‘कृषि कानूनों पर सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ का गठन हो’

2021-01-14T05:06:47.78

कृषि कानूनों पर कई चरणों की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश से ऐसा लग रहा है कि, जाना था जापान पहुंच गए चीन। भाजपा के दिग्गज वकील और पूर्व मंत्री दिवंगत अरुण जेतली ने संसदीय मामलों में जजों के हस्तक्षेप और न्यायिक सक्रियता का सदैव विरोध किया था, लेकिन अब सरकार के मंत्री ही पूरे मामले को सुप्रीम कोर्ट की तरफ धकेल करके संसदीय सर्वोच्चता पर सवालिया निशान लगा रहे हैं? 

सुप्रीम कोर्ट संविधान की संरक्षक है और उन्हें कानून की वैधानिकता जांचने और उसे रद्द करने का पूरा अधिकार है। लेकिन सुनवाई के बगैर अंतरिम आदेश पारित करने और एक समिति के गठन करने से सुप्रीम कोर्ट की न्यायिक प्रक्रिया पर अनेक सवाल खड़े हो रहे हैं? सुप्रीमकोर्ट ने इस मामले की मैरिट में सुनवाई के बगैर संसद द्वारा पारित कानूनों के क्रियान्वयन पर जो अंतरिम रोक लगाई है, उससे संविधान के बेसिक ढांचे का उल्लंघन होता है। केशवानंद भारती के ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट के 13 जजों की बैंच ने यह व्यवस्था बनाई थी। 

भारत की संवैधानिक व्यवस्था में यह अब पूरी तरह से पुष्ट हो चुका है कि सरकार, संसद और सुप्रीम कोर्ट तीनों की अलग-अलग भूमिका है। कृषि कानून मामले में अटॉर्नी जनरल ने भी तीन जजों के सामने बहस में कहा था कि संसद द्वारा पारित कानून को अंतरिम तौर पर स्थगित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के पास संवैधानिक अधिकार नहीं है। 

हां यदि पूरी सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट को लगता है कि संसद को कानून पारित करने की शक्ति नहीं थी,  या फिर इन कानूनों से मूल अधिकारों का उल्लंघन होता है या फिर संविधान के किसी अन्य प्रावधान का उल्लंघन होता है तो उन परिस्थितियों में किसी कानून को असंवैधानिक घोषित करके रद्द किया जा सकता है। 

इसी वजह से पिछले कुछ सालों में चुनावी बांड, आधार, एस.सी. एस.टी. संरक्षण कानून और नागरिकता कानून जैसे मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाने से इंकार कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश को सही ठहराने के लिए मराठा आरक्षण कानून में दिए गए स्टे आदेश का जिक्र जरूर किया है। लेकिन उस कानून से सुप्रीम कोर्ट के इंदिरा साहनी जजमैंट का उल्लंघन होता था, जिसे 9 जजों की बैंच ने दिया था। इन सब बातों से परे, सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश से यह जाहिर है कि संसद द्वारा हड़बड़ी में पारित किए गए कृषि कानून, प्राथमिक तौर पर संविधान की कसौटी पर खरे नहीं उतरते। 

मामलों की सुनवाई के लिए नई संविधान पीठ का गठन हो : सुप्रीम कोर्ट ने अपने अंतरिम आदेश के फैसले में 3 तरह की याचिकाओं का जिक्र किया है। पहला जिन लोगों ने इस कानून का समर्थन किया। दूसरा वे लोग जिन्हें इस आंदोलन से असुविधा हो रही है और तीसरा जिन्होंने इन कानूनों की संवैधानिकता को चुनौती दी है। किसी भी कानून को समर्थन देने के लिए संविधान के अनुच्छेद-32 के तहत सुप्रीम कोर्ट में याचिका स्वीकार करने की अभी तक कोई परंपरा नहीं है। जिन लोगों को इस आंदोलन से तकलीफ हो रही है उनको राहत देने के लिए भी सुप्रीम कोर्ट ने अभी कोई आदेश पारित नहीं किया। 

