नोटबंदी और GST के बाद क्‍यों धीमी पड़ी कृषि क्षेत्र की रफ्तार, RBI रिपोर्ट में सामने आई वजह

नई दिल्लीः सकल बैंक क्रेडिट उपलब्धता में सुधार से अर्थव्यवस्था में सुधार स्पष्ट है लेकिन अतीत की तुलना में पिछले 18 महीनों में सिंगल डिजिट की बढ़ोतरी दर को प्राथमिकता देते हुए लोन देना जारी है। संभवतः यह ग्रामीण क्षेत्रों में विकास में निरंतर सुस्ती और जीएसटी के कार्यान्वयन के बाद है। पिछले 5 साल में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) से प्राप्त आंकड़ों से पता चलता है कि प्राथमिकता वाले क्षेत्र के लिए बकाया लोन में बढ़ोतरी, परंपरागत रूप से सकल बैंक ऋण में वृद्धि की तुलना में बहुत तेज दर से बढ़ रही है लेकिन पिछले 18 महीने (जून 2017 से नवंबर 2018) एक अपवाद रहे हैं। वास्तव में, नवंबर 2018 में, प्राथमिकता वाले क्षेत्र के लिए बैंक ऋण बकाया 8.4 प्रतिशत बढ़ गया, जो सकल बैंक ऋण की वृद्धि दर 13.6 प्रतिशत से बहुत धीमी है।

प्राथमिकता क्षेत्र से तात्पर्य कृषि और संबद्ध गतिविधियों, सूक्ष्म और लघु उद्यमों, गरीबों के लिए आवास, छात्रों की शिक्षा और अन्य कम आय वाले समूहों और कमजोर वर्गों जैसे सेक्शन से है, जिनके लिए आरबीआई को बैंकों को अपने लोन का 40 प्रतिशत अलग से सेट करना पड़ता है। इसका अर्थ अर्थव्यवस्था के सामूहिक विकास को सुनिश्चित करना है। प्राथमिकता क्षेत्र के भीतर भी, जबकि क्रेडिट बकाया की विकास दर 8 प्रतिशत से अधिक हो गई है, वहीं नोटबंदी के पहले से कृषि और संबद्ध क्षेत्रों में यह दर डबल डिजिट से काफी नीचे बनी हुई हैं। 
        
प्राथमिकता वाले क्षेत्र के लोन में अधिकांश वसूली सूक्ष्म और लघु उद्यम से हुई है। यह वसूली इस क्षेत्र में लोन देने के बाद आई है। पिछले 18 महीनों में प्राथमिकता वाले सेक्टर क्रेडिट में ग्रोथ 3.3 फीसदी से लेकर 9.3 फीसदी तक रही। सबसे कम जुलाई 2017 में 3.3 फीसदी और सबसे ज्यादा 9.3 फीसदी अक्टूबर 2018 में रही। इसी अवधि में ग्रोस बैंक क्रेडिट भी जून 2017 में 4.4 फीसदी और नवंबर 2018 में 13.6 फीसदी दर्ज किया गया।

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