चन्नी की ताजपोशी, क्या यह नए युग का आगाज है

09/21/2021 4:18:06 AM

क्या पंजाब की राजनीति बदलने वाली है? क्या पंजाब की राजनीति में उसी तरह का बदलाव देखने को मिलेगा जैसे यू.पी. में 1990 के दशक में देखने को मिला था? कांशीराम का जो प्रयोग 90 के दशक में नाकाम हो गया था, क्या पंजाब में उसका समय आ गया है? ये सवाल इसलिए उठ रहे हैं या उठने चाहिएं क्योंकि पंजाब में पहली बार एक दलित को मुख्यमंत्री बनाया गया है! चरणजीत सिंह चन्नी की नियुक्ति पंजाब की राजनीति में कोई औपचारिक घटना नहीं है। चन्नी ने अगर गंभीर राजनीति की तो फिर एक नए युग का आगाज हो सकता है। 

पंजाब में पिछले कई महीनों से कांग्रेस में घमासान मचा था। कैप्टन अमरेंद्र सिंह की मुख्यमंत्री के तौर पर नाकामी और नवजोत सिंह सिद्धू से उनकी भिड़ंत ने कांग्रेस को खासा परेशान कर रखा था। हालात ये हो गए थे कि जिस पंजाब में कांग्रेस की जीत पक्की मानी जा रही थी वहां वह हार के कगार पर जा खड़ी हुई थी। लिहाजा अमरेंद्र को हटाना लाजिमी था लेकिन उसके बाद बड़ा सवाल यह था कि अगला मुख्यमंत्री कौन और किस समुदाय से? जाट सिख या हिंदू या दलित? 

पंजाब में अब तक जाट सिख ही मुख्यमंत्री हुए हैं, ऐसे में कांग्रेस यह प्रयोग कर सकती थी कि सुनील जाखड़ जैसे किसी हिंदू को मुख्यमंत्री बना कर 38 प्रतिशत हिंदू वोटरों को अपनी तरफ खींच ले पर एक पेंच था कि सिखी के नाम पर बने राज्य में किसी गैर-सिख को कैसे मुख्यमंत्री बना दिया जाए। आखिरी समय में पार्टी ने एक दलित को चुन लिया। दलित पंजाब में 32 प्रतिशत हैं और जाट सिख 20 प्रतिशत। हर पार्टी दलितों को अपनी तरफलाने की कोशिश तो करती है पर उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनाती। ऐसे में कांग्रेस ने दलित को कुर्सी सौंप कर एक बड़ा दाव खेला है।

हालांकि यह कहा जा रहा है कि पंजाब के जाट सिख और ङ्क्षहदू कभी किसी दलित को अपना नेता नहीं मानेंगे और कोई भी समुदाय अपने राजनीतिक वर्चस्व को टूटते नहीं देखना चाहता। ऐसे में यह कहना अभी कठिन है कि पंजाब में राजनीति किस करवट बैठेगी, या वहां यू.पी. की तरह दलित राजनीति का प्रयोग कामयाब होगा। वैसे तो यू.पी. में भी एक समय तक अगड़ी जातियों का वर्चस्व था पर मंडल की राजनीति ने उसे तोड़ दिया और लंबे समय के बाद योगी आदित्यनाथ, जो अगड़ी जाति के हैं, को तख्त मिला। पंजाब में कांग्रेस ने जाट सिख और हिंदुओं को साथ लेकर चलने के लिए सुखजिंद्र रंधावा और ओ.पी. सोनी को उपमुख्यमंत्री बनाया है। सिद्धू खुद पार्टी के मुखिया हैं। साफ है कि कांग्रेस जातियों का नया कॉकटेल बनाने की कोशिश में है। यह कितना सफल होगा, इसका नतीजा चुनाव के नतीजे बताएंगे लेकिन दलित कार्ड काफी कारगर हो सकता है और इसका फायदा कांग्रेस को पंजाब से बाहर की राजनीति में भी हो सकता है। 

पंजाब में ‘आप’ सत्ता की बड़ी दावेदार है। उसने यह वादा किया था कि वह किसी दलित को उपमुख्यमंत्री बनाएगी। अब वह क्या करेगी? क्या किसी दलित को मुख्यमंत्री का चेहरा बनाने को तैयार होगी और अगर ऐसा होता है तो भगवंत मान का क्या होगा जो पंजाब में पार्टी के अकेले लोकप्रिय नेता हैं? वह मुख्यमंत्री का चेहरा बनने को लेकर अड़ गए हैं और उनकी दावेदारी को नकारा नहीं जा सकता। अकाली दल ने बसपा के साथ गठबंधन किया है। बसपा का रामदासिया दलित समुदाय में खासा असर है, जो पंजाब की आबादी का कुल 10 प्रतिशत है। चन्नी भी रामदासिया समुदाय से आते हैं। लिहाजा अकाली और बसपा का समीकरण भी गड़बड़ाएगा। भाजपा ने पिछले दिनों कांग्रेस को चुनौती दी थी कि वह दलित मुख्यमंत्री बना के दिखाए। पार्टी ने बना दिया तो अब भाजपा क्या कहेगी और किस मुंह से कहेगी? 

