क्या जनता मोदी को एक और ‘मौका’ देगी

चुनाव के नजदीक आते ही जीत हासिल करने के लिए कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा शुरू हो जाती है। ये मुद्दे मतदाताओं को प्रभावित करते हैं लेकिन ये स्थायी नहीं होते क्योंकि उस समय विशेष के राजनीतिक माहौल के अनुसार मुद्दे बदलते रहते हैं।

हर चुनाव की तरह, आगामी चुनावों में भी कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे सामने आए हैं। उदाहरण के लिए इन चुनावों में मोदी फैक्टर बड़ी भूमिका अदा करेगा क्योंकि इस फैक्टर का काफी प्रभाव रहेगा। पार्टी का मानना है कि ‘‘मोदी मैजिक’’ इस बार भी काम करेगा। यद्यपि 2014 में मोदी लोगों के लिए नए थे। 5 साल में लोगों ने उन्हें देखा है, सुना है तथा उनके काम को जांचा है। इस बीच सत्ता विरोधी लहर मोदी के खिलाफ जा सकती है क्योंकि उनका रिपोर्ट कार्ड बहुत अच्छा नहीं है। कुल मिलाकर देखने वाली बात यह होगी कि क्या जनता उन्हें एक और मौका देने के लिए तैयार है? 

प्रियंका गांधी का प्रभाव
प्रियंका गांधी वाड्रा, जो हाल ही में सक्रिय राजनीति में उतरी हैं, भी एक फैक्टर के रूप में उभरी हैं। उसके बारे में एक नयापन, एक बिना परखा गुण तथा उनके बोलने की शैली और व्यक्तित्व के अलावा उनका गांधी परिवार से जुड़ा होना भी एक भूमिका अदा कर सकता है। यद्यपि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रियंका का प्रभाव सीमित ही रहेगा क्योंकि राजनीतिक गणित, जाति की राजनीति और गठबंधन की चुनौतियां उनकी राह को मुश्किल करेंगी। इसके अलावा  वह देर से आई हैं।

बसपा सुप्रीमो मायावती दशकों से राजनीति में हैं परन्तु इस  बार वह एक बड़ा फैक्टर बन गई हैं क्योंकि  बसपा को इस बार बड़ा खिलाड़ी माना जा रहा है। बहुत सी पर्टियां मायावती से हाथ मिलाने की इच्छुक हैं क्योंकि बसपा के वोट हस्तांतरित हो जाते हैं। यदि उत्तर प्रदेश में गठबंधन को अच्छी सीटें मिल जाती हैं तो त्रिशंकु लोकसभा की स्थिति में वह किंगमेकर की भूमिका में आ सकती हैं। इसके अलावा मायावती में प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा भी है। राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव  रांची जेल में सजा काट रहे हैं। इसके बावजूद वह बिहार में बड़े खिलाड़ी हैं। इस प्रदेश से मिली फीडबैक के अनुसार जेल की सजा ने इस नेता के प्रति जनता में सहानुभूति पैदा कर दी है और इस सहानुभूति को वह राजद-कांग्रेस गठबंधन के पक्ष में भुनाना चाहते हैं। 

राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा
राष्ट्रीय सुरक्षा भी एक बड़ा मुद्दा है, जिसका भाजपा इन चुनावों में दोहन करना चाहेगी क्योंकि पुलवामा हमले और उसके जवाब में बालाकोट एयर स्ट्राइक भाजपा के प्रचार अभियान की मुख्य धुरी बन गई है। हालांकि भाजपा के लिए इस मुद्दे को अगले 2 माह तक प्रासंगिक बनाए रखना मुश्किल होगा क्योंकि विपक्ष नौकरियों, नोटबंदी, जी.एस.टी., कृषि संकट इत्यादि  मूल मुद्दों को वापस लाना चाहता है।