इससे साफ है कि संवैधानिकता को चुनौती देने वाले मामलों पर ही बगैर सुनवाई के सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम रोक लगाई है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के नियम और पुराने बड़े फैसलों से स्पष्ट है कि  कानून की संवैधानिकता को चुनौती देने वाले मामलों की सुनवाई सामान्यत: पांच या ज्यादा जजों की संविधान पीठ द्वारा ही की जाती है। राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एन.जे.ए.सी.) के मामले में 5 तो प्राइवेसी मामले की सुनवाई के लिए 9 जजों की पीठ का गठन हुआ। तो फिर इस मामले में भी अंतरिम आदेश पारित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट को संविधान पीठ का गठन करना चाहिए था। वर्तमान चीफ जस्टिस बोबडे अप्रैल 2021 में रिटायर हो जाएंगे और मामले की सुनवाई अब 2 महीने बाद होगी। इसलिए किसान कानूनों की वैधानिकता की जांच यदि सुप्रीम कोर्ट को करनी है तो फिर इसके लिए वरिष्ठतम जज की अध्यक्षता में नई संविधान पीठ का गठन होना चाहिए। 

कानून बनाने से पहले राज्यों के साथ विमर्श क्यों नहीं : वर्तमान कानूनों को समवर्ती सूची की एंट्री 33 के तहत बनाए जाने की बात कही जा रही है। इसके तहत कृषि के अंतर्राज्यीय व्यापार का मामला आता है। इस विषय को नेहरु सरकार के समय 1954 में संविधान संशोधन के माध्यम से संविधान की समवर्ती सूची में लाया गया था, जिसे अब 66 साल बाद दिलचस्प तरीके से चुनौती दी गई है। 

स्वामीनाथन आयोग ने अपनी आखिरी रिपोर्ट में कहा था कि व्यापक सुधारों के लिए कृषि को  संविधान की समवर्ती सूची में लाना चाहिए। केन्द्रीय मंत्री ने पिछले साल दावा किया था कि स्वामीनाथन आयोग की 201 में से 200  सिफारिशों को लागू कर दिया गया है। लेकिन संविधान के अनुसार तो कृषि तो अभी भी राज्यों का विषय है। अंतरिम आदेश पारित करने से 1 दिन पहले सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ने कहा कि ऐसा लगता है कि कृषि कानूनों को बनाने से पहले केंद्र सरकार द्वारा सही और समुचित मशविरा नहीं किया गया। 

अदालती मामलों में दो पक्षों के बीच मध्यस्थता से मामले के निपटारे के लिए प्रक्रिया और कानून बने हुए हैं, जिनमें सुलहनामा को न्यायिक आदेश से मान्यता मिल जाती है। इस मामले में तो सरकार और किसानों के बीच पहले से ही सीधी बात हो रही थी तो फिर इस एकतरफा समिति को बनाने का क्या औचित्य है? सुप्रीम कोर्ट के सम्मुख दायर अनेक याचिकाओं में भी समिति बनाने की कोई मांग नहीं थी। समिति में सुप्रीम कोर्ट का कोई रिटायर्ड जज भी नहीं है। कानून के अनुसार इस समिति की रिपोर्ट की कोई भी वैधता नहीं है और यदि विरोध करने वाले किसान संघ, चार सदस्यीय समिति के सामने नहीं गए तो फिर समिति की रिपोर्ट की कोई वैधता नहीं रहेगी। 

सुप्रीम कोर्ट ने अपने अंतरिम आदेश में कहा है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था अगले आदेश तक जारी रहेगी। ‘जय जवान जय किसान’ को साकार रूप देने वाले लाल बहादुर शास्त्री ने 55 वर्ष पहले न्यूनतम समर्थन मूल्य की शुरूआत की थी। इन कानूनों में एम.एस.पी. का कोई जिक्र नहीं होने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश में इसे लागू करने का आदेश देकर जजों ने बर्र के छत्ते को छेड़ा है। इससे आगे चलकर सरकार के सम्मुख अनेक प्रकार की वैधानिक अड़चनें और उलझनें पैदा हो सकती हैं।-विराग गुप्ता(एडवोकेट, सुप्रीम कोर्ट)
 


Pardeep

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