Kundli Tv- कुछ इस अंदाज़ में दिया युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण के इन 2 सवालों का जवाब

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इस धरती पर शायद ही एेसा कोई इंसान होगा जो अपने जीवन में सफल नहीं होना चाहता होगा। हर कोई अपने जीवन में सफलता के शिखर पर पहुंचना चाहता है, लेकिन बहुत से लोग एेसे होते हैं जो अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश करते हैं, लेकिन उसमें सफल नहीं हो पाते। तो अगर आप भी उन लोगों में से हैं जो जी-जान लगाने के बाद भी मनचाही सफलता हासिल नहीं कर पा रहे तो हम आपको श्रीकृष्ण जी द्वारा बताया गया सफलता का एक एेसा मंत्र बताएंगे जिससे आप आसानी से सफलता हासिल कर सकते हैं।
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प्राचीन भारत में लगभग साढ़े तीन हज़ार वर्ष पहले एक योगी राजा हुए थे। उनके मार्गदर्शक भगवान कृष्ण थे। श्रीकृष्ण महान योगी थे। उस योगी राजा का नाम था युधिष्ठिर।

युद्ध के मैदान में भी अपना मानसिक संतुलन बनाए रखने वाले केवल पांडव थे ‘युधिष्ठिर’। वह योगी थे। योगी का अर्थ है व्यावहारिक मनुष्य। कहा जाता है कि एक योगी को सिद्धांत से कुछ लेना-देना नहीं होता है। 

युधिष्ठिर से एक प्रश्न पूछा गया और प्रश्न था, ‘उचित पथ क्या है यानि उचित मार्ग क्या है?’ 
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राजा युधिष्ठिर ने इस प्रश्न के जवाब में कहा कि व्यावहारिक मनुष्य का अनुसरण करना चाहिए, सिद्धांतवादी का नहीं। सिद्धांत की असली परीक्षा व्यवहार में ही होती है। व्यावहारिक जीवन में यह उपयोगी हो भी सकता है, नहीं भी हो सकता है। इसलिए योगी को और आध्यात्मिक साधक को कभी भी सिद्धांतवादी के पीछे नहीं चलना चाहिए।

उसे सदैव व्यावहारिक मनुष्य का ही अनुसरण करना चाहिए। अर्थात योगी को महायोगी का अनुसरण करना चाहिए। क्योंकि योगी से ज्यादा व्यावहारिक महायोगी को माना गया है। युधिष्ठिर ने कहा, यही उचित मार्ग है।

लेकिन शास्त्र एक-दूसरे से भिन्न मत रखते हैं और सभी शास्त्रों के समर्थक कहते हैं कि ‘हमारा संदेश खुदा का संदेश है, यही अंतिम शब्द है।’

अगर सभी शास्त्र एक ही परमात्मा के संदेश हैं, तब वे एक-दूसरे से भिन्न राय क्यों रखते हैं?
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परमात्मा एक है और अगर सभी शास्त्र उनके ही संदेश हैं, यानि एक ही परमात्मा के संदेश हैं तब उनमें कोई मतान्तर नहीं होना चाहिए। युधिष्ठिर एक योगी राजा थे, यह दूसरे सवाल के जवाब से भी साबित हुआ। दूसरा सवाल था, जीवन का लक्ष्य क्या है? इसके जवाब में उन्होंने कहा, ‘जीवन का परम लक्ष्य भौतिक, बौद्धिक, मानसिक और आध्यात्मिक सभी का एक है और वह परम लक्ष्य कहां है?’ 
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आध्यात्मिकता का सार हर मनुष्य के ‘मैं पन’ के भीतर छिपा है और जब तुम अपने स्वयं के ‘मैं’ को नहीं जानते तुम अनेक लोगों को जानने की कोशिश करते हो, लेकिन तुम खुद को ही नहीं जानते। यह ठीक मनीला के निवासी की तरह है, वह हांगकांग को देखना चाहता है, किन्तु मनीला को नहीं जानता। अरे, पहले मनीला को तो जानो! और यदि तुम सब कुछ जानना चाहते हो, यदि तुम सभी कुछ जानने का प्रयास करते हो तो कुछ भी जानने में समर्थ नहीं हो सकोगे। सबसे पहले तुम्हें अपनी सारी अ़भिलाषाओं के साथ तुम्हारे स्वयं के ‘मैं’ के संपर्क में आना पड़ेगा। प्रयोगशाला में किसी सिद्धांतवादी से तुम्हें कोई सहायता नहीं मिलेगी, वह तुम्हारे अनुसंधान में कुछ सहायता नहीं कर सकेगा। प्रयोगशाला में तुम्हें प्रत्यक्ष प्रयोग की आवश्यकता है।"
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