ग्रामीण क्षेत्र में निराशा का माहौल एक अन्य मुद्दा है। हालांकि भाजपा को शहरी पार्टी के तौर पर जाना जाता है लेकिन 2014 के चुनाव में ग्रामीण जनता ने मोदी के पक्ष में वोट देकर  भाजपा को जिताने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी। लेकिन अब भाजपा से उनका मोहभंग हो चुका है। किसानों की आत्महत्या के बढ़ते मामलों को देखते हुए कृषि संकट भी इस समय  महत्वपूर्ण मुद्दा है। गत दिसम्बर में 3 राज्यों में भाजपा की हार के लिए इसे  मुख्य कारणों में से एक माना जा रहा है। यदि मोदी सत्ता में वापस आना चाहते हैं तो उन्हें किसान मतदाताओं का विश्वास जीतना होगा। 

बेरोजगारी और नौजवान
रोजगार एक अन्य मुद्दा है, क्योंकि नौजवान इस मामले में निराशा की स्थिति में हैं। मोदी ने 2014 में जितनी नौकरियां देने का वायदा किया था उतनी नौकरियां वह नहीं दे पाए हैं।  बेरोजगारी दर इस समय पिछले 30 साल में सबसे अधिक है। नौजवानों के लिए यह मुद्दा अन्य सभी मुद्दों पर हावी हो चुका है। 13 करोड़ नए वोटर इस बार महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेंगे। 2014 के चुनाव में लगभग 15 करोड़ नए मतदाताओं ने मोदी के पक्ष में मतदान किया था। इस बार लगभग प्रत्येक सीट पर डेढ़ लाख नए मतदाता पंजीकृत हुए हैं जो किसी भी विचारधारा से जुड़े हुए नहीं हैं। सभी राजनीतिक दलों की नजरें इन युवा वोटरों पर हैं।

राजनीतिक दलों के लिए महिला मतदाता भी महत्वपूर्ण बन गई हैं। चुनाव आयोग से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार 2014 के आम चुनावों में मतदान प्रतिशत में काफी वृद्धि हुई है, जिसका एक मुख्य कारण महिला मतदाताओं द्वारा मतदान में बढ़ौतरी है। यह भी महत्वपूर्ण है कि बीजद ने आगामी लोकसभा चुनावों में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा की है। तृणमूल कांग्रेस ने उनके लिए 41 प्रतिशत सीटें अलग रखी हैं जबकि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने सरकारी नौकरियों में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा की है।  भाजपा भी कई सरकारी कार्यक्रमों द्वारा महिला वोटरों को रिझाने की कोशिश कर रही है। 

मुद्दा अर्थव्यवस्था का
दुनिया भर में बहुत से नेताओं ने अर्थव्यवस्था के मुद्दे पर चुनाव जीते और हारे हैं। दरअसल, मोदी अर्थव्यवस्था के मुद्दे पर सवार होकर सत्ता में आए थे। हालांकि मोदी द्वारा उठाए गए नोटबंदी और जी.एस.टी. जैसे कदम मतदाताओं को रास नहीं आए हैं। ऐसे में विपक्ष भाजपा को आॢथक मुद्दों पर घेरना चाहता है। जाति का मुद्दा हर चुनाव की हकीकत है और चुनाव जीतने के लिए चुनावी गणित में जाति का समीकरण महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बहुत सी पाॢटयां अपने उम्मीदवारों का चुनाव जाति के आधार पर करती हैं।

इसके अलावा सोशल मीडिया भी चुनाव प्रचार के दौरान मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए अहम मुद्दा बन चुका है। 2014 में सभी पार्टियों ने सोशल मीडिया का खूब इस्तेमाल किया और इस बार उसका इस्तेमाल और भी ज्यादा होगा। चुनाव परिणाम इस बात पर निर्भर करेंगे कि कौन-सी पार्टियां किस प्रकार से इन मुद्दों को अपने पक्ष में तथा विरोधियों के खिलाफ भुना पाती हैं।-कल्याणी शंकर

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