7 प्रतिशत की वृद्धि में उलझी ‘अर्थव्यवस्था’

7/14/2019 2:27:44 AM

2019 -20 का बजट केन्द्र सरकार के बजटों के सामान्य समय से पहले ही उधड़ गया है। इसमें इस या उस प्रस्ताव को लेकर लोगों में कोई ‘चर्चा’ नहीं है। अत्यंत अमीरों (6467) को पीड़ा हो रही है मगर डर के कारण चुप हैं। अमीरों को राहत महसूस हो रही है कि उन्हें बख्श दिया गया है। मध्यम वर्ग भ्रम में है क्योंकि उस पर केवल नए बोझ ही डाले गए हैं। गरीबों को उनके भाग्य के सहारे छोड़ दिया गया है। मध्यम वर्ग के कार्पोरेट्स (4000) उन टुकड़ों को गिन रहे हैं जो उन पर फैंके गए हैं। 

केवल जो लोग सक्रिय रूप से बजट पर चर्चा कर रहे हैं, वे हैं अर्थशास्त्री तथा सम्पादकीय लिखने वाले लेखक और दोनों को ही केन्द्र सरकार द्वारा तिरस्कारपूर्ण ढंग से नजरअंदाज कर दिया गया है (वित्त मंत्री ने पूर्व समय लिए बगैर पत्रकारों के वित्त मंत्रालय में प्रवेश पर रोक लगा दी है)। 

कौन-सा इंजन चालू है
सरकार ने वर्ष 2019-20 में सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.)में 7 से 8 प्रतिशत वृद्धि का वायदा किया है। यह महज 1 प्रतिशत का अंतर नहीं है, यह निरंतर औसत दर्जे के विकास तथा सम्भावित गतिमान वृद्धि के बीच का अंतर है। यह एक संकेत भी है कि मुख्य आॢथक सलाहकार के अंतर्गत आॢथक विभाजन का वित्त सचिव के अंतर्गत बजट विभाजन के साथ कोई तालमेल नहीं बनता। अधिकतर पर्यवेक्षकों ने महसूस किया है कि भाषण में इस तरह का कोई संकेत नहीं था कि क्या सरकार औसत स्तर के विकास (7 प्रतिशत) के साथ संतुष्ट है या उसका लक्ष्य उच्च तथा अधिक गति वाली विकास दर (8+प्रतिशत) है। मुझे संदेह है कि यह पहले वाला है। 

उच्च तथा अधिक गति वाली वृद्धि के लिए विकास के सभी चारों इंजनों को शुरू करने और पूरी रफ्तार से चलाने की जरूरत है। निर्यात (वस्तुएं) 2013-14 में निर्धारित किए गए 315 अरब डालर के लक्ष्य को 2018-19 में प्राप्त कर सका और फिर भी पूर्व वर्ष के मुकाबले वृद्धि दर औसत रूप से 9 प्रतिशत थी। राजस्व खाते (ब्याज देनदारियों तथा अनुदानों का शुद्ध) पर सरकारी खर्च 2018-19 में जी.डी.पी. का मात्र 7.18 प्रतिशत था। निजी उपभोग मुद्रास्फीति को लेकर अपेक्षाओं, रोजगार, आर्थिक व्यवधानों, सुरक्षा आदि सहित कई अनुमानहीन कारकों पर निर्भर करता है। गृहस्थों के सामने एक चिरस्थायी दुविधा रहती है कि ‘मैं बचाऊं या खर्च करूं?’ उदाहरण के लिए, यह निजी उपभोग में गिरावट के कारण ही है जिसने आटोमोबाइल्स तथा दोपहिया वाहनों की बिक्री को इतनी चोट पहुंचाई है। 

निवेश ठहरा हुआ है 
अब बचता है निवेश। आर्थिक सर्वेक्षण ने अपना विश्वास निवेश के इंजन पर रखा है और कुछ हद तक निजी उपभोग पर। एक अर्थव्यवस्था में निवेश का पैमाना आमतौर पर सकल स्थायी पूंजी निर्माण (जी.एफ.सी.एफ.) है। निम्न तालिका मोदी 1.0 सरकार के अंतर्गत कहानी बताती है: 

