चीन को लेकर बढ़ रहा अफ़्रीकी देशों में  ''डर''

बीजिंगः चीन से मिलने वाले क़र्ज़ को लेकर बेशक अफ़्रीकी देश काफ़ी उत्साहित हैं, लेकिन  विशेषज्ञों ने इस महाद्वीप पर बढ़ते क़र्ज़ के बोझ को लेकर चिंता जताई है। विशेषज्ञों का कहना है कि जल्द ही इसकी हक़ीक़त सामने आ सकती है। अफ़्रीकी देश जिस तरह से चीन से क़र्ज़ ले रहे हैं उससे उनके नहीं चुका पाने का ख़तरा भी बढ़ता जा रहा है। 
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अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने अप्रैल में कहा था कि इस इलाक़े में कम आय वाले 40 फ़ीसदी देश क़र्ज़ के बोझ तले दबे हुए हैं या इसके बेहद क़रीब हैं। चाड, इरिट्रिया, मोज़ाम्बिक, कांगो रिपब्लिक, दक्षिणी सूडान और ज़िम्बॉब्वे के बारे में कहा जा रहा है कि ये देश क़र्ज़ के बोझ तले दबे हुए हैं।  ये देश 2017 के आख़िर में ही इस श्रेणी में आ गए थे। ज़ाम्बिया और इथियोपिया के बारे में कहा जा रहा है कि ये भी क़र्ज़ के जाल में फँसने के क़रीब हैं। स्टैंडर्ड बैंक ऑफ़ चाइना के अर्थशास्त्री जर्मी स्टीवन्स ने एक नोट में लिखा है, ''केवल 2017 में अफ़्रीका में चीनी कंपनियों ने 76.5 अरब डॉलर की परियोजनाओं पर हस्ताक्षर किए हैं। ''
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 मेकरेरे यूनिवर्सिटी बिज़नेस स्कूल के एक लेक्चरर ने बीबीसी से कहा, ''यह क़र्ज़ चीन से आ रहा है और साथ में चीनी कंपनियों का बड़ा कारोबार भी आ रहा है। ख़ासकर चीन की कंस्ट्रक्शन कंपनियां पूरे अफ़्रीका में रेल, रोड, पनबिजली के बांध, स्टेडियम और व्यावसायिक इमारतें बना रही हैं।''घाना के इन्वेस्टमेंट एनलिस्ट माइकल कोटोह का कहना है कि अफ़्रीका ने चीन के साथ मिलकर व्यापार, निवेश और वित्तीय प्रबंधन पर व्यापक समझौते किए हैं। माइकल कहते हैं, ''अगर ऐतिहासिक रूप से अफ़्रीका में पश्चिमी देशों के कारोबार से तुलना करें तो चीन के साथ अफ़्रीका के जो समझौते हैं या जो परियोजनाएं चल रही हैं वो पारस्परिक फ़ायदे के हैं।''
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हालांकि इस बात को हर कोई जानता है कि चीन के दोनों हाथों में लड्डू है. ऐसा इसलिए कि चीन ने जो समझौते किए हैं उनमें अपने हितों का ख़्याल पूरी बारीकी से रखा है।मैकेंजी का अनुमान है कि 2025 तक चीन का अफ़्रीका में राजस्व 440 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। यहां तक कि इस बात से अडसिना भी सहमत हैं। अमरीका की तरह चीन में फ़ॉरेन करप्ट प्रैक्टिस जैसा कोई क़ानून नहीं है। अमरीका की तरह के क़ानून बाक़ी के पश्चिमी देशों में हैं जिनके तहत अनुबंध को हासिल करने में अगर रिश्वत दी जाती है तो कार्रवाई होती है। हालांकि नोबेल सम्मान से सम्मानित अर्थशास्त्री जोसेफ़ स्टिग्लिट्ज़ चीनी निवेश पर पश्चिमी देशों की आलोचना को 'अंगूर खट्टे हैं' की तर्ज पर देखते हैं। 

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