी संस्थानों को आर.एस.एस.-भाजपा द्वारा हाईजैक कर लिया गया है। जहां गृह मंत्री के बेटे के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई वहीं देश में किसानों पर व्यवस्थित तरीके से हमले किए जा रहे हैं। विपक्षी नेताओं को लखीमपुर खीरी भी नहीं जाने दिया जा रहा। केवल तानाशाही में ही ऐसी चीजें होती हैं।’ पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन, राकांपा प्रमुख शरद पवार, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश वाघेल तथा अन्य सहित कई नेताओं ने भी राज्य सरकार की आलोचना की है। 

यदि विपक्षी दल अगले वर्ष के शुरू में होने वाले चुनावों तक लखीमपुर खीरी की घटना की गतिशीलता को बनाए रखने में कामयाब होते हैं तो भाजपा को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। विपक्षी दलों तथा भारतीय किसान संघ (बी.के.यू.) लखीमपुर खीरी हिंसा के इर्द-गिर्द नैरेटिव तैयार करके आंदोलन को और तेज करने की योजना बना रहे हैं। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने 12 अक्तूबर से पार्टी की ‘विजय रथ यात्रा’ की घोषणा की है। बसपा प्रमुख मायावती ने पार्टी काडर को कृषक समुदाय तक पहुंच बनाने के निर्देश दिए हैं।

दूसरे, लखीमपुर खीरी की घटना एक चुनावी मुद्दे के रूप में उभरेगी जो भाजपा को चोट पहुंचाएगी, जिसने 2017 में एक व्यापक जनादेश प्राप्त किया था। यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि चुनावों से पहले भाजपा कितना शीघ्र डैमेज कंट्रोल करती है। 

उत्तर प्रदेश एक बहुत महत्वपूर्ण राज्य है क्योंकि भाजपा ने यहां 2017 में एक बहुत बड़ा जनादेश जीता था। यह घटना उस समय हुई जब योगी कुछ किसान हितैषी कदम उठाने का प्रयास कर रहे थे जैसे कि पराली जलाने के मामले वापस लेना तथा गन्ने की कीमतों में कुछ हद तक वृद्धि। मगर ऐसा दिखाई देता है कि लखीमपुर खीरी की घटना ने इनसे मिलने वाले लाभों को धो डाला है। उत्तर प्रदेश सरकार ने एक एक-सदस्यीय न्यायिक आयोग का गठन किया है। 

लखीमपुर उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र में सबसे बड़ा जिला है जिसमें सिख किसान समुदाय का प्रभुत्व है, जो पाकिस्तान से आने के बाद यहां बस गए थे। ये 80 प्रतिशत ग्रामीण हैं, जहां अधिकतर जनसंख्या गन्ने की खेती पर गुजारा करती है। जिले में ब्राह्मणों का दबदबा है जिसके बाद मुसलमान तथा गैर यादव ओ.बी.सीज के बीच कुर्मी हैं। तीसरा, किसानों के आंदोलन की अब और अधिक क्षेत्रों में फैलने की संभावना है। जैसा कि पहले बताया गया है कि विपक्ष तथा बी.के.यू. की योजना लखीमपुर घटना को केंद्र बनाकर आंदोलन को तेज करने की है। अभी तक इसने उत्तर प्रदेश की सीमाओं को प्रभावित किया है लेकिन अब यह केंद्रीय उत्तर प्रदेश तक पहुंच गया है। 

चौथे, उत्तर प्रदेश कांग्रेस पुन:उत्थान के लिए इसी अवसर की तलाश में है। लखीमपुर खीरी पल ऐसा ही एक अवसर है जो मदद कर सकता है यदि कांग्रेस अपने पत्ते सही खेलती है। पार्टी 1989 के बाद से सत्ता से बाहर है तथा इसकी राज्य में कमजोर उपस्थिति है। उसका नकारात्मक पहलू यह है कि कांग्रेस का पुन:उत्थान समाजवादी पार्टी तथा बसपा जैसे अन्य महत्वपूर्ण खिलाडिय़ों को उल्लेखनीय चोट पहुंचा सकता है जिससे विपक्षी दलों में ओर विभाजन हो सकता है। यह प्रभाव नाटकीय होगा, यदि विपक्ष साथ आ जाए तथा भाजपा के खिलाफ एक सांझी कार्रवाई की योजना बनाए। वर्तमान में विपक्ष बहुत अधिक धड़ों में बंटा हुआ है। 

पांचवां, यह गांधी भाई-बहन के लिए अपनी नेतृत्व क्षमता साबित करने के लिए सही वक्त है। यदि वे उत्तर प्रदेश में सुधार कर सकें तो उनका सकल भविष्य भी बेहतर बन सकता है। लखीमपुर खीरी की घटना अगामी विधानसभा चुनावों तक एक विकसित होती कहानी बनी रहेगी। भाजपा को हराना इस बात पर निर्भर करता है कि विपक्ष किस तरह अपने पत्ते खेलता है अन्यथा यह अपने ही पाले में गोल साबित होगा।-कल्याणी शंकर 
 


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Content Writer

Pardeep

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