यह सच है कि पंजाब में दलित समुदाय कभी एकजुट नहीं रहा है। वह दलित हिंदू और दलित सिख में बंटा है। अगर 10 प्रतिशत रामदासिया हैं तो 10 प्रतिशत के आसपास ही मजहबी दलित सिख भी हैं। फिर वाल्मीकि और बाजीगर दलित भी हैं। ऐसे में यह तर्क दिया जा सकता है कि जब कांशीराम पंजाब की दलित राजनीति में फेल हो गए तो कांग्रेस कैसे कामयाब होगी? 

कांशीराम ने 1980 की शुरूआत में पंजाब के दलितों को एकजुट करना शुरू किया था। वह थोड़ा सफल भी हुए थे। 1989 में हरभजन लाखा बसपा के पहले सांसद पंजाब से ही हुए थे पर इसके बाद कांशीराम की दाल ज्यादा नहीं गली। उन्हें उत्तर प्रदेश में बड़ी कामयाबी मिली। मायावती 4 बार मुख्यमंत्री बनीं और बसपा पंजाब में हाशिए पर ही रही लेकिन एक फर्क है। आज देश में अस्मिता की राजनीति का बोलबाला है। देश स्तर पर ङ्क्षहदुत्व एक बड़ी पहचान के तौर पर उभरा है तो अलग-अलग राज्यों में जातिगत पहचान ने भी अपने को मजबूती से रखना शुरू कर दिया है। गुजरात में पाटीदार समुदाय का मुख्यमंत्री बनाना इसी ओर संकेत करता है। कर्नाटक में भी भाजपा लिंगायत समुदाय को नाराज करने का जोखिम नहीं उठा पाई और येद्दियुरप्पा के बाद बसवराज बोम्मई को मुख्यमंत्री की कुर्सी देनी पड़ी। 

भाजपा ने भी पिछले दिनों यू.पी. की राजनीति के मद्देनजर कैबिनेट में वहां से जिन 7 लोगों को मंत्री बनाया उनमें से 6 पिछड़ी और दलित जातियों से हैं। नरेंद्र मोदी को यह कहना पड़ रहा है कि केंद्र की सरकार में पिछड़ी जातियों के 27 मंत्री हैं। अब यह अलग बात है कि उनको अधिकार कितना मिला हुआ है लेकिन तमाम दावों के बाद भी भाजपा का एक भी मुख्यमंत्री दलित समुदाय से नहीं है। वह 17 राज्यों में सरकार में है या चला रही है। ऐसे में चन्नी को बनाने का फायदा न सिर्फ पंजाब में होगा बल्कि यू.पी. और उत्तराखंड में भी लाभ मिल सकता है। 

यू.पी. में 21 प्रतिशत दलित हैं। और उत्तराखंड में 18 प्रतिशत। यू.पी. में मायावती की दलित राजनीति सिर के बल खड़ी हो गई है। वह ‘जय भीम’ के नारे से शुरू हुई थी और ‘जय श्रीराम’ पर आ गई है। बसपा का दलित वोट खिसक रहा है। भाजपा ने गैर-जाटव वोटरों को अपनी तरफ खींच लिया है। इसलिए मायावती अब ब्राह्मणों को लुभाने में लगी हैं। ऐसे में यू.पी. में कांग्रेस, जो बहुत मजबूत नहीं है, को दलितों को अपनी तरफ लाने का एक तर्क मिल गया है। उत्तराखंड में तो कांग्रेस सत्ता की प्रमुख दावेदार है। पंजाब कांग्रेस के प्रभारी हरीश रावत खुद मुख्यमंत्री पद के दावेदार हैं। वह यह बात कह सकते हैं कि उनकी वजह से पंजाब में दलित मुख्यमंत्री मिला और यह तर्क उनके पक्ष में जा सकता है। 

यह नहीं भूलना चाहिए कि दलित आजादी के बाद 4 दशक तक कांग्रेस के साथ थे। 1990 में वे कांग्रेस से छिटकने शुरू हुए। यू.पी. और बिहार में उनका कांग्रेस से मोहभंग हुआ लेकिन पंजाब समेत दूसरे राज्यों में अभी भी कांग्रेस से उतने उखड़े नहीं हैं। लिहाजा पंजाब का प्रयोग कांग्रेस के लिए एक बड़ा राजनीतिक हथियार हो सकता है और दलित नैरेटिव में एक नया अध्याय लिख सकता है। अगर ऐसा हुआ तो कांग्रेस के लिए नई शुरूआत भी हो सकती है और भाजपा को भी राष्ट्रीय स्तर पर अपनी रणनीति बदलनी पड़ सकती है। क्या ऐसा होगा? यह तो 5 राज्यों के चुनाव के नतीजे ही बताएंगे!-आशुतोष
 


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Content Writer

Pardeep

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