मां-नानी के बनाए खाने के स्वाद से वंचित होते जा रहे बच्चे!
punjabkesari.in Monday, Aug 31, 2026 - 04:32 AM (IST)
आप भारत के किसी भी शहर या कस्बे में घूम कर देखिए तो सबसे ज्यादा दुकानें अंग्रेजी दवाओं की मिलेंगी या पैथोलॉजी टैस्ट और एम.आर.आई. आदि करने वाले सैंटर मिलेंगे या पचासों नर्सिंग होम व अस्पताल मिलेंगे। जाहिर है कि हम तेजी से एक बीमार देश बनते जा रहे हैं। हम बीमारी को डाक्टरी इलाज से ठीक करने में लाखों रुपए गंवा देते हैं लेकिन बीमारी के कारणों को समझ कर जड़ से खत्म करने की कवायद नहीं करते। जबकि सच्चाई यह है कि अगर हम अपने धर्मशास्त्रों के अनुसार अपने भोजन और दिनचर्या को संचालित करें तो आधुनिक जीवन की चकाचौंध के बीच भी हम पूरी तरह स्वस्थ रह सकते हैं।
उदाहरण के लिए फागुन पूर्णिमा को होलिकोत्सव करना, मकर संक्रांति के दिन तिल और गुड़ के लड्डू खाना और दान करना। सूर्य-चंद्र ग्रहण के समय खाना-पीना नहीं या फिर गणेश जी के पूजन के लिए दूर्वा का, शंकर जी के पूजन के लिए बेलपत्र का और विष्णु पूजन के लिए तुलसी पत्र का प्रयोग करना उसी परंपरा का प्रभाव है। इसी तरह विजयदशमी को शस्त्र पूजन करना, पाटी पूजन करना या विद्वानों को दक्षिणा देना, दीपावली के पहले अपने आवास की लिपाई-पुताई करना और लक्ष्मी पूजन के बाद दीपोत्सव करना। ये सब शास्त्र शुद्ध पद्धतियों का समावेश कर, जिन ग्रंथों की रचना की गई उन्हें धर्मशास्त्र कहते हैं। धर्म वही है जिसे प्रजा धारण करे यानी उसके अनुसार आचरण करे तो समाज को स्थिरता प्राप्त होती है।
यही बात हमारे दैनिक आहार और पाक-क्रिया पर भी लागू होती है। हमारा आहार शास्त्र और पाक शास्त्र धर्मशास्त्रों का ही एक महत्वपूर्ण अंग है। जरा सोचें कि अधिकांश लोगों का भोजन, दाल-चावल, रोटी-सब्जी होगा, यह किसने तय किया? दाल-सब्जी को छौंकने का आविष्कार किसने किया होगा? श्राद्ध में उड़द की दाल की पकौड़ी, कचौड़ी, इमरती खाना और होली के दिनों में खजूर और ज्वार खाना और चैत्र के महीने में कड़वे नीम का रस पीना ये किसने और कब तय किया होगा? इन परंपराओं को हम केवल अंधविश्वास से नहीं, बल्कि अपने स्वास्थ्य को ठीक रखने के उद्देश्य से आज भी निभाते आ रहे हैं। इसी तरह दक्षिण भारत में इडली-डोसा, महाराष्ट्र में वरण और भात, राजस्थान में दाल-बाटी और सैंगरी, गुजरात में भकड़ी और सुखड़ी, पंजाब में परांठे और लस्सी, उड़ीसा में पखालभात, बंगाल में माछ-भात, ये कैसे और कब हमारी दिनचर्या में आए और आज भी हम इनका पालन करते हैं।
