20 मार्च एक ‘न्याय’ की सुबह

2020-03-21T03:21:24.483

20 मार्च की सुबह निर्भया के साथ-साथ देश की प्रत्येक उस महिला-बेटी को न्याय मिला जोकि निर्भया मामले में न्याय की आस लगाए बैठी थी? सन् 2012 की काली रात को जब 6 दरिंदों ने निर्भया के साथ दरिंदगी का खेल  खेला  तो इस घटना से भारत का कोई भी शख्स अनजान नहीं था, साथ में ही पूरा देश ऐसी घटना को सुनकर भयभीत था लेकिन निर्भया की मां ने इस घटना का बदला लेने के लिए कानून का सहारा लिया तथा साथ में ही उस समय की परिस्थितियों के हिसाब से पुलिस, मीडिया ने जो अपनी अहम भूमिका निभाई थी वह किसी से छिपी नहीं है, क्योंकि पुलिस ने दो सप्ताह के भीतर ही उन गुनहगारों को सलाखों के पीछे पहुंचा दिया था, साथ में ही अगर बात मीडिया की करें तो उसने उस समय निर्भया की मां को समय-समय पर हरसंभव सहायता प्रदान की थी, साथ में ही समाज सेवी संस्थाएं भी उस समय आगे आई थीं तथा उन्होंने इस दरिंदगी का खुलकर विरोध किया था तथा रात-दिन सड़कों पर कैंडल मार्च निकाले गए थे। 

इस प्रकार समाजसेवी संस्थाओं, मीडिया और पुलिस ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका उसमें निभाई थी। प्रत्येक देशवासी उस समय निर्भया की मां के साथ न्याय दिलवाने के लिए खड़ा था, सड़कों पर प्रदर्शन किए जाते थे तब भी निर्भया की मां ने अपनी बेटी के साथ जो पल बिताए थे जिन्हें वह अपनी आपबीती में सुनाती हैं तो सुनने वाले की आंखों से आंसू बहने लगते हैं लेकिन ऐसी स्थितियों से गुजरने के बाद भी निर्भया की मां ने हार नहीं मानी और अपनी बेटी को न्याय दिलवाने का प्रण लिया। निर्भया की मां ने न्याय प्रणाली पर विश्वास रखा और निर्भया के दोषियों को फांसी दिलवाने का प्रण लिया, इसके लिए वह लंबे समय से छोटी अदालतों से लेकर बड़ी अदालतों मेंं गईं। 

आज वह समय आ चुका है कि निर्भया की मां की मेहनत रंग लाई है, इसके लिए निर्भया की मां की हिम्मत की दाद देनी चाहिए जो इतने लम्बे समय से न्याय दिलवाने के लिए संघर्ष करती रहीं और आखिर में आज  न्याय पाया। साथ में ही भारतीय न्यायपालिका पर भी प्रत्येक देशवासी को गर्व होना चाहिए कि हमारी न्यायपालिका एक स्वतंत्र व निष्पक्ष न्यायपालिका है, वह समानता पर आधारित है। 

आज 20 मार्च 2020 वह दिन है जिस दिन प्रत्येक मां-बहन में एक खुशी की उमंग है कि निर्भया के दोषियों को फांसी दी गई। आज की सुबह न्याय की सुबह थी, 5.30 बजे चार दोषियों को फांसी के फंदे पर लटकाया गया तथा इसी के साथ निर्भया की मां के संघर्ष की जीत हुई। इस निर्णय से देश की बेटियों में सुरक्षा का भाव जागृत हुआ कि वे देश में सुरक्षित हैं, साथ में ही ऐसे निर्णय से उन भेडिय़ोंं को सीख लेनी चाहिए जो ऐसी दरिंदगी को अंजाम देते हैं। अगर आगे ऐसा कोई निर्भया कांड हुआ तो उन्हें इस निर्णय से सीख लेनी चाहिए कि उनका हश्र भी यही होगा, उन्हें भी निर्भया के दोषियों की तरह ऐसे ही मौत के फंदे पर लटकाया जाएगा। निर्भया की मां ने इतने लम्बे समय से न्याय पाने के लिए जो संघर्ष किया तो वह झांसी की रानी से कम नहीं हैं। आज समाज का प्रत्येक वर्ग खुश है कि समाज में बेटियां सुरक्षित हैं, साथ में ही आज भारतीय न्यायपालिका ने सिद्ध कर दिया है कि ‘सत्यमेव जयते’ वाक्य ऐसे ही नहीं अपनाया गया है बल्कि हमेशा ‘‘सत्य की जीत’’होती है।-प्रो. मनोज डोगरा
 


Pardeep

Related News