जी.एफ.सी.एफ. में 32.9 की उच्च दर में लगभग 5 प्रतिशत प्वाइंट्स की गिरावट आई है। यह तीन वर्षों के लिए लगभग 28 प्रतिशत पर स्थिर था और 2018-19 में 29.3 प्रतिशत के साथ इसमें जरा-सा सुधार हुआ। जी.एफ.सी.एफ. तभी बढ़ेगा यदि सार्वजनिक निवेश तथा निजी निवेश में पर्याप्त वृद्धि होती है। सार्वजनिक निवेश सरकार की कर राजस्व बढ़ाने की क्षमता पर निर्भर करता है लेकिन उस क्षमता पर बादल छा गए हैं। 2018-19 में सरकार ने कर राजस्व के संशोधित अनुमान में से 1,67,455 करोड़ रुपए ‘गंवा’ दिए। 2019-20 में कर राजस्व के लिए अनुमानित विकास दरें, यदि इसे नरमी से भी कहें तो चौंका देने वाली हद तक महत्वाकांक्षी हैं। कोई यह विश्वास कर सकता है कि आयकर राजस्व में 23.25 प्रतिशत की वृद्धि या जी.एस.टी. राजस्व में 44.98 प्रतिशत की वृद्धि होगी? 

निजी निवेश कार्पोरेट बचतों तथा घरेलू बचतों पर निर्भर करता है। इसके अतिरिक्त निवेश विश्वास का मामला होता है। यदि करोड़पति पर्याप्त लाभ नहीं कमाते या उनको ऐसी आशा नहीं होती और वे अपने लाभों का पुनर्निवेश नहीं करते अथवा यदि घरेलू बचतें स्थिर हैं तो निजी निवेश नहीं बढ़ेगा। कार्पोरेट लाभ कई कारकों पर निर्भर करते हैं जो कार्पोरेट्स के नियंत्रण में नहीं होते। जहां तक घरेलू बचतों की बात है मुझे बजट में ऐसा कुछ नहीं मिला जो गृहस्थों को अधिक बचत करने के लिए प्रोत्साहित कर सके और उन बचतों को निवेश की ओर दिशा दिखा सके। 

जो भी हो, गृहस्थों पर और बोझ डाल दिया गया है, विशेषकर मध्य वर्ग पर पैट्रोल तथा डीजल की कीमतें बढ़ाकर, दीर्घकालिक पूंजी लाभों को जारी रखकर, शेयरों की पुनर्खरीद पर कर लगाकर तथा न्यूज पिं्रट व पुस्तकों तथा स्प्लिट एयर कंडीशन्र्स, कुछ आटोमोबाइल पार्ट्स, चांदी तथा सोने पर ऊंचे सीमा शुल्क लगाकर। यदि जी.एफ.सी.एफ. स्थिर है और यह सोचते हुए कि उत्पादकता अथवा कार्यक्षमता में कोई नाटकीय सुधार नहीं होगा, जी.डी.पी. की वृद्धि दर में कोई उल्लेखनीय वृद्धि नहीं होगी। 

कोई ढांचागत सुधार नहीं 
बजट भाषण में दो जगह ‘ढांचागत सुधारों’ शब्द का इस्तेमाल किया गया लेकिन ऐसे किसी उपाय का हवाला नहीं दिया गया जिसे ढांचागत सुधार के तौर पर लिया जा सके। यह मेरे इस विचार की पुष्टि करता है कि नरेन्द्र मोदी डा. मनमोहन सिंह के खांचे में एक निडर सुधारक नहीं हैं। वह एक रूढि़वादी, संरक्षणवादी हैं न कि मुक्त व्यापार को मानने वाले तथा कर लगाओ और खर्च करो की नीति पर चलने वाले। उनकी स्थिति उल्लेखनीय रूप से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प जैसी है सिवाय कराधान के। 

ऐसा दिखाई देता है कि सरकार लगभग 7 प्रतिशत के मध्यम विकास से संतुष्ट है। 7 प्रतिशत की वृद्धि धन बनाने अथवा कल्याण बढ़ाने के लिए पूर्णत: अपर्याप्त होगी। 7 प्रतिशत की वृद्धि लाखों नौकरियां पैदा नहीं करेगी, जिनकी जरूरत है। 7 प्रतिशत की वृद्धि जनसंख्या के सबसे नीचे के तबके (निम्न 20 प्रतिशत) की प्रति व्यक्ति आय नहीं बढ़ाएगी। 7 प्रतिशत की वृद्धि भारत के लिए सम्भवत: विश्व की सबसे तेजी से विकसित होने वाली सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक का प्रमाण पत्र जीत पाएगी लेकिन इसका अर्थ यह होगा अत्यंत गरीब के लिए बहुत कम या कुछ भी नहीं, बेरोजगार व नजरअंदाज, लोगों के असुरक्षित तथा शोषित वर्ग।-पी. चिदम्बरम