इसी तरह, भोजन बनाने की विभिन्न पद्धतियां, विभिन्न मसालों का प्रयोग, शुद्ध घी या फिर सरसों, तिल या नारियल के तेल का प्रयोग, भोजन परोसने की विभिन्न पद्धतियां, उनको पकाने और खाने के लिए विभिन्न धातुओं के पात्रों का प्रयोग किसने और कब सिखाया होगा? युगों से जो हम करते आए हैं वह हमें बहुत ही सहज और स्वाभाविक लगता है। पर विचार करने पर आश्चर्य होता है कि उन ऋषियों की समग्र बुद्धि और सूक्ष्मता पर, जिन्होंने इस विज्ञान को स्थापित किया। भोजन बनाना, परोसना और उसका आस्वादन करना, यह तत्वज्ञान है, यह यज्ञ है, शास्त्र है, कौशल है, कला है, रसास्वादन है, प्राणों की पुष्टि है, इन्द्रियों और मन का सुख है और यह हमारा संस्कार है। एक साथ पोषण, तोषण, संस्कार, आनंद और आत्म दर्शन है।
अपनी संस्कृति के इन मूल तत्वों के कारण, भारत चिरंजीव बना है। इस वास्तविकता को अब पूरा विश्व स्वीकार कर रहा है। परंतु हम स्वयं ही आज इन बातों से विमुख हो गए हैं। मैकॉले की आजतक लागू शिक्षा पद्धति ने हमारी सोच को पूरी तरह बदल दिया है। अपने रीति-रिवाजों, परंपराओं, पद्धतियों और खान-पान व पहनावे का सम्मान करने की बजाय हम उनका उपहास करना, आलोचना करना और उपेक्षा करना अपने आधुनिक होने का प्रमाण मानते हैं। हम अन्न को पवित्र मानने के स्थान पर उसे बाजार में बिकने वाला एक सामान्य पदार्थ मानने लगे हैं।
अन्न का आरोग्य और संस्कार के साथ सीधा संबंध है, इस बात को भूल कर केवल स्वाद की संतुष्टि के लिए ही उसे ग्रहण करते हैं। इसलिए देश में अन्न का संकट और शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का संकट बढ़ गया है। जैसे कोई हीरे को पत्थर समझ कर फैंक दे, वैसे ही हमने अपने शास्त्रों को फैंक दिया है और पश्चिम की बाजारू संस्कृति के गुलाम बन गए हैं। हमारे दैनिक जीवन में ऑनलाइन आने वाला भोजन इसका प्रमाण है, जिसका परिणाम है आधुनिक चिकित्सा का दिन-दूना और रात-चौगुना बढ़ता कारोबार। उपरोक्त ज्ञान का आधार पुनरुत्थान प्रकाशन सेवा ट्रस्ट, कांकरिया, अहमदाबाद से प्रकाशित एक अत्यंत मूल्यवान ग्रंथ ‘आहारशास्त्र’ है, जो आज हर घर में होना चाहिए। यह ग्रंथ पढ़कर हर महिला अपने घर को निरोगी, सुखी व संपन्न बना सकती है।
इसी क्रम में याद आया कि कई बरस पहले अमरीका के कई बड़े शहरों में अपनी व्याख्यान माला के दौरान, लॉस एंजल्स से सैनहोजे की फ्लाइट में एक वृद्ध अमरीकी महिला, जो मेरे साथ बैठी थीं, उनसे मैंने पूछा कि वह कहां जा रही हैं? वह बोलीं अपनी नातिन के पास। क्योंकि वह फोन पर कहती है, ‘‘नानी आपका बनाया खाना मुझे बहुत अच्छा लगता है। मम्मी जो पका-पकाया खाना बाजार से लाती हैं, उसमें कोई स्वाद नहीं है। इसलिए मैं कुछ दिनों के लिए उसके पास जा रही हं।’’ उनकी यह बात सुन कर मुझे अपनी मां और नानी के बनाए खाने का स्वाद मुंह में आ गया। वह स्वाद, जिससे आज की युवा पीढ़ी और हमारे नाती-पोते बहुत तेजी से वंचित होते जा रहे हैं।-विनीत नारायण
