बेनकाब नेताओं पर अदालतें अवमानना की कार्रवाई करें

2021-04-20T04:10:22.28

पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वी.पी. मलिक ने कहा है कि कारगिल की जंग में जितने सैनिक शहीद हुए उससे ज्यादा लोगों की मौत कोरोना की वजह से एक दिन में हो रही है इसलिए चुनावी रैलियों और किसानों के आंदोलन पर तुरंत रोक लगानी चाहिए। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री और भाजपा के स्टार प्रचारक शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि मास्क पहना जाए तो कफन से बचा जा सकता है। 

सभी दलों के नेताओं की ऐसी अच्छी बातों के बावजूद सत्ता की अंधी दौड़ में राजनेता कानून को पूरी तरह से रौंदने पर आमादा हैं। पिछले साल कोरोना संक्रमण के 500 मामले सामने आने पर, पूरे देश में लॉकडाऊन लग गया था। अब एक साल बाद रोजाना अढ़ाई लाख से ज्यादा संक्रमण के मामले सामने आने पर दिल्ली समेत कई राज्यों में कफ्र्यू लग गया लेकिन नेतागिरी पर कोई लगाम नहीं लग पा रही। 

राहुल गांधी ने चुनावी रैलियां न करने की अच्छी पहल की, जिसका केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद मजाक उड़ा रहे हैं। असम में मुख्यमंत्री पद के दावेदार हेमंत बिस्व सरमा कहते हैं कि चुनावी रैलियों और कोरोना के प्रसार का कोई संबंध नहीं है। कार में बैठी अकेली सवारी से भी कोरोना फैलने के कोई प्रमाण नहीं मिले तो फिर दिल्ली की सड़कों में जनता को चालान का तांडव क्यों झेलना पड़ रहा है? पश्चिम बंगाल में तीन प्रत्याशियों की कोरोना से मौत हो गई है। 

चुनावी रैलियों से लौटने वाले नेताओं के प्रसाद की वजह से अनेक मंत्री, मुख्यमंत्री और बड़े अफसर कोरोना की गिरफ्त में आ गए हैं। नेता लोग जनता की आवाज को अनसुना करके पूरे देश को जोखिम में डाल रहे हैं। इसलिए इन कानूनी तरीकों से चुनावी रैलियों और रोड शो पर तुरंत प्रतिबंध लगना चाहिए। 

कुंभ के श्रद्धालुओं और मजदूरों की तर्ज पर नेताओं को क्वारंटाइन किया जाए : सोशल मीडिया में लोग कह रहे हैं कि कुंभ से लौटने वाले लोगों से बचकर रहें वर्ना कोरोना का प्रसाद मिल गया तो फिर लोटे में हरिद्वार जाना होगा। महाराष्ट्र, दिल्ली, मध्य प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक और ओडिशा समेत कई राज्यों ने दिशा-निर्देश जारी करके कुंभ से लौटे यात्रियों के लिए 14 दिन का होम क्वारंटाइन अनिवार्य कर दिया है। कर्नाटक जैसे राज्यों ने ऐसे तीर्थ यात्रियों के लिए कोविड टैस्ट भी जरूरी कर दिया है। महाराष्ट्र से लौट रहे गरीब मजदूरों को भी कोविड टैस्ट और होम क्वारंटाइन से जूझना पड़ रहा है। उत्तराखंड की तरह पश्चिम बंगाल में भी पिछले एक महीने में कोरोना के मामलों में कई हजार गुना की बढ़ौतरी हुई है। तो अब रैली से लौटने वाली जनता और नेताओं का भी कोविड टैस्ट और कम्पल्सरी क्वारंटाइन होना ही चाहिए? 

रैलियों और रोड शो में जनता की जान से खेलने का आपराधिक कृत्य : सरकार का कहना है कि जब जरूरी और मजबूरी हो तभी घर से बाहर निकला जाए। चुनाव प्रचार करना नेताओं की मजबूरी हो सकती है लेकिन आम जनता अपनी जान को जोखिम में डाल कर रोड शो और रैलियों का जरूरी हिस्सा क्यों बनेगी? लोगों को एक्सीडैंट से बचाने के लिए हैल्मेट का अभियान चलता है। तो फिर भाषणों पर ताली बजवाने के लिए जनता की जान से खेलने की क्या जरूरत है? यह काम तो ऑनलाइन और वर्चुअल तरीके से भी हो सकता है। चुनावी रैलियों में शामिल होने के लिए गरीब जनता को पैसे खर्च करके बुलाया जाता है। इस आपराधिक कृत्य से लाखों लोगों की जान को जोखिम में डालने के लिए रैली के लिए जिम्मेदार पार्टी नेताओं पर मुकद्दमा दर्ज होना चाहिए। 

रैलियों और रोड  शो को दी गई अनुमति खत्म हो : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कार और हवाई जहाज के भीतर मास्क पहनना जरूरी कर दिया। कलकत्ता हाईकोर्ट ने चुनावी रैलियों और रोड शो के खिलाफ सख्त आदेश पारित किए हैं। उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक डा. विक्रम सिंह के मामले में दिल्ली हाईकोर्ट के नोटिस के बाद चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों को चिट्ठी लिखकर उन्हें सख्त वाॄनग दी। कोरोना रोकने के लिए जब मजदूरों के काम और युवाओं के रोजगार पर ताला पड़ गया हो तो फिर रोड शो और चुनावी रैली जारी रखने की क्या मजबूरी हो सकती है? 

चुनावी राज्यों में कोई भी रैली और रोड शो चुनाव आयोग की अनुमति के बगैर नहीं हो सकता। राजनीतिक दलों और नेताओं को रोड शो और रैली करने का कोई संवैधानिक अधिकार भी नहीं है। कोरोना के इस देशव्यापी आतंक के बाद जान जोखिम में डालने वाली रैलियों और रोड शो को दी गई सारी अनुमतियों को अब चुनाव आयोग द्वारा तुरंत निरस्त करना चाहिए। रैलियों और रोड शो में अनेक नियमों के पालन के लिए चुनाव आयोग ने लिखित आदेश जारी किए हैं। इसके अनुसार मंच पर पदासीन नेता और भीड़ में शामिल सभी लोगों को मास्क,सोशल डिस्टैंसिंग, थर्मल जांच, सैनिटाइजर आदि के नियमों का पालन करना जरूरी है। 

चुनाव आयोग को नॉर्वे के प्रधानमंत्री मामले से सीख लेते हुए भीड़ की संख्या और दावों के आधार पर नेताओं और राजनीतिक दलों पर भारी जुर्माना लगाना चाहिए। ऐसा नहीं होने पर टी.वी. चैनल पर उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर चुनावी राज्यों की पुलिस, प्रशासन और चुनाव आयोग के अधिकारियों के खिलाफ अदालतों द्वारा अवमानना की कार्रवाई होनी चाहिए। इससे करोड़ों लोगों की जान-माल की रक्षा के साथ भारत के संविधान का भी रसूख बढ़ेगा।-विराग गुप्ता(एडवोकेट, सुप्रीम कोर्ट)
 


Content Writer

Pardeep

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